Sunday, February 25, 2024
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विकसित भारत की हकीकत

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SATYENDRAप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले आम चुनाव के लिए ‘विकसित भारत’ को अपने प्रचार का मुख्य थीम (विषयवस्तु) बनाया है। इसके लिए हाल में देश भर में ‘विकसित भारत’ यात्रा निकाली गई। अपने भाषणों में मोदी 2027 तक (जब ब्रिटिश राज से भारत की आजादी के सौ वर्ष पूरे होंगे) भारत को विकसित देश बना देने का इरादा जताते हैं। लेकिन जैसा कि उनके ज्यादातर राजनीतिक कथानकों में होता है, इस नैरेटिव की बारीकियों में जाने की कोशिश उनकी पार्टी या उनकी तरफ से नहीं होती है। वे यह स्पष्ट नहीं करते कि जब भारत ‘विकसित’ हो जाएगा, तब यहां क्या होगा- यहां के आम जन का जीवन स्तर कैसा होगा, और देश में सबके लिए किस तरह की सुविधाएं होंगी? वैसे राजनेताओं के लिए अपने सियासी कथानक को अस्पष्ट रखना कोई नई बात नहीं है। राजनीति-शास्त्री ऐसे वादों को खोखला नारा कहते हैं। भारत में इसके लिए अब एक सटीक शब्द-जुमला प्रचलित हो चुका है। यह शब्द नरेंद्र मोदी के ही एक अन्य नारे के संदर्भ में चर्चित हुआ। यह खोखला नारा था-अच्छे दिन आएंगे-जिसे मोदी ने 2014 के आम चुनाव में उछाला था। अच्छे दिन आएंगे, जब कहा गया, तो हर तबके या व्यक्ति को संभवत: महसूस हुआ कि मोदी उसके भविष्य को वर्तमान की तुलना में बेहतर बना देंगे। संभवत: उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी अब ‘विकसित भारत’ का सपना उछाल रहे हैं। भले मोदी इस नारे का इस्तेमाल अच्छे दिन जैसा अस्पष्ट सपना बेचने के लिए कर रहे हों, मगर हमारे पास इसकी हकीकत की जांच करने का ठोस आधार मौजूद है। हम उन पैमानों पर आंकड़ों के आधार पर इस नारे को ठोस रूप से परख सकते हैं। हम यह जानने की स्थिति में हैं कि विकसित देश बनने की यात्रा में फिलहाल भारत अभी किस मुकाम पर है और उस मंजिल की तरफ जाने की उसकी रफ्तार क्या है?

विश्व बैंक इस कसौटी पर भी किसी देश के विकास के स्तर को मापता है कि उसकी आर्थिक और वित्तीय नीतियां किस हद तक भूमंडलीकरण के अनुरूप हैं। विश्व बैंक की मान्यता है कि भूमंडलीकरण में शामिल होने से देशों के अंदर आय और जीवन स्तर में सुधार होता है। लेकिन यह पैमाना विवादास्पद है। सबसे आम पैमाना प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का है। विश्व बैंक 13,250 डॉलर से अधिक प्रति व्यक्ति जीडीपी वाले देशों को विकसित श्रेणी में रखता है। पिछले साल तक चीन भी इस कसौटी को हासिल नहीं कर पाया था। इसलिए लगभग 19 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के बावजूद उसे विकासशील देशों की श्रेणी में ही गिना जा रहा था।

विश्व बैंक के मुताबिक 2023 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,411 डॉलर थी। 3.4 ट्रिलियन की सकल अर्थव्यवस्था के साथ भारत दुनिया में पांचवें नंबर पर जरूर था, लेकिन प्रति व्यक्ति जीडीपी के लिहाज से वह विश्व बैंक की 209 देशों की सूची में 159वें नंबर पर मौजूद था। इस लिहाज से वह निम्न मध्यम आय वर्ग की श्रेणी वाले देशों में था। भारत की औसत आय वैश्विक औसत के महज 19 प्रतिशत के बराबर थी। वैसे विकसित देश बनने के लिए सिर्फ प्रति व्यक्ति जीडीपी का ऊंचा स्तर पर्याप्त नहीं है। इस मामले में यह उदाहरण दिया जाता है कि कतर में प्रति व्यक्ति जीडीपी 2021 के अंत में 62 हजार डॉलर से ऊपर थी। यानी वह बेहद ऊंचे स्तर वाले देशों में शामिल था। मगर इन्फ्रास्ट्रक्चर की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति, देश में आय की चरम विषमता और कमजोर आर्थिक वर्ग वाले नागरिकों के लिए शिक्षा के पर्याप्त अवसर के अभाव के कारण उसे विकसित देशों की श्रेणी में नहीं गिना जाता था। जीवन स्तर के पैमाने में जो बातें देखी जाती हैं, उनमें मानव विकास सूचकांक पर देश का दर्जा, देश की जीवन प्रत्याशा, और बाल मृत्यु दर शामिल हैं। ज्यादातर विकसित देशों में प्रति 1000 जन्म पर शिशु मृत्यु दर दस से कम है, जबकि व्यक्तियों की जीवन प्रत्याशा 75 वर्ष से ऊपर है।

संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक को किसी देश में प्रगति को मापने का का उपयुक्त पैमाना समझा जाता है। आम समझ है कि जिस देश का एचडीआई अंक 0.9 या उससे ऊपर हो, उसे विकसित देश की श्रेणी में रखा जाता है। 2022 में भारत के एचडीआई अंक 0.633 प्रतिशत थे और सूचकांक में वह 132वें नंबर पर था। भारत में 2023 में जीवन प्रत्याशा 70.3 वर्ष थी। भारत में शिशु मृत्यु दर 25 थी। अब अगर बात इन्फ्रास्ट्रक्चर की करें, तो 2023 की सीएमएस ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर इंडेक्स में भारत का स्थान 31वां रहा। इसके साथ ही यह बात भी जरूर ध्यान में रखना होगा कि भारत में परंपरागत इन्फ्रास्ट्रक्चर हो या डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर- इनकी उपलब्धता में भारी विषमता है। देश की ऊपरी 20 से 25 फीसदी आबादी को जिस गुणवत्ता का इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है, वैसा बाकी आबादी को नहीं है।

डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में यह खाई कोरोना काल में बेनकाब हो गई थी। बहरहाल, वर्तमान भारत में सारा नैरेटिव सकल तस्वीर पर आधारित है, जिसमें आबादी के अलग-अलग हिस्सों की वास्तविक स्थिति को सिरे से नजरअंदाज किया जाता है। इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ यह बात जुड़ी होती है कि इसके उपभोग के लिए किसी नागरिक को कितनी कीमत चुकानी पड़ती है। चूंकि भारत में अब सारा निर्माण निजी क्षेत्र में होता है, इसलिए इसमें शामिल मुनाफे का पहलू हर सेवा को इतना महंगा बना देता है, जिससे वह सेवा आबादी के बहुसंख्यक हिस्से की पहुंच से बाहर हो जाती है।

विशेषज्ञ भी प्रधानमंत्री के नए नारे से थोड़े अचंभित-से हैं, जो आम तौर पर सरकारी नैरेटिव को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। इस बात की मिसाल हाल में एक अंग्रेजी अखबार के स्तंभ में देखने को मिली, जिसमें विकसित भारत के वादे और बहुआयामी गरीबी सूचकांक पर भारत की प्रगति के सरकारी दावों के बरक्स कुछ तथ्यों को याद दिलाया गया- यह कहते हुए कि ऐसी सूरत के रहते विकसित भारत का निर्माण दूर की कौड़ी बना रहेगा। इसमें कहा गया कि बहुआयामी गरीबी सूचकांक में शिक्षा एक पैमाना है, जिसका प्रसार हुआ है। लेकिन साथ ही यह टिप्पणी की गई- ‘स्कूलों में दाखिले का क्या लाभ है, जब शिक्षा की गुणवत्ता खराब बनी हुई है- जैसाकि प्रथम नाम की संस्था की अरएफ रिपोर्ट से सामने आया है।’

देश में प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर में रिकॉर्ड गिरावट आई है, वहीं ग्रामीण मजदूरी वास्तव में घट रही है। तो साफ है कि देश प्रगति के बजाय के आर्थिक अवनति की दिशा में चल पड़ा है। जहां तक सकल घरेलू उत्पाद की तीव्र वृद्धि दर की बात है, तो तेजी से वित्तीय पूंजीवाद में तब्दील होती जा रही इस अर्थव्यवस्था में सारे लाभ उन सीमित वर्गों के हाथ में सिमट रहे हैं, जो संपत्ति पर रेंट कमा सकने में सक्षम हैं। जो लोग मेहनत-मजदूरी और उत्पादन-वितरण की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं, उनकी माली स्थिति तेजी से बिगड़ रही है।


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