Thursday, February 22, 2024
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गर्मी की छुट्टियां और बच्चे

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BALWANI


छुट्टियों और सामान्य दिनचर्या में अंतर होना चाहिए जिसे अनुभव कर हमारी भावी पीढ़ी अपने मन में व्याप्त हिचक-अज्ञानता तथा संकोच को छोड़कर देश का जिम्मेदार नागरिक बनें। यदि हम गर्मी की छुट्टियों का सदुपयोग कर सकें तो मशीनी जिंदगी जीते हमारे बच्चों के जीवन में ऐसी सकारात्मकता आएगी, जिससे उनका सर्वांगीण विकास जो होगा ही साथ ही एक नई ताजगी ओर ऊर्जा भी मिलेगी, जो वर्षभर उपयोगी रहेगी।

भारत की जलवायु विषम होने के कारण यहां गर्मियों में बहुत अधिक गर्मीं तथा सर्दियों में असहनीय ठंड होती है। प्रतिकूल मौसम सभी प्राणियों को विचलित कर देता है। ऐसे में छोटे-मोटे बच्चों की क्या दशा होती है, इसे समझना मुश्किल नहीं है। इसी अवधारणा को ध्यान में रखते हुए, वार्षिक परीक्षाओं की समाप्ति तथा नये सत्र के आरम्भ होने के कुछ-ही दिनों बाद, जब सूर्य देव अपने पूरे यौवन पर होते हैं। देश के अधिकांश भागों के स्कूलों में लंबी छुट्टियां हो जाती हैं।

कुछ समाज-शास्त्रियों का मत है कि ये लंबी छुट्टियां एक अवसर के साथ-साथ चुनौती भी होती हैं। वर्ष-भर की कड़ी मेहनत पढ़ाई- पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई में डूबे छात्रों के जीवन में घर कर रही जड़ता, नीरसता से निजात पाने का अवसर है, तो दूसरी ओर वर्ष-भर की कमियों को दूर करने की चुनौती भी है।

सामान्य दिनों में स्कूली बच्चें सुबह से शाम तक मशीनी जीवन जीते हैं। सुबह बिस्तर छोड़ते ही स्कूल की तैयारी। स्कूल से छूटने के बाद भोजनादि से निवृत्त होकर घंटे भर के लिए भी आराम नहीं कर पाते कि ट्यूशन का समय हो जाता है। वहां से लौटते ही होम-वर्क और न जाने, क्या-क्या? अधिकांश विद्यालयों में मैदान का अभाव है। इस कारण स्कूलों में भी बच्चे खेल-कूद नहीं पाते और बच्चे चिड़चिड़ेपन के शिकार हो जाते हैं। छुट्टियां बच्चों मे हुए परिवर्तन को जानने का सबसे अनुकूल समय होता है। कोशिश करे कि बच्चे कम से कम ये दो महीने मशीनी जीवन से हटकर तनाव-मुक्त जीवन जी सकें।

प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर और न जाने क्या-क्या बनाने के स्वप्न देखते हैं, ऐसे में उन्हें बच्चों का पढ़ने के सिवाय अन्य कोई भी कार्य समय की बर्बादी लगता है। अभिभावकों द्वारा थोपे गए लक्ष्य को प्राप्त करने में बच्चों का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और वे अनेक तरह की विकृतियों के शिकार हो जाते हैं। इन छुट्टियों का सदुपयोग यदि बच्चे में सृजनात्मक रूचि को जागृत किया जा सके, तो न केवल उसके व्यक्तित्व का विकास होगा, बल्कि पूरे समाज को उनकी प्रतिभा से लाभ हो सकता है।

