Wednesday, June 7, 2023
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बिखरेंगे या और निखरेंगे राहुल!

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राहुल गांधी की सांसदी छिनना कोई अप्रत्याशित फैसला नहीं है। सूरत कोर्ट के फैसले के बाद यह होना ही था। अब एक दो दिन में उनका सरकारी बंगला भी खाली करा लिया जाएगा। ऊपरी अदालतोंं में भी लगभग यह माना जा रहा है कि शायद ही राहुल के हिस्से में सुकून आए। सूरत कोर्ट ने उन्हें अपील के लिए 30 दिन का समय दिया है। खैर सवाल अब ये अहम कि राहुल इन बेहद विकट स्थितियों में करेंगे क्या। उन्होंने अपने मिजाज के विपरीत जाकर भारत जोड़ो यात्रा करके ये तो दिखा दिया है कि उनमें माद्दा है गिर कर संभलने का। बस देखना ये है कि मुश्किलों के इस झंझावात में वो बिखरेंगे या और निखरेंगे। राहुल को अतिप्रतिक्रियावादी होने का खामियाजा भुगतना पड़ा है या फिर मर्यादा की रेखाएं लांघने का, इस पर अहर्निश बहस के सिलसिले चल सकते हैं लेकिन क्या इस सच से कोई भाग सकता है कि जिस तरह केंद्र में बेहद ताकतवर सरकार और नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे सियासत के मंझे हुए महारथियों के खिलाफ बिखरे, निस्पंद से विपक्ष के बीच अकेले राहुल गांंधी वो शख्स रहे हैं जिन्होंने लगातार घेराबंदी के बावजूद मुखर आवाज उठाई। विजय माल्या, मेहुल चोकसी, नीरव मोदी के मामले हो या हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद गौतम अडाणी मुद्दे पर जो प्रखरता राहुल ने दिखाई, वो कोई दूसरा विपक्षी नेता दिखाने में नाकाम रहा।

सत्ताहीन होना और फिर मोदी-शाह की दमदार जोड़ी के वार झेलना, उसके ऊपर उन्हें पप्पू जैसी उपहासवादी संज्ञा से नवाजा गया। संसद के अंदर उन्होंने लगातार शिकायत की कि उन्हें बोलने नहीं दिया जाता। आज हालत ये कि वह सांसद ही नहीं रहे। अमेठी से स्मृति ईरानी ने उन्हें पराजय की राह पर चलने को विवश कर दिया तो वह वायनाड से जीत गए लेकिन अब वह वायनाड भी गंवा बैठे हैं। यही नहीं, हालात तो ये आए हैं कि अगर उनकी अपील भी उनके खिलाफ जाती है तो अगले अगले आठ वर्षों तक चुनाव ही नहीं लड़ सकेंगे।

सवाल फिर वहीं घूम फिर कर अपने जवाब मांगता है कि आखिर राहुल मुश्किलों के इन अंधेरों में करेंगे क्या। भारत जोड़ो यात्रा के जरिए अपने व्यक्तित्व और वैचारिक सोच को पूरी तरह तब्दील करके रख दिया राहुल ने।

किसी ने सोचा भी नहीं था कि पार्ट टाइम सियासतदां का ठप्पा लगवा चुके राहुल इस अंदाज में जनता के बीच सड़कों पर उतरेंगे,ये अंदाजा अंदरखाने बहुतेरे कांग्रेसियों और बहुसंख्य आलोचकों और सत्ता पक्ष को भी नहीं रहा होगा।

लंबी लकीर खींची राहुल ने इस यात्रा को सफल अंजाम दे कर लेकिन चार साल पहले मोदी सरनेम को लेकर दिए चुनावी भाषण ने एक झटके में उनसे बहुत कुछ छीना है। सांसदी चली गई यानि देश के सबसे बड़ी पंचायत का हिस्सा नहीं रहे राहुल गांधी।

