Friday, January 28, 2022
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बसपा के सामने खोयी ताकत पाने की चुनौती

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जनवाणी संवाददाता  |

मेरठ: जो बसपा एक वर्ष पहले प्रत्याशी घोषित कर चुनाव की तैयारी में जुट जाती थी, इस बार बसपा चुनाव प्रचार में पिछड़ रही हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती की एक भी रैली नहीं हुई हैं। सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर बसपा काम करती थी। दरअसल, बसपा के लिए खोयी ताकत को पाने की बड़ी चुनौती हैं। 2007 में बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग को अपनाया, जिसमें बसपा को कामयाबी मिली और बसपा ने अपने दम पर सरकार बनाई थी।

तब बसपा का वोट प्रतिशत 30.43 प्रतिशत रहा था। बसपा में सर्वाधिक टूट भी हुई हैं, जो बसपा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। अब देखना यह है कि बसपा खोयी ताकत को कैसे पाएगी? यह बसपा के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। इस बार बसपा को ब्राह्मण वोटरों का ही सहारा हैं। सतीश मिश्रा को चुनाव मैदान में पहले से ही उतार रखा है। बड़ी तादाद में ब्राह्मण सम्मेलन किये गए।

बसपा ने वर्ष 2007 के चुनाव में हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णू महेश का नारा दिया था। बसपा ने दलित और ओबीसी के हटकर नया दांव खेला। बसपा ने पहली बार पार्टी में ब्राह्मणों को आगे बढ़ाया और सर्वाधिक टिकटें दी थी। बसपा ने वर्ष 2007 में 89 दलित उम्मीदवार उतारे और दूसरे नंबर पर 86 ब्राह्मणों को टिकट दिये थे। तब 2007 के चुनाव में बसपा के 41 ब्राह्मण विधायक जीत कर आए थे। वर्ष 2007 में ही बसपा ने अपने दम पर सरकार बनाई।

वर्ष 2007 के चुनाव में उतरने के लिए बसपा ने एक साल पहले ही उम्मीदवारों की घोषणा कर दी गई थी, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं किया। अभी तक बसपा के उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं हुई है। बसपा इस बार चुनाव प्रचार में भी पिछड़ रही हैं।

20 बरस पहले लड़ा था मायावती ने चुनाव

सहारनपुर की हरोड़ा सुरक्षित सीट से अंतिम बार 2002 में बनी थी विधायक

हरोड़ा ने ही विधायक बनाकर पहली बार भेजा था सदन

बसपा सुप्रीमो मायावती ने वर्ष 2002 के बाद विधानसभा का कोई चुनाव नहीं लड़ा है। उन्होंने आखिरी चुनाव 20 बरस पहले सहारनपुर जिले की हरोड़ा सुरक्षित सीट से लड़ा था और विधायक बनी थी। पहली बार विधायक बनने का सौभाग्य भी बहनजी को इस सीट से मिला था, जिसके बाद वह सूबे की मुखिया बनी, मगर हरोड़ा के बाद किसी सीट से विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ी। हालांकि बाद में मुख्यमंत्री रहते विधान परिषद की सदस्य रही। इस बार भी उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा की है।

गौरतलब है कि, बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती देश की बड़ी दलित नेता मानी जाती हैं। सत्ता में रहते वह अपने प्रशासनिक फैसलों को लेकर हमेशा चर्चा में रही। चार बार देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, मगर विधानसभा का चुनाव केवल दो ही बार लड़ी हैं।

बहनजी के नाम से मशहूर मायावती ने अपना पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 1996 में सहारनपुर जनपद की सुरक्षित सीट हरोड़ा से लड़कर इस सीट पर बसपा का खाता खोला था। यही से पहली बार चुनकर विधानसभा में पहुंची थी। इस चुनाव में उनकी जीत की बड़ी बात यह थी कि वह कुछ समय बाद ही राज्य की मुख्यमंत्री बन गई थी। दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2002 यूपी के आम चुनाव में मायावती ने इस सीट से दोबारा ताल ठोकी और लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की।

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