आज बड़े से बच्चे तक जिसे भी देखें मोबाइल में नजरें गड़ाये दिखाई देते हैं। ये छुट्टियां मोबइल, इंटरनेट के माध्यम से सोशल मीडिया के अप्रमाणित तथ्यों में उलझने के लिए नहीं, जीवन के यथार्थ को समझने के लिए हैं। प्रकृति के सान्निध्य के लिए है। अपनी जड़ों अर्थात अपने पूर्वजों के गांव से जुड़ने और वहां के जन जीवन को निकट से देखने, समझने और आत्मसात करने के लिए है।

यदि बजट अनुमति दे तो इन छुट्टियों में पर्यटन के लिए देश के अन्य स्थानों पर जा सकते हैं। इससे बच्चों को उस क्षेत्र की संस्कृति और भूगोल को करीब से जानने का मौका मिलता है, जो पुस्तकों से प्राप्त जानकारी से हटकर ऐसा व्यावहारिक ज्ञान होता है जो हमेशा के लिए स्मृति पटल पर अंकित हो जाता है। देश के विभिन्न भागों की यात्राओं से राष्ट्रीय एकता की भावना की मजबूत होती है।

यदि पर्यटन की योजना हो तो सबसे पहले उस स्थान विशेष की जलवायु और भौगोलिक स्थिति की जानकारी प्राप्त कर उसी के अनुसार अपनी पैकिंग करें। अगर किसी सगे-संबंधी के घर पर ठहरना है, तो उसके लिए कोई उपहार अवश्य ले जाएं। मेहमान न बनकर परिवार के सदस्य की तरह रहें। घर के कामकाज में हाथ बंटाएं। अगर कहीं घूमने जाते हैं, तो उनके बच्चों को भी अवश्य ले जायें। अगर ज्यादा दिन रुकने की योजना है, तो कोशिश रहे कि उन पर आर्थिक रूप से बोझ न बनें। किसी तीर्थस्थान पर जाना है तो वहां धर्मशाला की सहज व्यवस्था हो सकती है।

हर प्राणी को अपनी जन्मभूमि- मातृभूमि से लगाव होता है। हम भी इसके अपवाद नहीं हो सकते। वह गांव जिसे कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण छोड़ना पड़ा हो, परंतु वहां बीता बचपन, वहाँ की माटी की खुशबू, वहाँ के खेत -खलिहान, अपने बुजुर्गों का घर हमें बार-बार याद आते हैं। ऐसे में हमें जब भी मौका मिले वहां जाकर पुरानी यादों को ताजा करने में अलौकिक सुख की अनुभूति होती है। तो क्यों न हम इन छुट्टियों में चलें गांव की ओर …।

अगर कहीं नहीं भी जा रहे हैं तो भी निराश होने वाली कोई बात नहीं है। हर सुबह सैर पर जाना, व्यायाम करना, ताजे फल और सब्जियों के रसास्वादन को अपनी और अपने परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। यदि स्थान हो तो गार्डनिंग की रूचि पैदा करने की कोशिश करें। बच्चों को कोर्स के अतिरिक्त भी कुछ अच्छी पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करें। हर शाम उनके साथ बैठ उस पुस्तक पर चर्चा करें। संभव हो तो एक देशी अथवा विदेशी भाषा सीखने के लिए बच्चें को प्रेरित किया जा सकता है।

यह विशेष उल्लेखनीय है कि छुट्टियों और सामान्य दिनचर्या में अंतर होना चाहिए जिसे अनुभव कर हमारी भावी पीढ़ी अपने मन में व्याप्त हिचक-अज्ञानता तथा संकोच को छोड़कर देश का जिम्मेदार नागरिक बनें। यदि हम गर्मी की छुट्टियों का सदुपयोग कर सकें तो मशीनी जिंदगी जीते हमारे बच्चों के जीवन में ऐसी सकारात्मकता आएगी, जिससे उनका सर्वांगीण विकास जो होगा ही साथ ही एक नई ताजगी ओर ऊर्जा भी मिलेगी, जो वर्षभर उपयोगी रहेगी।

डा. विनोद बब्बर


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