Thursday, April 25, 2024
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सांप-आपका दुश्मन!

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कुंवल प्रेमिल |

सांप कितना ही खतरनाक क्यों न हो पर है वह मनुष्य के लिए फायदेमंद ही। इसके जहर से तरह-तरह की दवाइयां ईजाद की गयी हैं। कहावत है कि कांटे से कांटा निकाला जाता है। उसी प्रकार इनके विष से इनके विष का ही उपचार किया जाता है। भारत में न जाने कितनी जानें सर्पदंश के कारण तथा दवाओं के अभाव एवं ओझा पंडों के झाड़ फूंक के चक्कर में चली जाती हैं।

सांप के नाम से ही दिलो-दिमाग में दहशत छा जाती है। कलेजा थक से हो जाता है और बदन में फुरहरी होने लगती है। धरती से सटकर चलने से यह पूरी तरह साफ दिखाई भी नहीं देता। अंधेरे-उजाले पैर पड़ा नहीं कि उसने डसा।

यह है भी बिना ठीक ठिकाने वाला जीव। यह पहनने ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों से लेकर जूते-चप्पल, छप्पर-आंगन, बाग-बगीचों, गली-खेत, सडक-मैदान, नदी-नालों, रेगिस्तानों, दलदलों से लेकर आपके खाट-पलंग कहीं भी, कभी भी मिल सकता है। ये विभिन्न आकारों वाले होते हैं। कुछेक बिलकुल छोटे तो कुछेक बड़े डरावने और भयानक, अलग-अलग रंग-

रूप के, अलग-अलग स्वभाव, प्रवृत्तियों और मनोवृत्तियों वाले होते हैं।
पूरी धरती पटी पड़ी है इन विषधरों से। यही प्रकृति की खूबी है कि हर प्राणी के रचना विधान में उसने अपनी अनोखी प्रतिभा का इस्तेमाल किया है। मादा बिच्छू का पेट फाडकर बच्चे बाहर निकलते हैं तो सांपिन अपने बच्चे स्वयं खा लेती है। वह अंडे फोडकर नन्हें-नन्हें सपोलों को उदरस्थ कर लेती है। जो भाग जाते हैं वही आगे बढकर अपनी उम्र पाते हैं। ऊपर से नेवला, मोर, बाज आदि पक्षी भी बराबर उनकी संख्या घटाते रहते हैं। सबसे बड़ा दुश्मन है यदि कोई तो वह है मनुष्य जो उसे देखते ही मारने दौड़ पड़ता है।

सांप कितना ही खतरनाक क्यों न हो पर है वह मनुष्य के लिए फायदेमंद ही। इसके जहर से तरह-तरह की दवाइयां ईजाद की गयी हैं। कहावत है कि कांटे से कांटा निकाला जाता है। उसी प्रकार इनके विष से इनके विष का ही उपचार किया जाता है। भारत में न जाने कितनी जानें सर्पदंश के कारण तथा दवाओं के अभाव एवं ओझा पंडों के झाड़ फूंक के चक्कर में चली जाती हैं।

सर्प विष अमूल्य है, सोने के मूल्य से भी कई गुना ज्यादा कीमती। इसे निकालकर संग्रहित करने के लिए कई सर्पगृह निर्मित किये गये हैं। वहां इन्हें पाला भी जाता है। इनकी वंश वृद्धि के लिये कई उपाय भी किये गये हैं। इनके जहर संबंधी खोज कार्य निरन्तर चलते रहते हैं।

अगर इसे रोजी का जरिया माना जाए तो पता चलेगा कि इन सांपों को पकड़-पकड़कर कई लोग पल रहे हैं। कुछ लोग इन्हें पकडकर इन सर्पगृहों में ले जाते हैं जहां इनका विष निकाला जाता है। सरकार की तरफ से इन लोगों को पारिश्रमिक के अलावा कई सहूलियतें प्रदान की गयी हैं।

कई सर्प ऐसे होते हैं जिन्हें लेकर सीमित अवधि के अन्दर हैडक्वार्टर पहुंचाना पड़ता है। जरा सी देर होने पर टिपारियों में बंद सांप मृत हो सकते हैं और परिश्रम-पैसा बेकार जाने का अंदेशा रहता है। तरह-तरह के जहरीले सांप पकड़ने वालों का पारिश्रमिक भी उन सांपों की भयंकरता व जहरीलेपन आदि के आधार पर तय किया जाता है।

सांप अमूमन धरती के अंदर बिल में घुसकर रहता है। इसे स्वयं बिल बनाना नहीं आता। यह औरों के बिल में जबरदस्ती घुसकर मिट्टी, अंडे, चिडि?ां और कीड़े-मकोड़े खाकर जीवन व्यतीत करता है। इनमें अजगर वृहद शरीर का स्वामी होता है। अजगर बिल के अलावा दरख्तों-झाड़ियों, गढ़ों आदि में भी रह जाता है। अजगर खरगोश, लोमड़ी, सियार आदि के अलावा एक समूचा हिरण भी आसानी से खा सकता है।

भारत में यूं तो कई जाति-प्रजाति के सर्प हैं पर नाग, ब्लैक कोबरा, अजगर, करैंत, घोड़ापछाड़ (घामन), दींयर, तक्षक आदि मुख्यत: हैं। वाटर स्नेक पानी में रहता है और उसका जहर ज्यादा तेज नहीं होता। इसके काटने से आदमी बेहोश या घबरा सकता है परन्तु मर नहीं सकता। सांप मैदानी, पथरीली, रेगिस्तानी तथा दलदली जगहों में आराम से रह लेता है। जलवायु और मिट्टी का इनके रंग रूप और स्वभाव पर असर पड़ता है जिसके कारण इनमें विभिन्नता पायी जाती है।
बिहार में पाया जाने वाला सांप धामन है जो गाय के पिछले पैरों में लिपटकर मजे से उसका दूध पीता रहता है। कुछ सांपों की जाति बदला लेने वाली भी होती है। वैज्ञानिकों और प्राचीन किदवंतियों में सांपों के मामले में अनेक मतभेद हैं जिनपर अभी खोज जारी है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सांप जहां मानव का दोस्त है, वहां उसका दुश्मन भी कम नहीं। यदि संभलकर कदम रखे जाएं तो यह दोस्त ही है, दुश्मन नहीं।


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