
इस वर्ष की बरसात पूरे देश के लिए तबाही ले कर आई है, किंतु हिमालयी क्षेत्रों में जिस तबाही के दर्शन हुए हैं, वे अभूतपूर्व हैं। शिमला-सिरमौर से लेकर चंबा तक तबाही का आलम पसर गया है। सड़कें बंद हैं, चक्की का रेल पुल बह गया है। बहुमूल्य जन-धन की क्षति झेलने पर मजबूर हैं। मंडी में 22 लोग काल का ग्रास बन गए हैं। प्रदेश में कई लोग अभी लापता हैं। अगस्त 18 से लेकर 20 दोपहर तक, जो बारिश देखने को मिली वह शायद ही आमतौर पर यहां होती हो। कुल्लू जिला की स्थिति भी बहुत ही खराब हुई है। चारों ओर बादल फटने जैसी स्थिति दिखाई दे रही थी। यह वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन का परिणाम तो है ही, किंतु हिमालय में तापमान वृद्धि दर वैश्विक औसत से ज्यादा होने के कारण भी है। हिमालय की संवेदनशील परिस्थिति को देखते हुए लंबे समय से हिमालय के लिए अलग विकास मॉडल की मांग होती रही है। मुख्यधारा का विकास मॉडल हिमालय क्षेत्र के अनुकूल नहीं है, जिसकी नकल करने के लिए हम मजबूर किए गए हैं। नीति आयोग ने हिमालयी राज्य क्षेत्रीय परिषद् का गठन करके एक तरह से हिमालय-वासियों की समस्याओं और संभावनाओं को मैदानी क्षेत्रों से अलग दृष्टिकोण से देखने की उम्मीद और मांग को मान्यता देने की पहल की है, जिसका खुले दिल से स्वागत तो किया ही जाना चाहिए। हिमालय की प्राकृतिक स्थिति बहुत संवेदनशील है और इसकी कुछ विशेषताएं हैं, जिनका ध्यान रखे बिना किया जाने वाला हर विकास कार्य हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकीय व्यवस्था को हानि पंहुचाने का कारण बन जाता है। भले के नाम पर किया जाने वाला कार्य भी उल्टा पड़ जाता है, जिसकी कीमत हिमालय-वासियों के साथ-साथ पूरे देश को हिमालय से प्राप्त होने वाली पर्यावरणीय सेवाओं में बाधा और ह्रास के रूप में चुकानी पड़ती है।
वर्ष 1992 में भी डा. एसजेड कासिम की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ दल का गठन किया गया था, जिसकी संस्तुतियां भी हिमालयी राज्यों की पारिस्थिक अवस्था के आधार पर बनी थीं। उसके बाद विकास की जिस वैकल्पिक सोच को जमीन पर उतारने के लिए संस्थागत व्यवस्था खड़ी करने के सुझाव दिए गए थे वे लागू नहीं हो सके और बात एक रिपोर्ट तक ही सिमट रह गई। इस बार नीति आयोग ने 2017 में पांच कार्य समूह (वर्किंग ग्रुप) विभिन्न मुद्दों को लेकर बनाए थे। इनकी रिपोर्ट अगस्त 2018 में आने के बाद यदि कुछ महीनों के भीतर ही ‘हिमालयी क्षेत्रीय परिषद’ का गठन कर दिया जाता तो माना जा सकता था कि सरकार इस दिशा में कुछ गंभीर है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के डा. वीके सारस्वत हिमालयी क्षेत्रीय परिषद के अध्यक्ष बनाए गए हैं। परिषद, पांच कार्य-समूहों की रिपोर्टों के आधार पर कार्यवाही बिंदु तय करेगी और हिमालयी राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा हिमालय क्षेत्र में विकास के टिकाऊ मॉडल को क्रियान्वित करने और अनुश्रवण करने में सहायता करेगी। यानि इस परिषद की भूमिका हिमालय के वैकल्पिक विकास मॉडल के सन्दर्भ में काफी महत्वपूर्ण रहने वाली होगी। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि परिषद को अपनी भूमिका निर्वहन के लिए पर्याप्त शक्तियां भी दी जाएंगी। हिमालयी क्षेत्रीय परिषद आपदा प्रबंधन, ऊर्जा, ढांचागत विकास, परिवहन, वन, जैव-विविधता, शहरीकरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि प्रमुख क्षेत्रों के विषयों में भी आकलन प्रस्तुत कर सकेगी, जिसके आधार पर हिमालय क्षेत्रों में टिकाऊ विकास के लिए दिशानिर्देश और रूपरेखा विकसित की जाएगी।
