Sunday, October 24, 2021
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Homeसंवादक्या बदलाव लाएगी महापंचायत ?

क्या बदलाव लाएगी महापंचायत ?

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राकेश टिकैत के बेबस आंसुओं से मर्माहत होकर एक विशाल जन-सैलाब इसी साल 29 जनवरी को मुजफ़्फरनगर के गवर्नमेंट इंटर कॉलेज के मैदान में खुद-ब-खुद उमड़ पड़ा था। कुछ महीनों बाद कल पूरी तैयारी के साथ इसी मैदान में हुई किसान महापंचायत में जन-सैलाब का कोई ओर-छोर शायद ही पकड़ में आए। मुजफ़्फरनगर कई बड़े राष्ट्रव्यापी बदलावों की शुरुआत का गवाह रहा है। सवाल यही है कि संख्य़ा की दृष्टि से अभूतपूर्व रहा यह जन-जुटान राजनीतिक बदलाव के लिहाज से कितना कारगर साबित होगा?

मुजफ़्फरनगर की महापंचायत कई वजहों से काबिल-ए-जिक्र है। महेंद्र सिंह टिकैत के जमाने में जो भारतीय किसान यूनियन एक बड़ी ताकत मानी जाती थी, वह कालांतर में अपना रुतबा खोकर छोटी-मोटी बार्गेनिंग और सत्ता के साथ के रास्ते तलाशते रहनी जैसी तोहमतों से घिरती रही थी।

थोड़ा पीछे देखें तो सितंबर 2013 में मुजफ़्फरनगर-शामली में भयानक सांप्रदायिक हिंसा से पहले जिस पटकथा पर काम चल रहा था, उसमें राकेश और नरेश टिकैत बंधु थोड़ा-बहुत इधर-उधर हाथ-पांव मारकर अप्रासंगिक से हो गए थे और अंतत: भाकियू के हिंदू-मुस्लिम एकता वाले जैसे-तैसे भरम को भी बरकरार नहीं रख सके थे।

आठ साल बाद 2021 के नवंबर में तीन नए कृषि कानूनों को लेकर पंजाब और हरियाणा की किसान यूनियनों के दिल्ली कूच के बाद पैदा हुई परिस्थितियों के दबाव में राकेश टिकैत यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर पहुंचे तो उनकी विश्वसनीयता पर शक किया जा रहा था।

लेकिन, 28 जनवरी की रात में जब अचानक पुलिस की घेराबंदी के बीच राकेश टिकैत सरेंडर की मुद्रा में थे तो सरकार समर्थक चैनलों और भाजपा समर्थकों के उत्पात से बेबस होकर उनकी आंखों से आंसू बह निकले थे और रुंधे गले से निकली उनकी बातों ने किसानों खासकर हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों के दिलों में तूफान खड़ा कर दिया था।

हरियाणा जो उनके असर की जमीन भी नहीं थी, के गांवों से रातोंरात किसानों के रेले के रेले उनके समर्थन में गाजीपुर ब़ॉर्डर पहुंच गए थे। 29 जनवरी को उनके जिले मुजफ्फरनगर में मुख्यालय पर स्थित गवर्नमेंट इंटर कॉलेज में एक बड़ा जन-सैलाब जो यहां अब तक का सबसे बड़ा स्वत: स्फूर्त जमावड़ा था, उमड़ पड़ा था। यह किसान आंदोलन के लिए भी और राकेश टिकैत के लिए भी एक टर्निंग पॉइंट था।

अब हरियाणा के किसानों की पहली पसंद राकेश थे और आंदोलन में वे प्रमुखतम चेहरे बन चुके थे। आज भी भले ही बहुत से लोग कहें कि आंदोलन में उनकी स्थिति बाय चॉइस न होकर परिस्थितिजनक है, पर सच यह है कि वे अपने जिले में शान के साथ एक असरदार उपस्थिति के रूप में लौटे हैं।

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले हुई यह किसान महापंचायत इस आंदोलन के भविष्य और देश-प्रदेश के सियासी मंजर के लिहाज से बेहद अहम है। आंदोलन में हस्तक्षेपकारी दिल्ली के आसपास के प्रदेशों से बहुत दूर बंगाल के नतीजों पर किसान नेताओं का असर कितना था, यह बात अब पुरानी हो चुकी है।

