Wednesday, September 22, 2021
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ग्लोबल गांव में हिंदी कहा है?

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ग्लोबल गांव में हिंदी कहां है? इस बातचीत का एक सिरा तो ऐसा है जिसमें लोग हिंदी दुनिया की सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा बताते हैं, परंतु अन्य लोग ऐसा नहीं मानते, क्योंकि सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा बताते हुए शोधकर्ता हिंदी प्रयोग मेंउर्दू को भी जोड़कर देखते हैं। दूसरा पक्ष अंग्रेजी, चीनी और हिंदी को सर्वाधिक प्रसार व प्रयोग वाली भाषा मानने वालों का है, जिसमें हिंदी दूसरे या तीसरे स्थान पर हो सकती है। एक शोध और है जो हिंदी को स्पेनिश के बाद चौथे स्थान पर बताता है। दुनियाभर में फैले प्रवासियों के हिंदी प्रयोग, लेखन, शिक्षण, मीडिया, अनुवाद तथा विदेशियों द्वारा हिंदी प्रयोग का आकलन संतुष्टि देने वाला नहीं है, क्योंकि प्रवासी रूप में जाने के बाद भारत के हिंदी प्रयोगकर्ता क्षेत्र के अधिकांश निवासियों में उनकी भावी पीढ़ियों में हिंदी का प्रयोग बहुत कम हो गया है।

वैश्विक स्तर पर भारतीयों द्वारा सांस्कृतिक आयोजनों में अंग्रेजी का चलन बहुत बढ़ा है, इसलिए विश्व के अनेक देशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की संपर्क भाषा केवल हिंदी नहीं है। इसलिए भारत के बाहर हिंदी को लेकर असमंजस पर विदेशी भी भारतीयों की हिंदी विषयक उदासी की अक्सर चर्चा करते हैं। एक रूप हिंदी का वैश्विक स्तर पर शिक्षण का भी है।

अब महत्वपूर्ण देशों में हिंदी अध्ययन हो रहा है। इसमें बहुत बड़ा योगदान भारत के बाहर हिंदी शिक्षण की व्यवस्था और प्रसार का दायित्व निर्वाह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद का भी है। दुनिया में अनेक देशों में हिंदी पीठ नहीं है और कोरोना के कारण भी अनेक देशों में पीठों पर नियुक्ति नहीं हुई है।

विदेशों में हिंदी फिल्मों, मीडिया माध्यमों, हिंदी गीतों से हिंदी प्रचार होता है और सोशल मीडिया में ब्लॉग लेखन, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम सहित सभी माध्यमों में हिंदी प्रयोग बढ़ा है।

भारत में नई शिक्षा नीति आने के बाद मातृभाषा एवं स्थानीय भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग कितने राज्य करेंगे, बाद में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में हिंदी प्रयोग किस रूप में बढ़ेगा और उच्च शिक्षा तक किन-किन उपाधियों के लिए हिंदी अध्ययन संभव होगा, इसका लेखा-जोखा कुछ वर्षों में हमारे सामने आएगा, लेकिन वर्तमान स्थिति में विधि, तकनीकी, विज्ञान, समाज विज्ञान, चिकित्सा शिक्षा सहित महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हिंदी माध्यम से शिक्षण उस रूप में नहीं हो प्रारंभ हो पाया जिसकी आवश्यकता थी।

यद्यपि भारत सरकार द्वारा स्थापित वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा शब्दकोशों, नए शब्दों का निर्माण किया गया है तथापि इन विषयों में हिंदी में पुस्तक लेखन कम है। इसका प्रभाव शिक्षण पर भी दिखाई देता है। यद्यपि हिंदी में बोलकर लिखने और यूनिकोड के आने के बाद लेखन गति बढ़ी है और साहित्य तथा संचार माध्यमों में हिंदी तेजी से बढ़ी है।

गैर हिंदी भाषी कहे जाने वाले राज्यों में सरकारी कामकाज ही नहीं, शैक्षणिक क्षेत्र में भी हिंदी का प्रयोग बहुत कम है। इसलिए अब हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होने के लिए हमें पहले देश में हिंदी को सभी रूपों में स्थापित करने की आवश्यकता है।

सबसे अधिक आवश्यकता शिक्षण माध्यमों और रोजगार में हिंदी को लाने की है। इसका तात्पर्य है कि सभी विषय हिंदी में पढ़ाए जाएं और सरकारी ही नहीं व्यावसायिक और निजी संस्थाओं में भी हिंदी में काम का प्रचलन बढ़े। आज हम हिंदी क्षेत्रों में इस रूप में उदासी देखते हैं।

हिंदी भाषी राज्यों में भी छोटे व्यापारिक संस्थानों से लेकर, विद्यालयों से विश्वविद्यालयों तक के नाम अंग्रेजी में लिखे मिलते हैं। इस स्तर पर बहुत क्रांतिकारी नीति की आवश्यकता है, क्योंकि निजी संस्थानों में कंप्यूटर और तकनीकी में हिंदी बहुत कम है। ऐसी संस्थाओं में हिंदी का प्रयोग बढ़ेगा, तभी हिंदी निखरेगी।

असम से लेकर केरल, पंजाब और जम्मू कश्मीर तक सभी राज्यों में हिंदी का शिक्षण और प्रचार हो रहा है, किंतु यह सब हिंदी विभागों में ही हो रहा है। आवश्यकता सभी प्रकार के विषयों के शिक्षण में हिंदी की है। इसी प्रकार गैर हिंदी क्षेत्र से कहे जाने वाले भारतीय राज्यों में भी उसकी मान्यता हो।

राजभाषा के संवैधानिक प्रावधानों को लागू करते हुए अगर हिंदी प्रयोग मंत्रालयों, कार्यालयों, दूतावासों में बढ़ेगा तभी भविष्य में दुनिया की पहली भाषा के रूप में हिंदी भी देख सकते हैं। अंग्रेजी के वैश्विक प्रचार को हिंदी और चीनी मंदारिन ने ही टक्कर दी है।

अब अंतरराष्ट्रीय रूप में हिंदी के विविध स्थानीय प्रयोग और लेखन शैलियों को मान्यता देनी होगी और देश- विदेश में व्यापक प्रचार-प्रसार करना होगा। साथ ही शिक्षण और रोजगार माध्यमों में हिंदी को लाना होगा।

दुनिया अब ग्लोबल गांव हो गई है, पर सरपट गति से भागती दुनिया में हिंदी के प्रयोग को गति और सामर्थ्य तभी मिलेगी जब वह वास्तविक जमीन पर ताकत देगी। इसके लिए उसे समर्थन के भाषण और नारेबाजी के बजाए ज्ञान माध्यमों और रोजगार देने वाली भाषा के रूप में स्थापित होना होगा।
(लेखक चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में हिंदी के विभागाध्यक्ष हैं)


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