Thursday, May 21, 2026
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अपने भीतर रह रहे व्यक्ति की खोज

Ravivani 33


SUDHANSHU GUPTजितेंद्र भाटिया किताबों की सिर्फ संख्या बढ़ाने के लिए नहीं लिखते। वह स्वयं भी कहते हैं कि जब तक उनके पास लिखने के लिए कुछ विशेष न हो वह नहीं लिखते। समानांतर कहानी से अपना साहित्यिक सफर शुरू करने वाले जितेंद्र भाटिया बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। उनके अनेक कहानी संग्रह, उपन्यास, नाटक और वैचारिक पुस्तकों के अलावा विश्व साहित्य के अनुवाद के चार खंड-सोचो साथ क्या जाएगा-भी प्रकाशित हो चुके हैं। लेकिन उनकी ये तमाम कृतियों भी उन्हें जोखिम उठाने से नहीं रोकतीं-रचनात्मक जोखिम। हाल ही में जितेन्द्र भाटिया का उपन्यास ‘रुणियाबास की अंतर्कथा’ (संभावना प्रकाशन, हापुड़) पढ़ा तो यह बात और स्पष्ट हो गई। उपन्यास की शुरूआत होती है-ढलान से नीचे उतरते हुए मेरे मन में अचानक खयाल आया कि अपनी या किसी दूसरे आदमी की समूची जिन्दगी को क्या किसी सूरत में दुबारा जिया जा सकता है? जाहिर है हर व्यक्ति का यह सपना होता होगा कि जिन्दगी को एक बार फिर से जिया जाए या कम से कम ठहरकर, मुड़कर यह देखा जाए कि उसने कैसा जीवन जिया। इस इच्छा में कहीं यह भी निहित है कि क्या उसके भीतर कोई और व्यक्ति भी रहता था जिसकी उसने कभी नहीं सुनी। यह भीतर का व्यक्ति कभी बाहर क्यों नहीं आया। क्या इसे बाहर की दुनिया में कहीं खोजा जा सकता है। क्या ‘बाहर’ की दुनिया में ‘भीतर का यह आदमी मिल सकता है? लेकिन जितेंद्र भाटिया ‘निश्चित’ के पीछे नहीं भागते। लेखन में भी वह उसी पर कलम चलाते हैं जो दुविधामय है, भ्रमित है या अस्पष्ट है।

‘रुणियाबास की अंतर्कथा’ ‘ओझलबाबा’ उर्फ रामगोपाल चोरड़िया की तलाश से शुरू होती है। लेकिन पाठक को बार-बार यह लगता है कि कहीं यह तलाश भीतर रह रहे किसी व्यक्ति की ही तलाश तो नहीं है। कहीं यह अपने अकेलेपन से लड़ने का कोई कारगर तरीका तो नहीं है। जितेन्द्र भाटिया के पास विचार हैं, दर्शन है और वे समाज में आ रहे बदलावों से भी वाकिफ हैं। यही वजह है कि इस अंतर्कथा को लिखते समय लेखक रुणियाबास की गरीबी और अंधविश्वास तथा निकट के कस्बे के नारकीय जीवन को पूरी शिद्दत के साथ चित्रित करते हैं। अगर इस उपन्यास को सिर्फ ओझलबाबा की तलाश तक सीमित करके ही पढ़ा जाए तब भी इस उपन्यास में गजब की पठनीयता है। लेकिन जितेन्द्र भाटिया इकहरी कहानियां नहीं कहते हैं। वह जो कह रहे होते हैं, उसके समानांतर कोई और कथा भी आकार लेती रहती है।

सबसे पहले ओझल बाबा के ‘दर्शन’ लेखक को उस वक्त होते हैं, जब एक मरियल से पेड़ के पास घाघरे चोली वाली एक अधेड़ औरत पूजा के अंदाज में परिक्रमा करती, धीमे-धीमे स्वर में कुछ बुदबुदाते हुए मौली जैसा कोई सूत बांध रही थी। उसके करीब एक दुबला-पतला बूढ़ा जमीन पर बैठा था, जिसके सामने मेंड़ से सटाकर एक थाली रखी हुई थी। बूढ़ा किसी प्रार्थना की तरह दोहरा रहा है, ‘जै हो, जै हो ओझल बाबा…थाराई गीगला…किरपा हुकम…’ यह समझ में आता है कि अहाते के भीतर पेड़ों के झुरमुट के पीछे छिपे एक खंडहरनुमा झोंपड़े में ओझलबाबा रहता है। उसका असली नाम रोमगोपाल चोरड़िया है। यहीं से ओझलबाबा की तलाश शुरू होती है। इस तलाश के बहाने लेखक रुणियाबास की दुनिया, वहां की गरीबी, वहां फैले सच झूठ, वहां के विश्वास-अंधविश्वासों को तो चित्रित करता ही है, साथ ही आधी सदी की बदलती और बदल रही दुनिया को भी दिखाता है।

