Wednesday, May 6, 2026
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रिश्तों की नई रिसन दे गया 2022

Samvad


01 1बीत गए वर्ष 2022 के बारे में कोई एक बात खम ठोककर कही जा सकती है, तो बस यही कि जाते-जाते इसने स्मृतिशेष कवि वीरेन डंगवाल द्वारा अपनी कविता में पूछे गए इस सवाल को और बड़ा कर दिया है कि ‘आखिर हमने कैसा समाज रच डाला है?’ इसका अर्थ यह नहीं कि राजनीति में विडम्बनाएं कम होने लगी हैं या वह अपनी पतनशील प्रवृत्तियों पर लगाम लगाने के संकेत देने लगी है। इसके उलट उसकी सदाबहार अनैतिकताएं व मूल्यहीनताएं अब हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचों को अपने डैनों में कहीं ज्यादा जकड़ने लगी हैं। इस कदर कि पति-पत्नियों, प्रेमी-प्रेमिकाओं और लिवइन पार्टनरों के ही नहीं, मां-बेटों और गुरु-शिष्यों के सम्बन्ध भी रिसने लगे हैं और मामले केवल श्रद्धा जैसी युवतियों को मारकर उनके शरीर के 35 टुुकड़े करने तक ही सीमित नहीं रह गए हैं। हालात की भयावहता को समझने के लिए पिछले कुछ महीनों की कुछ घटनाओं पर नजर डाल लेना भर पर्याप्त है। गत सितम्बर के अंत में उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के दो जवान बेटे अपनी जन्मदात्री माताओं के बुढ़ापे का सहारा बनने के बजाय उनके हत्यारे बन गए।

जिले के रामगांव थाना क्षेत्र के टेपरहा गांव की 55 वर्षीया चिंता देवी रुपयों के लिए नाराज होकर घर से चले गए अपने बेटे रामू को मनाने गर्इं तो उसने उनकी जान लेकर लाश घूर गड्ढे में दबा दी और यों अपने काम में लग गया जैसे कुछ हुआ ही न हो! भाइयों ने पूछा तो ढिठाई से गुनाह भी कुबूल कर लिया। दूसरी वारदात में मुर्तिहा कोतवाली क्षेत्र के अहिरनपुरवा गांव में नन्दरानी नाम की साठ साल की मां के निरंकार नामक नौजवान बेटे ने शराब और जुए की लत छोड़ने की नसीहत से चिढ़कर सूजे से चोंक-चोंककर उसे मार डाला।

इससे पहले बलरामपुर जिले के राजपुर थानाक्षेत्र के ग्राम पंचायत पहाड़खडूवा निवासी एक बेटे ने भी रुपये न देने पर अपनी मां की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी, जबकि इसी जिले के देहात कोतवाली क्षेत्र के रघवापुर गोसाईंपुरवा की प्रेमा देवी को अपने बेटे को ‘निरबंसिया’ कहने की कीमत उसके हाथों जान गंवाकर चुकानी पड़ी। लखनऊ में पंचम खेड़ा की यमुनानगर कालोनी के एक किशोर ने पिता की लाइसेंसी बन्दूक से अपनी मां को भून डाला, लाश घर में ही छिपा दी और दोस्तों के साथ आउटिंग व पार्टी वगैरह में मगन हो गया। दो दिन बाद बात पिता तक जा पहुंची तो ‘एक अंकल’ द्वारा हत्या की झूठी कहानी गढ़ ली।

‘कलयुगी’ पुत्रों का यों कुपुत्र बनना किसी एक जिले, अंचल या प्रदेश तक सीमित नहीं है। गत सितम्बर की दस तारीख को हरियाणा के जींद जिले के उझाना गांव में संजीव ऊर्फ काला नाम के बेटे ने अपनी वयोवृद्ध मां शांति देवी से झगड़ने के बाद चारपाई के पाये से दिनदहाड़े उसे उसकी चारपाई पर ही मार डाला, जबकि बिहार के सीतामढ़ी जिले की मां मीना देवी ने अपने बेटे को खून-पसीने की खाने की नसीहत दी तो उसने उसे चाकू से गोद डाला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के थाना ढली स्थित जुंगा के ठुंड गांव में पंडिताई करने वाले एक 36 साल के शख्स ने जरा-से पारिवारिक विवाद में दिनदहाड़े अपनी मां को तलवार भोंक दी।

