
‘गए थे रोजे बख्शवाने मगर नमाज गले पड़ गई’ या कि ‘चौबे जी गए थे छब्बे बनने और दूबे बनकर रह गए!’ प्रवक्ता पद से हटाई, पार्टी से निलम्बित और फ्रिंज करार दी गई भाजपा नेता नूपुर शर्मा द्वारा दी गई इस अर्जी पर कि उनके द्वारा एक न्यूज चैनल पर ज्ञानवापी मस्जिद के कोर्ट में विचाराधीन विवाद से संबन्धित बहस में पैगम्बर मोहम्मद के प्रति अपमानजनक बयान देने को लेकर देश के अलग-अलग राज्यों में पुलिस द्वारा दर्ज की गई सारी प्राथमिकियां दिल्ली स्थानांतरित करा दी जाए, सुप्रीम कोर्ट ने देश से माफी मांगने की नसीहत देते हुए उनको जैसी लताड़ लगाई है, उस पर चंद शब्दों में टिप्पणी करनी हो, तो अवध की इन दोनों कहावतों का कतई कोई जवाब नहीं। कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी परदीवाला की अवकाशकालीन पीठ ने न सिर्फ यह महसूस किया कि नूपुर की उक्त अर्जी से उनके दंभ, रसूख और गुमान की बू आ रही है, बल्कि बहस में उनके बयान को तकलीफदेह बताते हुए इस सवाल के सामने भी खड़ा किया कि उन्हें ऐसा बयान देने की क्या जरूरत थी? यह भी पूछा कि न्यूज चैनल का एजेंडा चलाने के अलावा ऐसे मामले पर बहस का क्या मकसद था, जो पहले ही कोर्ट के अधीन है?
पीठ यहीं पर नहीं रुकी। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नूपुर ने जिस तरह देश भर में भावनाओं को भड़काया है, उसके मद्देनजर वर्तमान में देश में जो कुछ हो रहा है, उसके लिए वे अकेली जिम्मेदार हैं। जस्टिस ने माना कि बहस में एंकर द्वारा नूपुर को उकसाया गया था, लेकिन कहा कि उन्होंने वकील होने के बावजूद जिस तरह से बहस में वह सब कहा, वह शर्मनाक है और उसके लिए उन्हें पूरे देश से माफी मांगनी चाहिए। अगर वे एक पार्टी की प्रवक्ता हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें ऐसे बयान देने का लाइसेंस मिल गया है, जिन्होंने पूरे देश में अशांति फैला दी है और जिसके चलते उदयपुर में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण वारदात हुई है, जिसमें उनके समर्थन में सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर एक व्यक्ति का सिर कलम कर दिया गया है।
कहना मुश्किल है कि नूपुर शर्मा और उन्हें फ्रिंज करार देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेने वाली उनकी संरक्षक जमातें व सरकारें देश की सबसे बड़ी अदालत की इन टिप्पणियों की शर्म को महसूस करेंगी या नहीं, लेकिन यह मानने के स्पष्ट कारण हैं कि ये टिप्पणियां नूपुर के लिए ही नहीं बल्कि उन सबके लिए शर्म की बात हैं-बशर्ते वह उन्हें आती हो। आखिर किसे नहीं मालूम कि नूपुर ने अपने खिलाफ सारी प्राथमिकियां दिल्ली स्थानांतरित करने की अर्जी के साथ ढिठाईपूर्वक सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा इसी आत्मविश्वास पर खटखटाया कि एक बार सारी प्राथमिकियों की जांच दिल्ली पुलिस को मिल जाएं, बस। फिर तो पुलिस उनके विरुद्ध जाने से रही, क्योंकि इसके लिए वह जिनके इंगित की मोहताज है, वे अपने ही लोग हैं। कोर्ट ने पूछा कि दिल्ली में दर्ज प्राथमिकी पर अब तक क्या कार्रवाई हुई तो नूपुर के वकील के पास कोई जवाब नहीं था।