राहुल ने सांसदी जाने के बाद भी अपने तेवरों में नरमी के संकेत नहीं दिए हैं। उन्होंने ट्वीट करके कहा भी है कि वह झुकेंगे नहीं बल्कि और मजबूती से अपनी आवाज उठाते रहेंगे। अब राहुल के लिए फिर से पथरीली राह इंतजार में है।

आम चुनाव सन्निकट हैं, भाजपा संगठनात्मक स्तर पर दुनिया के सबसे संगठित संगठन आरएसएस की बिछाई बिसात पर सत्ता में बने रहने के लिए हर जुगत लगाएगी। मोदी जैसी लोकप्रिय चेहरा उनके पास है और आरएसएस जैसा सुगठित संगठन। हमले यहीं नहीं थमने वाले।

सत्ता पक्ष राहुल पर हुए एक्शन को भुनाने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ने वाला। ओबीसी मुद्दे को उछालने का संकेत भाजपा अध्यक्ष जेपी नडडा ने दे दिया है। यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मोर्य तो बाकायदा प्रेस वार्ता करके पार्टी का एजेंडा जाहिर कर चुके।

अब राहुल को निजी तौर पर और परिपक्व तथा सियासी तौर पर और मजबूत दिखने को सड़कों पर उतरना होगा, जिसके वो भारत यात्रा के माध्यम से अभ्यस्त हो चुके हैं। 2014 से कांग्रेस रसातल की ओर इतनी तेजी से गई कि देश की इस सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी के वजूद पर ही सवालिया निशान लगने लगे।

सोनिया गांधी की अस्वस्थता और राहुल की पार्टीजनों से संवादहीनता ने हालात और पेचीदा कर दिए। ऐसे में 2024 के आम चुनाव से पहले राहुल पर हुए एक्शन को कांग्रेस ने सकते में ला दिया है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया और हिमंत बिस्वा शर्मा जैसे बड़े नाम भाजपा के पाले में गए। गुलाब नबी आजाद ने नई पार्टी बना ली। जी 23 के नाम से गुटबाजी का एक सिलसिला चला। लेकिन राहुल ने इस संकट की घड़ी में सड़कों पर जनता से संवाद का नायाब माध्यम चुना और इसे सफलता के रंग में रंग कर अपने निजी और सियासी किरदार में जान फूंकी।

फिर भंवर में फंसे खड़े हैं राहुल गांधी। बहाव के खिलाफ उनमें कूवत है तो उन्हें फिर उसी कलेवर में लौटना होगा यानि जनता की बात जनता से। संसद न सही सड़क ही सही। पार्टी में निश्चित पर राहुल की सजा के बाद प्रियंका गांधी पर और निर्भरता बढ़ेगी कांग्रेस की।

अभी तक रायबरेली या अमेठी से चुनाव लड़ने के कयास अब सच में तब्दील हो सकते हैं प्रियंका के लिए। हां, यदि राहुल की ऊपरी अदालत में अपील नामंजूर होती है तो कांग्रेस को मन मसोस कर पीएम चेहरे के लिए राहुल गांधी को प्रजेंट करने की रणनीति पर कदम पीछे खींचने को होंगे।

होई वही, जो विधि रच राखा की तर्ज पर, हो सकता है कि इन दुर्दिनों में कोई उम्मीद की रोशनी छुपी हो। देखते हैं राहुल इस मुश्किल घड़ी में अपनी दादी इंदिरा की तर्ज पर और निखरने का माद्दा दिखा पाते हैं या नहीं।

इमरजेंसी से मचे हाहाकार के बाद मिली पराजय हो या फिर राजनारायण से मिली हार के बाद कानूनी जंग में मात खाने के बाद उपजा शून्य हो। हर बार इंदिरा गांधी ने मुश्किलों की राख में चिंगारी तलाश कर खड़ा होने का माद्दा दिखाया था। क्या राहुल भी सीखेंगे कुछ अतीत के पन्नों से और वतर्मान से उपजे विकट हालात से।
(लेखक गॉडविन मीडिया समूह में ग्रुप एडिटर हैं)


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