Thursday, May 21, 2026
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आस्तिकता बनाम नास्तिकता

 

Samvad 1

SHELENDRA CHOUHAN  धर्म के प्रति मुख्य आकर्षण का एक कारण यह है कि यह अनिश्चित दुनिया में सुरक्षा का काल्पनिक अहसास दिलाता है। लेकिन बावजूद इसके दुनिया भर में नास्तिकता बढ़ रही है। कैलिफोर्निया में क्लेरमोंट के पिटजर कॉलेज में सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर फिल जकरमैन कहते हैं, ‘इस समय दुनिया में पहले के मुकाबले नास्तिकों की संख्या बढ़ी है।’

नास्तिकों की संख्या में सबसे अधिक बढ़ोत्तरी उन देशों में हुई है जो अपने नागरिकों को आर्थिक, राजनीतिक और अस्तित्व की अधिक सुरक्षा देते हैं। अविकसित और पिछड़े देशों में धर्म यथावत बना हुआ है या आंशिक वृद्धि हुई है। वहां की राजसत्ताएं इसीलिए विकास और शिक्षा के तर्कसम्मत और वैज्ञानिक मूल्यों को तरह-तरह से अवरोधित करती हैं तथा धर्म एवं पाखंड को बढ़ावा देती हैं। जापान, कनाडा, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड्स, चेक गणराज्य, एस्तोनिया, जर्मनी, फ्रांस, उरुग्वे ऐसे देश हैं जहां 100 साल पहले तक धर्म महत्वपूर्ण हुआ करता था लेकिन अब इन देशों में ईश्वर को मानने वालों की दर सबसे कम है।

इन देशों में शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था काफी मजबूत है, असमानता कम है और लोग अपेक्षाकृत अधिक धनवान हैं। न्यूजीलैंड की आॅकलैंड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक क़्वेंटिन एटकिंसन कहते हैं, ‘असल में, लोगों में इस बात का डर कम हुआ है कि उन पर क्या बीत सकती है।’ लेकिन धर्म में आस्था उन समाजों और देशों में भी घटी है, जिनमें खासे धार्मिक लोग हैं जैसे-ब्राजील, जमैका और आयरलैंड। प्रोफेसर फिल जकरमैन कहते हैं, ‘दुनिया में बहुत कम समाज हैं, जहां पिछले 40-50 साल के मुकाबले में धर्म में आस्था बढ़ी है। एक अपवाद ईरान हो सकता है, लेकिन सही से आंकना मुश्किल है क्योंकि धर्मनिरपेक्ष लोग अपने विचार छिपा भी रहे हो सकते हैं।’

नास्तिकता अथवा नास्तिकवाद या अनीश्वरवाद, वह सिद्धांत है जो जैसा कि माना जाता है कि जगत की सृष्टि करने वाले, इसका संचालन और नियंत्रण करने वाले किसी भी ईश्वर के अस्तित्व को सर्वमान्य प्रमाण के न होने के आधार पर स्वीकार नहीं करता। नास्तिक लोग ईश्वर (भगवान) के अस्तित्व का स्पष्ट प्रमाण न होने कारण झूठ करार देते हैं। नास्तिकों के विचार में आस्तिकों द्वारा दिए गए ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए सभी प्रमाण प्रमाणाभास हैं। अधिकांश नास्तिक किसी भी देवी देवता, परालौकिक शक्ति, धर्म और आत्मा को नहीं मानते।

ईश्वरवादी कहते हैं कि मनुष्य के मन में ईश्वरप्रत्यय जन्म से ही है और वह स्वयंसिद्ध एवं अनिवार्य है। यह ईश्वर के अस्तित्व का द्योतक है। इसके उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि ईश्वर भावना सभी मनुष्यों में अनिवार्य रूप से नहीं पाई जाती और यदि पाई भी जाती हो तो केवल मन की भावना से बाहरी वस्तुओं का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। मन की बहुत सी धारणाओं को विज्ञान ने असिद्ध प्रमाणित कर दिया है। जगत में सभी वस्तुओं का कारण होता है। बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। कारण दो प्रकार के होते हैं-एक उपादान, जिसके द्वारा कोई वस्तु बनती है और दूसरा निमित्त, जो उसको बनाता है। ईश्वरवादी कहते हैं कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत् भी एक कार्य (कृत घटना) है अतएव इसके भी उपादान और निमित्त कारण होने चाहिए। कुछ लोग ईश्वर को जगत का निमित्त कारण और कुछ लोग निमित्त और उपादान दोनों ही कारण मानते हैं। इस युक्ति के उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि इसका हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत भी किसी समय उत्पन्न और आरंभ हुआ था।

