Tuesday, June 25, 2024
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माता पिता के प्रति असल कर्तव्य

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स्वार्थ वश माता-पिता की आज्ञा का उलंघन कर के अलग रहने वाले पुत्र तो कृतघ्नी ही होते हैं। शास्त्रों में तो पुत्र के लिए कर्तव्य बताया गया है कि स्वयं सुमार्ग पर चलकर माता-पिता को भी सुमार्ग की ओर, धर्म की ओर मोड़ें तो ही उनके उपकार का बदला चुकाया जा सकता है। माता-पिता मोहवश पुत्र को सुमार्ग पर जाने से रोकें तो एक बार उनकी अवज्ञा कर के भी स्वयं सुमार्ग पर दृढ़ हों और फिर उन्हें भी सुमार्ग की ओर उन्मुख करें।

मनुष्य का जीवन अनेक उतार-चढ़ावों से होकर गुजरता है। उसकी नवजात शिशु अवस्था से लेकर विद्यर्थी जीवन, फिर गृहस्थ जीवन तत्पश्चात मृत्यु तक वह अनेक प्रकार के अनुभवों से गुजरता है। अपने जीवन में वह अनेक प्रकार के कार्यों व उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता है। परंतु अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्य व उत्तरदायित्वों को वह जीवन पर्यंत नहीं चुका सकता है। माता-पिता से संतान को जो कुछ भी प्राप्त होता है वह अमूल्य है। मां की ममता व स्नेह तथा पिता का अनुशासन किसी भी मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण में सबसे प्रमुख भूमिका रखते हैं। किसी भी मनुष्य को उसके जन्म से लेकर उसे अपने पैरों तक खड़ा करने में माता-पिता को किन-किन कठिनाइयों से होकर गुजरना पड़ता है, इसका वास्तविक अनुमान संभवत: स्वयं माता या पिता बनने के उपरांत ही लगाया जा सकता है। हिंदू शास्त्रों व वेदों के अनुसार मनुष्य को 84 लाख योनियो के पश्चात मानव शरीर प्राप्त होता है। इस दृष्टि से माता-पिता सदैव पूजनीय होते हैं जिनके कारण हमें यह दुर्लभ मानव शरीर की प्राप्ति हुई।

आज संसार में यदि हमारा कुछ भी अस्तित्व है या हमारी इस जगत में कोई पहचान है तो उसका संपूर्ण श्रेय हमारे माता-पिता को ही जाता है। यही कारण है कि भारत के आदर्श पुरुषों में से एक राम ने माता-पिता के एक इशारे पर युवराज पद का मोह त्याग दिया और वन चले गए। कितने कष्टों को सहकर माता पुत्र को जन्म देती है, उसके पश्चात अपने स्नेह रूपी अमृत से सींचकर उसे बड़ा करती है। माता-पिता के स्नेह व दुलार से बालक उन संवेदनाओं को आत्मसात करता है जिससे उसे मानसिक बल प्राप्त होता है।

हमारी अनेक गलतियों व अपराधों को वे कष्ट सहते हुए भी क्षमा करते हैं और सदैव हमारे हितों को ध्यान में रखते हुए सद्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करते हैं। पिता का अनुशासन हमें कुसंगति के मार्ग पर चलने से रोकता है एवं सदैव विकास व प्रगति के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। यदि कोई डॉक्टर, इंजीनियर व उच्च पदों पर आसीन होता है तो उसके पीछे उसके माता-पिता का त्याग, बलिदान व उनकी प्रेरणा की शक्ति निहित होती है। यदि प्रांरभ से ही माता-पिता से उसे सही सीख व प्ररेणा नहीं मिली होती तो संभवत: समाज में उसे वह प्रतिष्ठा व सम्मान प्राप्त नहीं होता।

माता-पिता के प्रति असल कर्तव्य यही है कि उन्हें बुढ़ापे में सड़क पर, स्टेशन पर या वृद्धाश्रम में न छोड़ा जाए। अपने मां-बाप को बोझ न समझें और अपने मां-बाप के साथ उनके बच्चे रहे न के उनके मां-बाप अपने बच्चों के साथ रहें। उन्हें इस बात का अहसास न कराएं कि वो आपके घर मे रह रहे हैं, बल्कि ये अहसास दिलाएं कि वो अपने घर में रह रहे हैं। जैसे चाहें, वैसे जिएं। जिस घर को खड़ा कर के तुम अपना घर कहते हो, वो घर खड़ा भी मां-बाप के दुआओं से होता है और जिस घर में मां-बाप की आवाज और उसकी हंसी न हो, वो घर फिर घर नहीं, एक खाली मकान बन कर रह जाता है।
शास्त्रों का तो कथन है कि ‘संसार में बसने वाली आत्मा यदि क्षुद्र स्वार्थ के वशीभूत होकर अपने माता-पिता की अवज्ञा करे तो उसके समान कोई दुष्ट नहीं है।’ माता-पिता की सेवा किस तरह करनी चाहिए और कैसी करनी चाहिए? उन्हें आप स्वयं स्नान कराएं, उन्हें खिलाकर खाएं, उन्हें नींद आने पर आप सोएं, उनसे पहले आप जग जाएं, जब वे सोएं तब उनकी चरण-सेवा करें, उठते समय भी उनकी चरण-सेवा करें, मधुर स्वर में उन्हें जगाएं और तुरंत चरणों में नमस्कार करें। क्या यह सब आप करते हैं? आप तो यदि खाने की कोई उत्तम वस्तु लाते हैं, तो स्वयं खा जाते हैं और ऊपर से यह कहते हैं कि ‘उस बुड्ढे को क्या खिलाना है?’ माता-पिता के लिए राज्य-सिंहासन को ठोकर मार देने के भी शास्त्रों में दृष्टांत हैं। माता-पिता चौबीसों घंटे धर्म की आराधना कर सकें, ऐसी व्यवस्था पुत्रों को अवश्य करनी ही चाहिए। यहां जो बात है वह आत्म-कल्याण संबंधी है। यदि मोह घटाना हो तो ही माता-पिता से बिछुड़ने की बात है। स्वार्थ वश माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन कर के अलग रहने वाले पुत्र तो कृतघ्नी ही होते हैं। शास्त्रों में तो पुत्र के लिए कर्तव्य बताया गया है कि स्वयं सुमार्ग पर चलकर माता-पिता को भी सुमार्ग की ओर, धर्म की ओर मोड़े तो ही उनके उपकार का बदला चुकाया जा सकता है। माता-पिता मोहवश पुत्र को सुमार्ग पर जाने से रोकें तो एक बार उनकी अवज्ञा कर के भी स्वयं सुमार्ग पर दृढ़ हों और फिर उन्हें भी सुमार्ग की ओर उन्मुख करें।                                       -सूरिरामचंद्र


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