Sunday, January 23, 2022
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सीट बंटवारे पर रालोद-सपा के बीच फंसा पेंच

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जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: विधानसभा चुनाव अधिसूचना जारी हो गई। 10 फरवरी को मतदान होगा। सपा और रालोद पार्टी के बीच अभी तक सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया हैं। सपा व रालोद सूत्रों के अनुसार वेस्ट यूपी की कुछ सीटों पर पेच फंसा हुआ है, जिसमें मेरठ, बागपत, शामली और मुजफ्फरनगर जिलों की सीटें हैं।

मुख्य रूप से शामिल हैं। रालोद यहां की सीटों पर अपनी दावेदारी कर रहा है, जबकि कई सीटें ऐसी है, जिसको लेकर सपा अड़ी हुई है। इसलिए सीटें फाइनल नहीं हो पा रहीं।

सपा मुखिया अखिलेश यादव और रालोद अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह की तीन दिन पहले लखनऊ में बैठक हुई, लेकिन इस बैठक में सीटों के बंटवारे पर अंतिम मुहर नहीं लग सकी। चर्चा के दौरान इन जिलों की सीटों पर ही पेंच फंसा रहा हैं।

फिलहाल जिन सीटों पर पेंच फंसा है, उनमें मेरठ की सिवालखास, शामली जिले की थानाभवन सीट भी है। यहां तीन सीटें हैं और तीनों में से दो पर दोनों पार्टियां अड़ी हुई हैं। कैराना सीट पर सपा और शामली सीट पर रालोद की उम्मीदवारी तय है, जबकि रालोद नेता शामली-थानाभवन और सपा नेता कैराना व थानाभवन पर दावा कर रहे हैं।

थानाभवन सीट से सपा के किरणपाल कश्यप 2002 में विधायक चुने गए थे, जबकि रालोद के अब्दुल राव वारिस 2007 में इस सीट से विधायक बने थे। 2012 से अभी तक वर्तमान कैबिनेट गन्ना मंत्री सुरेश राणा इस सीट से वर्तमान में विधायक हैं। रालोद अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह थानाभवन में नवंबर में रैली भी कर चुके हैं। माना जा रहा है कि रालोद इस सीट को आसानी से छोड़ने वाला नहीं है।

दोनों पार्टी ही जिले की दो सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती हैं। देखना है कि सीटों का बंटवारा किस फार्मूेले के तहत होता है। इसी तरह बागपत में भी तीन सीटें हैं। यहां भी दोनों पार्टियां दो सीटों पर अड़ी हुई है। सपा यहां छपरौली सीट रालोद को दे रही है, साथ ही रालोद छपरौली के अलावा बागपत भी मांग रही है।

मेरठ का हाल भी कुछ ऐसा ही है। यहां सात सीटें हैं। रालोद यहां सिवालखास, मेरठ दक्षिण, किठौर पर दावेदारी कर रहा है, लेकिन सपा इन सभी पर सपा भी अड़ी हुई है। सपा नेताओं का कहना है कि सिवालखास से गुलाम मोहम्मद उनके विधायक रहे थे और किठौर में शाहिद मंजूर चुनाव लड़ते रहे हैं।

यहां भी मुश्किल बनी हुई है। मुजफ्फरनगर की दो सीटों को लेकर पेंच फंसा हुआ है। इनमें खतौली की सीट भी शामिल है, जिसे रालोद मांग रहा है। इसके अलावा मोरना और बुढ़ाना सीट पर भी दावा है। सीटों को लेकर यह पेचीदगी मथुरा की दो सीटों पर भी दिक्कत पैदा हो रही है।

यही वजह है कि बंटवारे पर फैसला नहीं हो पा रहा। अब चुनाव अधिसूचना जारी हो गई है। एक सप्ताह के भीतर ही सपा-रालोद को अपने प्रत्याशी घोषित करने होेंगे।

