Wednesday, May 20, 2026
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एंबेसडर अब की बार क्या बनेगी जनता की प्रिय कार

Ravivani 33


AMITABH Sहिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड ने देश में एंबेसडर का पहला कारखाना कोलकाता में 1946 में स्थापित किया और पहली कार 1951 में सड़क पर आई। तब एंबेसडर बंद होने से पहले तक हर साल हिंदुस्तान मोटर्स की कम से कम 60 फीसदी कारें भारत सरकार खरीदती थी। उधर उन दिनों मारुति सरकार को एक आंख नहीं भाती थी। क्योंकि मारुति और उसके बाद भारतीय सड़कों पर उतरीं सभी कारें विदेशी लगती थीं। जबकि अंदर- बाहर से अंबेसडर ठेठ हिंदस्तानी कार लगती थी। अन्य कारों के मुकाबले इसकी बॉडी खूब मजबूत भी थी। हिंदुस्तानी कारों की दुनिया की बड़ी खबर है कि भारत की ठेठ अपनी एंबेसडर कार अब अपनी सड़कों पर फिर दौड़ने की तैयारी कर रही है। आम लोगों में इस की जबरदस्त चाह जगाने के लिए छोटा-आकर्षक नाम एम्बी तय हुआ है। ऐसे मुमकिन करने के लिए एंबेसडर बनाने वाली ‘हिंदुस्तान मोटर्स कंपनी’ ने यूरोप की एक आॅटोमोबाइल कंपनी के साथ भारत आने का अनुबंध किया है। फिलहाल यूरोपीय सांझेदार के नाम को सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन माना जा रहा है कि डील प्यूजो के साथ हुई है। दोनों कंपनियां मिलकर फिर से कंपनी के उत्तरपारा कारखाने में कारों के साथ स्कूटरों का उत्पादन भी करेंगी।

तय है कि हिंदुस्तान मोटर्स की एंबेसडर 1970 के दशक तक भारत की सड़कों पर राज करती थी। 1980 के सालों से लगातार मारुति सुजुकी जैसी शानदार विदेशी कारें उतरने से कद्र घटी जरूर, लेकिन सरकार में पहली पसंद बनी रही।लेकिन दुर्भाग्य से 2014 में इसका उत्पादन पूर्णत: बंद कर दिया गया। एंबेसडर की खूबियों में, बैठने की ज्यादा जगह, आराम, सुरक्षा, लंबे सफर के लिए उत्तम, कल-पुर्जों के लिए सस्ती, दूर- दराज और उबड़- खाबड़ रास्तों में बखूबी दौड़ना शुमार है। पेट्रोल, डीजल और सी एन जी तीनों र्इंधनों से चलने की सुविधा से लेस थी। बताते हैं कि अब एंबेसडर इलेक्ट्रिक अवतार में लौट रही है। लेकिन इससे पहले कंपनी इलेक्ट्रिक 2-व्हीलर्स बनाना शुरू करेगी। नई ‘एम्बी’ के डिजाइन, नए अकार- प्रकार और इंजन को लेकर काम चल रहा है।

उल्लेखनीय है कि कोलकाता के नजदीक उत्तरपारा कार प्लांट देश का सबसे पुराना कारों का कारखाना है। जापान में ट्योटा के प्लांट के बाद यह एशिया का दूसरा सबसे पुराना कार कारखाना है। दो राय नहीं कि 1990 के सालों तक केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री, सांसद, विधायक और तमाम आला अफसरों से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक सफेद रंग की एंबेसडर कार में सैर करते थे। चूंकि अस्सी के दशक के सालों में, आम लोगों के दिलोदिमाग पर मारुति छाने लगी, फिर भी एंबेसडर की सरकारी पसंद में फर्क नहीं आया। इसके प्रति सरकार का लगाव ज्यों का त्यों बरकरार रहा। लेकिन 2000 के दशक के दौरान, अटल बिहारी वाजपेयी पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने एंबेसडर का त्याग किया, और बी एम डब्ल्यू कार को पी एम ओ की अधिकारिक कार बना दिया।

