Sunday, May 26, 2024
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कथनी-करनी

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Amritvani 18


ईर्ष्या करने वालों को कभी भी ईश्वर नहीं मिलता। ईश्वर सदैव मन की निर्मलता से प्राप्त होता है। ईर्ष्या करनी ही है तो टाटा, बिरला, डालमिया से करो, ताकि उनकी होड़ करते-करते उनसे आगे नहीं तो उनकी बराबरी में पहुंच सको। ईर्ष्या करनी ही है तो भगवान राम, कृष्ण, महावीर से करो, ताकि राम नहीं तो कम से कम हनुमान तो बन ही सको। सड़क छाप से ईर्ष्या करके क्या पाओगे? यह संसार दोगली नीति से चलता है। इसने अपनी दोहरी नीति अपना रखी है। कथनी-करनी का भेद वर्तमान समय में सारी विसंगतियां और विषमताएं पैदा कर रहा है। जीवन में कथनी और करनी का अंतर मिटाए बिना जीवन की सार्थकता प्राप्त नहीं होगी। पदार्थों की मिलावट से कहीं ज्यादा खतरनाक विचारों की मिलावट है। एक आदमी बाजार से जहर लाकर उसे जीवन से निजात पाने की उम्मीद के साथ खाकर सो गया। दूसरे दिन वह बडे आराम से उठा। अगले दिन वह मिठाई की दुकान से कुछ पेड़े ले आया, दो चार पेड़े खाए और सो गया। बेचारा आज तक नहीं उठा। विचारों की मिलावट से जीवन में जो जहर घुलता है, उसका कोई उपचार नहीं। आज के इंसान ने अपने चेहरे पर कई चेहरे लगा रखे है। एक चेहरा हो तो उसे पहचाने। इसने तो प्याज के छिलके की तरह चेहरे पर चेहरा, उस पर फिर चेहरा और उस पर एक बार फिर चेहरा लगा रखा है। असली चेहरे का पता ही नहीं चलता। अपना बेटा इंजिनियर बन जाए तो उसकी योग्यता में कसीदे पढ़ने लगता है और पड़ोसी का बेटा बन जाए तो कहते हैं-घूस देकर बना होगा। मुख पर कुछ और लगता है और मन में कुछ और रखता है। दुनिया को देख कर मंजिल तय मत करो, मंजिल तय करनी है तो संत की जिंदगी देखकर तय किया करो।


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