अकारण नहीं कि कोर्ट को ‘उनके लिए वहां रेड कारपेट बिछ रहा होगा न!’ जैसे तंज के साथ कहना पड़ा कि ‘हमारा मुंह मत खुलवाइए। उनकी (नूपुर की) शिकायत पर एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया लेकिन उनके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज होने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने उन्हें अब तक नहीं पकड़ा।’ नूपुर की अर्जी पर कोर्ट का यह रुख सच पूछिये तो इस बात की पुष्टि है कि उनके द्वारा देश भर में आग लगाने के बाद उनकी शुभचिंतक नरेंद्र मोदी सरकार या भाजपा ने अब तक जो भी कदम उठाए हैं, उनसे उनके ‘देर आयद’ (यानी देर से ही सही, जागने व कार्रवाई करने) का पता भले चलता हो, दुरुस्त आयद (यानी अच्छी नीयत से भूल-चूक लेनी-देनी की तर्ज पर समुचित कदम उठाने) का पता नहीं चलता।
गौर कीजिए, गत पांच जून को भाजपा ने नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल पर क्रमश: निलम्बन व निष्कासन की कार्रवाई की तो चैतरफा दबाव के बावजूद मोदी सरकार उन पर प्राथमिकी दर्ज कराने या उन्हें कानून के हवाले करने के पक्ष में नहीं दिखी। चार दिन बाद नौ जून को उसके द्वारा नियंत्रित दिल्ली पुलिस ने मजबूरन उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज भी की तो अपनी बदनीयती छिपा नहीं पाई। मामले को इस तरह ‘बैलेंस’ करने के लिए, ताकि उनका कुसूर बड़ा न दिखे, उसने कई ऐसे विपक्षी नेताओं के खिलाफ भी प्राथमिकियां दर्ज कर लीं, जो भाजपा नेताओं की नफरत फैलाने वाली टिप्पणियों के विरुद्ध मुखर थे।
सच कहें तो इस मामले में मोदी सरकार तब तक सोती रही, जब तक बात विदेशों में रह रहे भारतीयों की रोजी-रोटी, साथ ही देश के आर्थिक हितों तक नहीं पहुंच गई और देश-दुनिया की महाशक्तियां ही नहीं, ऐसी बहुत-सी शक्तियां भी भारत की लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष छवि को आईना दिखाने लगीं, जिनकी धर्मनिरपेक्षता व लोकतंत्र जैसे मूल्यों में खुद की आस्था भी असंदिग्ध नहीं है। दूसरे शब्दों में इसे इस तरह कह सकते हैं कि जो सत्तर साल में नहीं हुआ, मोदी के आठ साल में हो गया। इससे पहले देश की धर्मनिरपेक्षता दुनिया में कभी भी इस तरह प्रश्नांकित नहीं हुई।
इसके बावजूद मोदी सरकार के पास अभी भी इसे गंभीरता से लेने की फुरसत नहीं है, जबकि उसकी समर्थक जमातों के पास ऐसे अनेक कुतर्क हैं, जिनकी बिना पर धार्मिक नफरत या सांप्रदायिक विवाद खड़े करने को तर्कसंगत ठहराने की कोशिश की जा रही है-इससे हो रही जगहंसाई की ओर से एकदम से आंखें मूंदकर। निस्संदेह, इसके अंदेशे बहुत बड़े और दीर्घकालिक हैं। इनमें से कई तो स्पष्ट नजर आने लगे हैं। आज पूरे देश में सांप्रदायिक धार्मिक विभाजन की लकीरें महसूस की जा सकती है और किसी को भी नहीं मालूम कि इन लकीरों को मिटाने में कितना वक्त लगेगा? देश में ऐसे लोग बचे हैं जो लकीरों को मिटाना चाहते हैं।
दूसरे पहलू से देखें तो भाजपा व मोदी सरकार ने दबाव में, देर से और अपर्याप्त ही सही, जो कदम उठाए हैं, पिछले आठ सालों में शांतिकामी देशवासियों के दबाव में उनके एक तिहाई भी उठाए होते तो देश की ऐसी हालत नहीं होती। न ही ऐसा वातावरण बनता कि सारी आसानियां नफरत फैलाने वालों के और सारी दुश्वारियां सद्भाव व सौमनस्य के पैरोकारों के नाम हो जाए।
अच्छी बात है कि हर किसी को दहलाने वाले जिस उदयपुर कांड के लिए सुप्रीमकोर्ट ने नूपुर को जिम्मेदार ठहराया है, उसके बावजूद ज्यादातर देशवासियों ने यही सिद्ध किया है कि वे देश के सामूहिक विवेक के साथ हैं। इसका अर्थ यह है कि समय अभी पूरी तरह हाथ से निकला नहीं है और मोदी सरकार, भाजपा व नूपुर चाहें तो उनके सुधरने के विकल्प बने हुए हैं। यकीनन, उनके द्वारा इन विकल्पों का इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणयों को नए सिरे से सार्थक करेगा।