जाट लैंड में भाजपा की चुनौतियां बड़ी

चुनौतियां बड़ी है। खासतौर पर फिर जाट लैंड में। वेस्ट यूपी से ही चुनाव की शुरुआत हो रही है। क्योंकि भाजपा के खिलाफ किसानों में सर्वाधिक नाराजगी का गढ़ भी वेस्ट यूपी ही है। ऐसे में चुनाव की शुरुआत भी यहीं से हो रही है, जो भाजपा के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।

इस बात को भाजपा के शीर्ष नेता भी जानते हैं। पंचायत चुनाव में भी भाजपा को मतदाओं ने निराश किया था, वह अलग बात है कि निर्वाचित पंचायत सदस्यों की खरीद-फरोख्त हुई, जिसके चलते भाजपा ने बढ़त बनाई, लेकिन ग्राउंड स्तर पर जो मतदान पंचायत चुनाव में हुआ, उसमें भाजपा की खासी किरकिरी पूरी वेस्ट यूपी में हुई थी। दरअसल, वेस्ट को जाट लैंड कहा जाता है, यहीं पर प्रथम चरण का चुनाव है, जिसमें भाजपा के लिए चुनौतियां भी बड़ी है।
जनता समझदार है, किसे वोट करना है, उन्हें पता है: राकेश

भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि जनता समझदार हैं। किसे वोट करना है, उन्हें पता है। एक माह से सारी वस्तु फ्री हो गई। बिजली में पचास फीसदी छूट दी हैं। हरियाणा में किसानों को बिजली सस्ती दी जा रही है।

फिर यूपी में क्यों नहीं? गांव की ज्यादा स्थिति खराब है। दूध की पॉलिसी आ रही है, जो बेहद खतरनाक है। दूध बेचकर ही महिलाएं बच्चों को पढ़ा रही है। जनता समझदार है। जनता बहुत कुछ करने वाली है। गांव वाले बहुत समझदार है। सोच-समझकर काम करेंगे। यदि किसी पार्टी से लाभ हुआ होगा उसे वोट करेंगे, यदि लाभ नहीं हुआ होगा तो उसके खिलाफ गांव के लोग वोट देंगे।

मायावती ने नहीं की एक भी जनसभा

वेस्ट यूपी में 10 फरवरी को वोटिंग हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह तक जनसभाएं कर चुके। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव व रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी दबथुवा में रैली कर चुके हैं, लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती वेस्ट यूपी में एक भी जनसभा नहीं की।

अब चुनाव आयोग ने 15 जनवरी तक किसी तरह की रैली, बाइक रैली तमाम गतिविधियों में रोक लगा दी है। हां, बसपा के सतीश मिश्रा ही सिर्फ ब्रह्ममण सम्मेलन वेस्ट यूपी में करके गए हैं, लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक भी जनसभा नहीं की। यह भी जनता के बीच चर्चा में हैं।

आखिर बसपा सुप्रीमो मायावती जनता के बीच क्यों नहीं पहुंची। बसपा चुनाव प्रचार के मामले में पिछड़ गई। चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले भी कोई प्रचार का हथियार बसपा ने नहीं अपनाया। आचार संहिता लगने से तीन पहले ही पूर्व राज्यसभा सदस्य मुनकाल अली को वेस्ट यूपी की जिम्मेदारी सौंपी।

इससे पहले वेस्ट यूपी बसपा में हाशिये पर चला गया। बसपा सुप्रीमो मायावती वेस्ट यूपी को लेकर इतनी उदासीनता क्यों बरत रही हैं, यह किसी के भी समझ में नहीं आ रहा है। फिर बसपा के सर्वाधिक नेता वेस्ट यूपी से पार्टी छोड़ रहे हैं।

अब भी कई ऐसे नेता है, जो बसपा को कभी भी अलविदा कहते हुए सपा व रालोद का दामन थाम सकते हैं। इसमें सबसे ज्यादा मुस्लिम लीडर शामिल है। मुस्लिमों में बसपा को लेकर जो संदेश गया है, वह बसपा के लिए ठीक नहीं रहा

। यही वजह है कि वेस्ट यूपी के ज्यादातर बड़े मुस्लिम लीडर बसपा को छोड़ चुके है या फिर छोड़ने के लिए लाइन में खड़े हैं।

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