चूंकि इन बेटों के मातृहंता बनने का सबसे प्रत्यक्ष कारण उनकी नशे की लत लगती है, इसलिए उनके किए का सारा ठीकरा उसी पर फोड़ना बहुत आसान है, लेकिन ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि ये नशे के इतने शिकार क्योंकर हुए कि उन्हें मां की हत्या भी बहुत छोटा गुनाह लगने लगा? जवाब समाजों व परिवारों की पतनशील प्रवृत्तियों द्वारा पोषित संस्कारहीनता की ओर ही संकेत करता है।

सवाल है कि जो संस्कारहीनता मनुष्य को मनुष्य, परिवार को परिवार, राजनीति को राजनीति, खेलों को खेल और मनोरंजन को मनोरंजन नहीं रहने दे रही, बेटों को बेटे ही क्योंकर रहने देगी? और क्यों नहीं कहा जाएगा कि इसकी जिम्मेदारी में बड़ा हिस्सा माताओं का ही है, जिन्हें बच्चों की पहली पाठशाला कहा जाता है।

अफसोस कि 2022 में ‘दूसरी पाठशालाओं’ में शिक्षक या गुरुजन भी अपना दायित्व निभाते नहीं दिखे। हाल में ही दिल्ली की मॉडल बस्ती की प्राथमिक पाठशाला में एक गुस्सैल शिक्षिका ने कक्षा पांच की वंदना नाम की छात्रा को कैंची से मारा, फिर पहली मंजिल से नीचे फेंक दिया। इसी तरह कर्नाटक के गडग जिले में हगली गांव के ‘आदर्श’ प्राथमिक विद्यालय के एक शिक्षक ने चौथी कक्षा के भरत नामक छात्र को पीटकर पहली मंजिल की बालकनी से धक्का दे दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।

सोचिये जरा, जिन गुरुओं के बिना ज्ञानप्राप्ति को सर्वथा असंभव बताया जाता है, अब वे शिष्यों को ज्ञान देने के बजाय उनकी जानें लेने लगे हैं! पहले शिष्य खुद गुरु चुना करते थे, लेकिन अब उनके लिए शिक्षक शिक्षा व्यवस्था चुनती और दावा करती हैं कि उसके द्वारा नियुक्त शिक्षक अध्यापनकुशल तो हैं ही, छात्रों से सलीके से पेश आना भी जानते हैं। लेकिन उसका दावा इतना भोथरा है कि राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के एक स्कूल के एक 12 साल के छात्र को उसके शिक्षक ने इतने से ‘कुसूर’ में पीट-पीट कर मार डाला कि उसने होमवर्क नहीं किया था। इससे पहले उत्तर प्रदेश के औरेया जिले में दसवीं कक्षा के ‘पढ़ाई में मन न लगाने वाला’ एक छात्र भी शिक्षक की पिटाई से मारा गया था, जबकि राजस्थान में एक शिक्षक ने एक दलित छात्र की मटके से पानी लेने के ‘अपराध’ में बेरहमी से जान ले ली थी।

ऐसे गुरुओं के रहते देश में बेहतर सामाजिक चेतना बेंहतर क्योंकर हो सकती है? हो सकती तो 2022 को देश के सर्वाधिक शिक्षित राज्य केरल में नरबलियों का साक्षी नहीं बनना पड़ता। क्योंकि तब केरल के पथानामथिट्टा जिले से भगवल सिंह व उसकी पत्नी लैला को जल्द अमीर बनने की हवस इतनी नहीं ही सताती कि वे तंत्र-मंत्र के चक्कर में फंसकर देवी को खुश करने हेतु दो महिलाओं की बलि देकर उनका मांस खायें! इसी अक्टूबर महीने में दक्षिणी दिल्ली की लोधी कॉलोनी में छ: साल के बच्चे की भी बलि चढ़ा दी गई थी। चढ़ाने वाले ने दावा किया था कि भगवान ने सपने में उसे ऐसा करने का आदेश दिया था। 21वीं सदी के 22वें साल में ऐसा सोच! सोचकर रूह कांप जाती है। क्या हमारे भविष्य को वैज्ञानिक चेतना से विपन्न ऐसी सोच वालों के हमारे बीच होने से बड़ा कोई खतरा हो सकता है?


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