हिमालय में टिकाऊ विकास के लिए खतरों या रुकावटों को यदि चिन्हित करने का प्रयास किया जाए तो स्पष्ट होगा कि पांच कार्य-समूहों के अतिरिक्त ऊर्जा, ढांचागत विकास, सडकें, परिवहन और पर्यावरण विनाशक उद्योग टिकाऊ विकास को दिग्भ्रमित करने वाले मुख्य कारक रहे हैं। इनको संज्ञान में तो लिया गया है, किंतु अच्छा होता यदि इनके लिए भी अलग-अलग विशेष कार्य-समूह बनाकर विशेषज्ञ संस्तुतियां प्राप्त कर ली जातीं। हिमालय में बड़ी चौड़ी सड़कें अपने साथ भारी तबाही ले कर आती हैं। आवागमन की सुविधा में सुधार की खुशी, उसके कारण होने वाली तबाही को भुला देती है। उसके खिलाफ कोई आवाज उठाएगा तो विकास विरोधी कहलाया जाएगा, इस डर से या अपने-अपने निहित स्वार्थों के चलते कोई कुछ नहीं बोलता, इसलिए सड़क निर्माण में पर्वतीय क्षेत्रों में क्या सावधानियां बरती जानी चाहिए इस बात का कोई ख्याल तक नहीं करता। हिमालय में यदि सड़कें कट एंड फिल विधि से बनाई जाएं तो 30 प्रतिशत तक खर्चों में वृद्धि तो होगी, किंतु निर्माण कार्य के दौरान होने वाली तबाही से बड़ी हद तक बचा जा सकता है। सडकों के विकल्प के रूप में कुछ जगहों पर रोप-वे या मोनो-रेल जैसे विकल्पों पर भी सोचा जाना चाहिए।
पर्वतीय प्रदेशों की सरकारें आर्थिक संसाधनों के दबाव के चलते कई बार अवांछित या पर्यावरण के विनाशक तरीकों से भी आय की आशा में फैसले कर लेती हैं, जिन पर अंकुश वैकल्पिक व्यवस्थाओं को प्रोत्साहन देकर ही लग सकता है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हिमालयी राज्य क्षेत्रीय परिषद ऐसे जरूरी मुद्दों पर विशेषज्ञ कार्य-समूह बनाकर मुख्यधारा की विकास अवधारणाओं से हटकर हिमालय के लिए उपुक्त तकनीकों का प्रचालन करवाने में मुख्य भूमिका निभा सकेगी। जाहिर है, वर्तमान कार्य-समूह रोजगार को मुख्य बिंदु मानकर गठित किए गए हैं, जबकि पर्यावरण मित्र विकास के लिए विधि-निषेध का ध्यान रखा जाना बहुत जरूरी है। हिमालय में क्या नहीं होगा यह उतना ही जरूरी है जितना कि यहां क्या होगा, यह जरूरी है।
हिमालय-वासियों और हिमालय की चिंता करने वाले सभी लोगों को इस परिषद का स्वागत करना चाहिए, परिषद को भी चाहिए कि इस क्षेत्र के अनुभवी लोगों और संगठनों-संस्थाओं को जोड़कर आगे बढ़ने की संस्कृति को अपना कर कार्य करे। विकास के मॉडल से जुड़े मामलों में समुदायों को भी मुख्य दावेदार माना जाना चाहिए, जबकि आमतौर पर प्रबन्धन से जुड़े विभागों, औद्योगिक और वाणिज्यिक दावेदारों को ही मुख्य भूमिका में देखा जाता है। यह चिंता का विषय है कि तमाम उम्मीदों के बाबजूद 3-4 साल बीत जाने के बाद भी इस परिषद् का कोई प्रभाव या कार्य जमीन पर तो दिखाई नहीं दिया है। इन प्रकृति की छेड़-छाड़ जनित प्रकोपों को देखकर यदि हम आपातकालीन समझ को जगाकर जग जाएं तो ही समाधान की दिशा में बढ़ सकेंगे। केंद्र और राज्य सरकारें एवं हिमालयी क्षेत्रीय परिषद इस दिशा में शीघ्र सक्रिय हों यही आशा और मांग है।