इसका प्रवाह अनादि है, अत: इसके सृष्टा और उपादान कारण को ढूँढने की आवश्यकता नहीं है। यदि जगत का स्रष्टा कोई ईश्वर मान लिया जाए तो अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा; यथा, उसका सृष्टि करने में क्या प्रयोजन था? भौतिक सृष्टि केवल मानसिक अथवा आध्यात्मिक सत्ता कैसे कर सकती है? यदि इसका उपादान कोई भौतिक पदार्थ मान भी लिया जाए तो वह उसका नियंत्रण कैसे कर सकता है? वह स्वयं भौतिक शरीर अथवा उपकरणों की सहायता से कार्य करता है अथवा बिना उसकी सहायता के? सृष्टि के हुए बिना वे उपकरण और वह भौतिक शरीर कहाँ से आए? ऐसी सृष्टि रचने से ईश्वर का, जिसको उसके भक्त सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और कल्याणकारी मानते हैं, क्या प्रयोजन है, जिसमें जीवन का अंत मरण में, सुख का अंत दु:ख में संयोग का वियोग में और उन्नति का अवनति में हो? इस दु:खमय सृष्टि को बनाकर, जहां जीव को खाकर जीव जीता है और जहां सब प्राणी एक दूसरे के शत्रु हैं और आपस में सब प्राणियों में संघर्ष होता है, भला क्या लाभ हुआ है?

ईश्वरवादी एक युक्ति यह दिया करते हैं कि इस भौतिक संसार में सभी वस्तुओं के अंतर्गत और समस्त सृष्टि में, नियम और उद्देश्य सार्थकता पाई जाती है। यह बात इसकी द्योतक है कि इसका संचालन करनेवाला कोई बुद्धिमान ईश्वर है इस युक्ति का अनीश्वरवाद इस प्रकार खंडन करता है कि संसार में बहुत सी घटनाएं ऐसी भी होती हैं जिनका कोई उद्देश्य, अथवा कल्याणकारी उद्देश्य नहीं जान पड़ता, यथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अकाल, बाढ़, आग लग जाना, अकालमृत्यु, जरा, व्याधियाँ और बहुत से हिंसक और दुष्ट प्राणी। संसार में जितने नियम और ऐक्य दृष्टिगोचर होते हैं उतनी ही अनियमितता और विरोध भी दिखाई पड़ते हैं। इनका कारण ढूंढ़ना उतना ही आवश्यक है जितना नियमों और ऐक्य का। जैसे, समाज में सभी लोगों को राजा या राज्य प्रबंध एक दूसरे के प्रति व्यवहार में नियंत्रित रखता है, वैसे ही संसार के सभी प्राणियों के ऊपर शासन करने वाले और उनको पाप और पुण्य के लिए यातना, दंड और पुरस्कार देने वाले ईश्वर की आवश्यकता है।

इसके उत्तर में अनीश्वरवादी यह कहता है कि संसार में प्राकृतिक नियमों के अतिरिक्त और कोई नियम नहीं दिखाई पड़ते। पाप और पुण्य का भेद मिथ्या है जो मनुष्य ने अपने मन से बना लिया है। यहां पर सब क्रियाओं की प्रतिक्रियाएं होती रहती हैं और सब कामों का लेखा बराबर हो जाता है। इसके लिए किसी और नियामक तथा शासक की आवश्यकता नहीं है। यदि पाप और पुण्य के लिए दंड और पुरस्कार का प्रबंध होता तथा उनको रोकने और करानेवाला कोई ईश्वर होता; और पुण्यात्माओं की रक्षा हुआ करती तथा पापात्माओं को दंड मिला करता तो ईसा मसीह और गांधी जैसे पुण्यात्माओं की नृशंस हत्या न हो पाती। दर्शन का अनीश्वरवाद के अनुसार जगत स्वयं संचालित और स्वयं शासित है। ईश्वरवादी ईश्वर के अस्तित्व के लिए जो प्रमाण देते हैं, अनीश्वरवादी उन सबकी आलोचना करके उनको काट देते हैं।

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