Monday, March 16, 2026
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अमृतवाणी: संकट के समय

बम्मेर पोतन्ना नाम के एक संत श्रीमदभागवत का तेलुगू में रूपांतरण कर रहे थे। एक दिन वे गजेंद्र मोक्ष प्रसंग लिख रहे थे कि पीछे से आकर उनकी पत्नी का भाई श्रीनाथ पढ़ने लगा-मगर ने गजेंद्र यानी हाथी का पैर पकड़ा और वह उसे धीरे-धीरे निगलने लगा। प्राण संकट में पड़े देख गजेंद्र ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। उसकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण तुरंत वहां आ पहुंचे। जल्दबाजी में उन्हें अपना सुदर्शन चक्र लेने का ध्यान भी नहीं रहा। इसी प्रसंग पर श्रीनाथ रुक गया और मजाक उड़ाने के लिए बोला-आपने कैसे लिखा कि भगवान को सुदर्शन चक्र लेने का ध्यान नहीं रहा। सुदर्शन चक्र साथ में न लाएंगे तो गजेंद्र को मुक्ति कैसे मिलेगी? कुछ लिखने से पहले उसे अनुभव की कसौटी पर परखना जरूरी होता है। पोतन्ना उस समय चुप रहे। दूसरे दिन उन्होंने श्रीनाथ के बेटे को दूर खेलने भेज दिया और पास के एक कुएं में एक बड़ा पत्थर डाल दिया। आवाज होते ही पोतन्ना चिल्लाने लगे-श्रीनाथ, तुम्हारा बच्चा कुएं में गिर गया। सुनते ही श्रीनाथ दौड़ता आया और बिना सोचे-समझे कुएं में कूदने लगा। यह देख पोतन्ना ने उसे पकड़ लिया और बोले-बिना विचारे इस तरह कुएं में कूद रहे हो? यह भी नहीं सोचा कि तुम्हें तैरना आता है या नहीं। फिर बच्चे को निकालोगे कैसे? रस्सी-बाल्टी भी साथ में नहीं लाए। श्रीनाथ गंभीर हो गया तो पोतन्ना बोले- घबराओ मत, तुम्हारा बच्चा सामने से आ रहा है। मैं तुम्हें यह समझाना चाहता था कि अपने प्रिय पर संकट पड़ने पर क्या दशा हो जाती है। जैसे पुत्र-प्रेम के कारण तुम्हें रस्सी-बाल्टी लेना याद नहीं रहा, वैसे ही श्रीकृष्ण भी सुदर्शन चक्र लेना भूल गए। श्रीनाथ उनका आशय समझ गया।
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