यह दुनिया लेखक स्कूल, स्कूल के टीचर, स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के माध्यम से रिफ्लेक्ट होती है। फर्स्ट पर्सन में लिखे गए इस उपन्यास में नायक की मां से जरिये लगभग पचास साल पहले की दुनिया भी दिखाई पड़ती है। यही नहीं पत्रकारिता की दुनिया के विरोधाभास और विसंगतियां भी उपन्यास में उकेरी गई हैं। लेकिन मूल कथा ओझलबाबा के इर्दगिर्द ही घूमती है। ओझलबाबा की तलाश में नायक लाडन बाई उर्फ भगवती देवी की कच्ची खपरैलों से ढंकी एक छोटी सी कोठरी तक पहुंच जाता है। लेकिन वहां भी उसे ओझलबाबा के होने का कोई प्रमाण नहीं मिलते। ओझलबाबा का होना या न होना दरअसल नायक के अस्तित्व से जुड़ गया है।

इसी खोज में नायक की मुलाकात डेविड नामक एक जर्मन से होती है। जर्मन में वह मालिश का काम करता था। डेविड बताता है कि उसकी अपनी पत्नी से नहीं बनती। वह हमेशा कहती है कि मैं इतना सनकी मिजाज इसलिए हूं क्योंकि मुझमें अपने मरे हुए पिता का यहूदी खून है। वह भी यहां ओझलबाबा की ही खोज में आया है। रुणियाबास में उसे बाबा के चालीस वर्षों के अज्ञातवास और उनकी अलौकिक शक्तियों के बारे में बहुत सी जानकारियां मिलती हैं। अब नायक के साथ एक और व्यक्ति (डेविड) ओझलबाबा की खोज में जुट जाते हैं। कहीं ऐसा लगता है कि डेविड और कथा का नायक दोनों ही अपनी-अपनी खोज ओझलबाबा में तलाश रहे हैं। लेखक एक जगह लिखता है-शाम के उजाले की दम तोड़ती परछाइयों को पीछे छोड़ते हुए मुझे लगा कि मैं और वह जर्मन मालिशवाला, दोनों ही उस ओझलबाबा की तलाश के बहाने अरअसल अपने अंतर्मन और सबकांशस में उम्र भर की उस नाकाम अनास्था का कोई कारगर तोड़ ढूंढ निकालने के लिए तड़प रहे हैं और हमारे इस खोजी अभियान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अब अंधेरे में डूब चुके उस खंडहर की ओट में दुबका हमारे सामने प्रकट हो जाने के इंतजार में है…

डेविड और नायक की यह खोज पूरी होती है या नहीं, और पूरी होती है तो किस रूप में यह उपन्यास को पढ़कर ही जाना जा सकता है। जोखिम और सवालों के बिना कोई भी उपन्यास पूरा नहीं होता। जितेन्द्र भाटिया का यह उपन्यास दोनों को साथ लेकर चलता है। पढ़ते हुए बार-बार आपकी आँखों के सामने चालीस साल पहले का समय जीवित हो उठता और जीवित हो उठते हैं उस समय के सवाल जो आज भी उसी तरह खड़े हुए हैं। यह अकारण नहीं है कि जितेन्द्र भाटिया के उस उपन्यास में कंटीले पौधों का एक बेतरतीब जंगल है, लेकिन इस जंगल पर सामंतवाद का शिकंजा नहीं है। यहां बातूनी मैनाएँ हैं, लंबी पूंछ वाले हरियल तोते हैं, पहाड़ी कौए हैं और हैं आम लोगों की जिंदगियां। जितेन्द्र भाटिया पर्यावरण और सामंतवाद के विरुद्ध अपनी बात बड़े सहज ढंग से कहते हैं। यही बात इस उपन्यास को बड़ा उपन्यास बनाती हैं। जितेन्द्र भाटिया ने इस उपन्यास में खिलंदड़ भाषा का प्रयोग किया है, जो निश्चित रूप से पठनीयता में इजाफा करती है। मूल रूप से उपन्यास अपने भीतर बस गए उस व्यक्ति की ही खोज है जो बाहर दिखाई नहीं देता।


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