अब सवाल य़ही है कि उत्तर प्रदेश जो भाजपा के उभार और पुनर्जीवन दोनों के लिए उर्वर साबित होता रहा है, वहां किसान आंदोलन क्या बदलाव लाने में कामयाब होगा? यूं भी आंदोलन के बाहर और भीतर दोनों जगहों से बार-बार यह सवाल उठाया जा रहा था कि राकेश टिकैत गाजीपुर बॉर्डर पर भले ही जितने बड़े सूरमा हों पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने जिले तक में उनका असर ज्यादा मायने नहीं रखता है।

रविवारकी महापंचायत उनके आलोचकों के लिए एक जवाब है। अपराजेय माने जाने लगी भाजपा जैसी ताकत के सामने जब राजनीतिक दल आंदोलन खड़े करने का साहस खो चुके हों, तब किसान आंदोलन प्रतिरोध की अकेली मिसाल और मशाल की तरह मकबूल हुआ। माना जा रहा है कि एक नए इलाके में हुई महापंचायत की कामयाबी संयुक्त किसान मोर्चे और उसके विभिन्न राज्यों के समर्थकों के मनोबल को भी मजबूत करेगी।

गौरतलब है कि मुजफ़्फरनगर कई बड़े बदलावों की शुरुआत में शामिल रहा है। कांग्रेस में अपने नेता राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स और स्विस बैंक खातों जैसे मसलों पर तूफान खड़ा कर देने वाले और अंतत: कांग्रेस को रसातल की तरफ खिसका देने वाले वीपी सिंह ने पहली बगावती रैली गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, मुजफ़्फरनगर के मैदान में ही की थी।

माना जाता है कि 2013 में मुजफ़्फरनगर में ही बड़े पैमाने पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के असर ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर पहुंचा दिया था। अब भाकियू समर्थक दावा कर रहे हैं कि 2013 की सांप्रदायिक हिंसा ने किसान राजनीति में जाटों और मुसलमानों के बीच जो खाई पैदा कर दी थी, उसे किसान आंदोलन ने पाट दिया है। दावा किया जा रहा है कि जो मुजफ़्फरनगर भाजपा की ताजपोशी की वजह बना था, अब वही विदाई का भी कारण बनेगा। लेकिन इन दावों और हकीकत के बीच एक बेहद कड़ा इम्तहान है।

यह सही है कि दिल्ली और आसपास के कई राज्यों में कम से कम जाटों के बीच भाजपा के प्रति 2013 जैसी स्थिति नहीं है। मुजफ़्फरनगर के जाट बाहुल्य वाले गांवों तक में किसान आंदोलन के असर ने आज एक बड़ा फर्क़ पैदा किया है। भाजपा गैर जाट वोटों के अपने पक्ष में ध्रुवीकरण का हवाला देकर भले ही निश्चिंतता प्रदर्शित करे पर हकीकत में ऐसा भी नहीं है। किसानों की हालत बद से बदतर हुई है।

जिस इलाके में रैली हुई है, वहां की मुख्य फसल गन्ने के भाव और भुगतान को लेकर ही हालत निराशाजनक है। सवाल यही है कि किसान आंदोलन से पैदा माहौल का लाभ उठाने में विपक्षी पार्टियां कितनी सक्षम हैं या किसान मोर्चा के पास ही क्या ऐसी कुव्वत है कि वह विमर्श को गैर जाट किसान जातियों के बीच ले जा सके। खेती-किसानी पर संकट के बावजूद सवर्ण किसानों में तो भाजपा का असर है ही, ओबीसी में आने वाले किसान, मजदूर, कारीगर तबके भाजपा की बड़ी ताकत माने जाते हैं। यह भी मानना भूल होगा कि जाटों के बीच भाजपा का आधार खत्म हो गया है।

किसान आंदोलन से उम्मीद पर निर्भर विपक्षी पार्टियां खुद निष्क्रिय़ बनी हुई हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो यह भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या महापंचायत की मेगा सक्सेस टिकैत बंधुओं की राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को तो हवा नहीं दे देगी। जाटों के बीच भाकियू और खाप नेताओं की मास अपील तो रहती आई है पर उनके सीधे राजनीतिक होने को स्वीकार नहीं किए जाने का चलन रहा है।

सवाल यही है कि क्या टिकैत सीधे राजनीति में उतरने का लोभ संवरण कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी को अपनी पारी खेलने देंगे जो इस आंदोलन की बदौलत सपा से गठबंधन में ज्यादा से ज्यादा सीटों की उम्मीदें कर रहे हैं। और सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि किसान आंदोलन और विपक्षी पार्टियों के पास आक्रामक सांप्रदायिक अभियानों की क्या काट होगी।


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