मोदी जी के विरोधियों ने भी क्या हद ही नहीं कर दी। पहले कहते थे कि मोदी जी की पार्टी की विचारधारा जहरीली है। भगवाछाप वाले गरीबों को हिंदू-मुसलमान, दलित-सवर्ण में लड़ाते हैं और देश और समाज में जहर फैलाते हैं। फिर कहने लगे कि भगवाछाप की सरकार आ गयी है, हर तरफ जहर फैला रही है। और अब, जबसे राजधानी दिल्ली में भगवाइयों की सरकार आयी है, पट्ठों ने एक नयी ही तान छेड़ रखी है। उठते-बैठते एक ही राग है-राजधानी की हवा में जहर घुल गया है। दिवाली तक तो फिर भी गनीमत थी। बात होती भी तो प्रदूषण की। पर जब से भगवा सरकार ने अदालत से पटाखों की इजाजत दिलवायी और जब से हिंदू के नाम पर भक्तों ने कई साल बाद जी-खोलकर पटाखामय दीवाली मनायी है, तब से तो भाई लोगों ने प्रदूषण की बात ही करनी बंद कर दी है। सीधे हवा में जहर की बात हो रही है।
हवा, पानी, बादल, सब कुदरत के मामले हैं। कुदरत के मामलों में बेचारी रेखा गुप्ता कैसे दखल दे सकती हैं। वह बेचारी तो नॉन-बायोलॉजीकल भी नहीं हैं। फिर भी उन्होंने पूरी कोशिश की है। सबसे पहले तो उन्होंने श्रीमान नॉन-बायोलॉजीकल की सीख पर चलते हुए, पब्लिक को यह समझाने की कोशिश की कि हवा न खराब होती है और न अच्छी होती है। जहरीली होने का तो सवाल ही नहीं उठता है। बस विरोधियों के प्रचार के प्रभाव में हम यह मानने लगते हैं कि हवा खराब हो गयी है। दिवाली की पटाखामय रात में जब एक्यूआइ यानी वायु गुणवत्ता सूचकांक छत फोड़कर ऊपर निकल गया, नॉन बायोलॉजीकल जी का अनुसरण करते हुए सरकार ने निर्णायक कार्रवाई की। उस कत्ल की रात में एक्यूआइ नापने के यंत्रों को ही बंद करा दिया। रही बात फेफड़ों की, तो आम हिंदुस्तानी फेफड़ों ने कहां साफ हवा देखी है, जो पहचान लेंगे कि हवा खराब।
उधर अयोध्या में योगी जी ने लाखों दिए एक साल जलवाने का रिकार्ड बनवाया, तो इधर रेखा जी ने दिल्ली की हवा के विश्व में सबसे ज्यादा प्रदूषित होने का, उससे भी शानदार रिकार्ड बनाया। पर विश्व रिकार्ड बनाकर भी बेचारी रेखा जी को बदनामी ही मिली। वायु प्रदूषण नापने की मशीनें दिवाली की अगली सुबह से दोबारा चालू करानी पड़ीं, वह ऊपर से। पर एक्यूआइ डाल-डाल तो रेखा जी भी पात-पात।
प्रदूषण नापने की मशीनें तो चालू हो गयीं, पर उन मशीनों के ही इर्द-गिर्द पानी का छिड़काव करने वाली मशीनें भी चालू कर दी गयीं। प्रदूषण के माप के लिए हवा मशीन में जाए, तो पानी में नहा-धोकर, साफ-सुथरी होकर जाए। उससे भी काम नहीं चला तो बादलों में रसायन का छिड़काव करा दिया कि बादल बरस जाए और हवा धुलकर साफ हो जाए। पर वह भी फेल हो गया। क्यों न ट्रिपल इंजन की सरकार, जहर का ही नाम बदलकर अमृत कर दे। समाज में तो जहर को अमृत बताकर बांटा ही जा रहा है। अब हवा में भी जहर का नाम अमृत सही। फेफड़े बैठेंगे भी तो भी अमृत पीकर। वैसे भी अमृत काल चल रहा है।