अगले प्रधानमंत्रियों ने भी इस परिपाटी को जारी रखा। हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड ने देश में एंबेसडर का पहला कारखाना कोलकाता में 1946 में स्थापित किया और पहली कार 1951 में सड़क पर आई। तब एंबेसडर बंद होने से पहले तक हर साल हिंदुस्तान मोटर्स की कम से कम 60 फीसदी कारें भारत सरकार खरीदती थी। उधर उन दिनों मारुति सरकार को एक आंख नहीं भाती थी। क्योंकि मारुति और उसके बाद भारतीय सड़कों पर उतरीं सभी कारें विदेशी लगती थीं। जबकि अंदर- बाहर से अंबेसडर ठेठ हिंदस्तानी कार लगती थी। अन्य कारों के मुकाबले इसकी बॉडी खूब मजबूत भी थी। एंबेसडर के जमाने में मारुति की अकेली जिप्सी जीप ही सरकारी क्षेत्र में खरीदी जाती रही। उस दौर में सरकार द्वारा खरीदी हर ढाई हजार मारुति वाहनों में से 2,200 से ज्यादा मारुति जिप्सी थीं। ट्योटा से पहले तक जिप्सी ही पुलिस की जीप कहलाती रही।

संदेह नहीं कि एक से एक नई और शानदार कारें स्टेटस सिम्बल बन कर उभरी हैं। इसलिए अब नए अवतार में एंबेसडर भी क्रेज की तरह छाने को बेकरार है। लेकिन पिछली बार यह आम आदमी की पसंद क्यों नहीं बन पाई ? 1990 के दशक की कार पसंद पर किए एक अध्ययन से जाहिर हुआ कि शहर के भीतर कार चलाने में मारुति 800 आगे रही, जबकि लंबी दूरी के लिए कार के इस्तेमाल में एंबेसडर ने बाजी मार ली। और आखिरी मसला रहा- उपभोक्ताओं की बदली पसंद यानी साधारण कार या आरामदायक फैशनबुल कार ? इस दायरे में मारुति और उच्च श्रेणी की कारों ने तहलका मचा दिया। इस दौड़ में एंबेसडर इस कदर पिछड़ गई कि बंद होने की नौबत आ गई।

ऐसा नहीं है कि तब एंबेसडर को जनता की प्रिय कार बनाने की कोशिशें नहीं की गर्इं। लोकप्रियता की तमाम कसौटियों पर खरे उतरने के लिए समय-समय पर एंबेसडर में बदलाव किए गए। पूल कार के रूप में डीजल एंबेसडर को उतारा गया। नोवा मॉडल को ड्राइवर चलित कार की शक्ल दी गई। एक दिक्कत आई कि आखिर एंबेसडर के ढांचे को छेड़छाड़ किए बगैर कैसे नई शक्ल दी जाए ? इसी वजह से, एंबेसडर 1800 आई एस जेड मॉडल पेश किया गया। बाहरी दांचा एकदम पहले जैसा, लेकिन चुस्त पिक-अप और आरामदायक सफर के लिए 1817 सीसी का 74 हार्स पॉवर का इसूजू इंजन लगाया गया, रेडियल टायर और पॉवर ब्रेक डाले गए। खूबसूरत डैशबोर्ड, नया स्टेयरिंग और जबरदस्त ठंडक देता एयरकंडीशन कार की पुरानी छवि को बदलने में सहायक साबित हुए। लगातार कोशिशें जारी रहीं कि कैसे बाहरी लुक को छेड़े बगैर भीतर से ड्राइविंग का एक बिल्कुल अलग और आधुनिक अहसास जगाया जाए।

यही नहीं, एंबेसडर अपनी भारी- भरकम लुक ही नहीं, अतिरिक्त भार को उतरने में भी जुटी रही। कार के कई स्टील के पार्टस के बदले प्लास्टिक इस्तेमाल किया गया। ऐसे यह कम वजन की वजह से, कम ईंधन में ज्यादा चलने में सक्षम हो गई। हिंदुस्तान मोटर्स के सहयोगी उपक्रम ह्यनेशनल इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज लिमिटेडह्ण ने फ्रांस की प्लास्टिक कंपनी ‘ओमलियम इंडस्ट्रीज’ के साथ कारोबारी समझौता किया। एंबेसडर के बंपर, डेशबोर्ड और ईंधन की टंकी मजबूत ब्लो- प्लास्ट से बनाए गए। वैसे, प्लास्टिक ओमनियम इंडस्ट्रीज से फोर्ड, जनरल मोटर्स, वोक्सवेगन, टयोटा जैसी नामी कारों के लिए प्लास्टिक के उपकरण बनाता रहा है। बहरहाल, सवाल है कि पहले तो एंबेसडर सरकारी कार बन कर ही रह गई, क्या सालों बाद इस बार यह जनता की प्रिय कार बन कर उभरेगी। हालांकि पहले से एक से एक शानदार कारों से पटे भारत के बाजार में जनता की प्रिय कार बनना आसान सफर तो नहीं होगा।


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