Monday, December 6, 2021
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Homeसंवादआंधी और मंद हवा

आंधी और मंद हवा

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आंधी को अपनी शक्ति पर बड़ा घमंड था। एक दिन चलते-चलते उसने अपनी छोटी बहन मंदवायु से कहा-तुम भी क्या धीरे-धीरे बहती रहती हो। तुम्हारे चलने से एक पत्ता तक नहीं हिलता, जबकि मेरे प्रचंड वेग के आगे बड़े-बड़े वृक्ष धराशायी हो जाते हैं। जब मैं उठती हूं, तो दूर-दूर तक लोग मेरे आने की खबर चारों ओर फैला देते हैं।

मुझे देखकर लोग खिड़की-दरवाजे बंद कर अपने घरों में दुबक जाते हैं। पशु-पक्षी अपनी जान बचाकर इधर-उधर भागते फिरते हैं। मेरे प्रभाव से बस्तियां धूल में मिल जाती हैं। क्या तुम नहीं चाहती कि तुम्हारे भीतर भी मेरे समान शक्ति आ जाए? आंधी की ये बातें सुनकर मंदवायु हौले से मुस्कराई, मगर उसने कोई जवाब नहीं दिया।

वह धीरे-धीरे अपनी यात्रा पर बढ़ चली। उसे आते देखकर नदियां, ताल, जंगल, खेत सभी मुस्कराने लगे। बगीचों में तरह-तरह के फूल खिल उठे। रंग-बिरंगे फूलों के गलीचे बिछ गए। वातावरण महक उठा।

पक्षी कुंजों में आकर विहार करने लगे। ऐसा लग रहा था मानो पूरी प्रकृति अपनी बांहें पसारकर उस मंदवायु का स्वागत करने को आतुर हो। इस तरह अपने कार्यों द्वारा मंदवायु ने अपनी शक्ति का परिचय आंधी को आसानी से करा दिया।

यह देख आंधी बोली-मैं ही गलत थी बहन। भले ही मेरा वेग और पराक्रम तुमसे अधिक हो, पर सकारात्मक प्रभाव तो तुम्हारा ही अधिक है। यही कारण है कि तुम्हारी आमद से चारों ओर इतनी खुशियां फैल जाती हैं।

सज्जन व्यक्तियों का जीवनक्रम भी मंदवायु के समान चारों ओर सुरभि, सौंदर्य और प्रसन्नता फैलाने वाला होता है। वे पराक्रम में नहीं, अपने सौजन्य में महानता देखते हैं। यही कारण है कि वे हर जगह सम्मान पाते हैं।


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