Sunday, January 23, 2022
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किसी भी पार्टी के प्रत्याशियों के नाम उजगार नहीं होने से बनी है उत्सुकता

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  • 2022 के विधानसभा चुनाव चुनाव फरवरी माह में होने की पूरी संभावना

जनवाणी संवाददाता  |

बड़ौत: बड़ौत और छपरौली विधान सभा सीटों पर विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशियों के नामों की स्थिति स्पष्ट नहीं होने से लोगो में बेचैनी बढ़ रही है। जहां बसपा की ओर से कई माह पहले ही प्रत्याशियों को विधानसभा प्रभारी बनाकर मैदान में उतार दिया जाता था। इस बार बसपा ने भी किसी प्रत्याशी के नाम की घोषणा नहीं की।

हालांकि भाजपा में जरूर चर्चा है कि सिटिंग एमएलए ही प्रत्याशी रहेंगे। लेकिन कुछ भाजपा के लोग फेरबदल की बात कर रहे हैं। रालोद व भाजपा के प्रत्याशियों के नामों की घोषणा नहीं होने से क्षेत्रों के लोग अंदाजे लगाकर ही संतुष्ट हो रहे हैं। वैसे तो बड़ौत और छपरौली को रालोद का गढ़ माना जाता रहा है।

लेकिन बड़ौत विधानसभा की सीट पर रालोद को सफलता नहीं मिल पाई है। नए परिसीमन के बाद से दो बार विधानसभा के चुनाव हुए। 2012 में बसपा के लोकेश दीक्षित विधायक बने तो 2017 में भाजपा के केपी मलिक यहां से विधायक हैं। बड़ौत से बसपा और भाजपा को जीत मिलने के बाद से यहां इस बार भाजपा व रालोद की टक्कर आमने-सामने होने की पूरी संभावना है। सपा व रालोद के प्रत्याशी तो मिलकर ही चुनाव लड़ेगें। रही बात बसपा की तो बसपा ने अभी तक यहां पत्ते नहीं खोले हैं।

हालांकि भले ही यहां से रालोद को दोनों बार सफलता न मिली हो। लेकिन रालोद ही प्रत्याशी जीतने वाली पार्टी के प्रत्याशी को टक्कर देता रहा। चुनाव परिणाम में वह यहां से हार जाएं। इन सब बातों को लेकर लोग आए दिन चर्चाएं कर रहे हैं कि बड़ौत और छपरौली में रालोद और भाजपा के उम्मीदवार कौन-कौन होंगे? छपरौली विधानसभा सीट पर भाजपा से इतर रालोद के कार्यकर्ता सांसे थामे बैठे हुए हैं। उन्हें इस बात की अधिक उत्सुकता है कि यहां से कौन प्रत्याशी बनेगा। छपरौली रालोद का मजबूत किला माना जाता है।भाजपा की आंधी में भी छपरौली से रालोद का ही विधायक जीता था।

यह बात अलग है कि रालोद छोड़कर जीते विधायक ने भाजपा ज्वायन कर ली थी। रालोद के वह वरिष्ठ कार्यकर्ता, जो दिनरात पार्टी के लिए समर्पित होकर काम कर रहे हैं। वह दिल्ली बसंत कुंज में जोर आजमाइश कर रहे हैं। किस कार्यकर्ता को दिल्ली से टिकट मिलेगा। अभी कुछ भी अंदाजा लगाना मुश्किल है। भाजपा की स्थिति दूसरी है।

भाजपा में कई धु्रव से जोर आजमाइश करनी पड़ती है। भाजपा के वर्तमान विधायकों पर भाजपा दावं ख्ोल सकती है। ऐसी राजनैतिक बाजार में चर्चांए हैं। इस भागदौड़ में भी शायद अभी तक कोई भी व्यक्ति खुद को टिकट के लिए संतुष्ट नहीं कर रहा है। लोगों को अब टिकट दावेदारों के नामों को जानने की उत्सुकता और बढ़ रही है। यह बैचेनी अभी शायद चुनाव आचार संहिता लगने तक रहेगी।

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