- 13 आयुर्वेदिक अस्पताल, लंबा-चौड़ा बजट, फिर भी मरीजों को क्यों नहीं मिल रहा उपचार ?
जनवाणी संवाददात्ता |
मेरठ: जनपद में आयुर्वेद के 13 सरकारी क्लीनिक चल रहे, लेकिन वहां डॉक्टर नहीं बैठते। कोरोना खत्म हो गया, लेकिन डॉक्टर कहां हैं, कुछ पता नहीं। आयुर्वेद को आयुष मंत्रालय भारी भरकम बजट भी दे रहा है, लेकिन इसका जनता कब लाभांवित होगी? आयुष मंत्रालय के अलावा यूपी सरकार भी व्यापक स्तर पर आयुर्वेदिक दवाएं उपलब्ध करा रही है, लेकिन आम लोगों तक आयुर्वेद की दवाइयां मुफ्त नहीं पहुंच पा रही है।
वजह है आयुर्वेदिक क्लीनिक पर डॉक्टर जाते ही नहीं हैं। हालत यह है कि एक डॉक्टर की वेतन करीब एक लाख रुपये है, लेकिन डॉक्टर ईमानदारी से काम नहीं कर रहे हैं। इन पर चाबुक चलाने के लिए अधिकारी नहीं है।
क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवाखाना अधिकारी का पद तो हैं, लेकिन लंबे समय से इस पद पर कार्यवाहक की तैनाती ही बनी रहती है। दो टर्न ऐसे ही बीत गए। जो भी सीनियर डॉक्टर होता हैं, उसे ही इस क्षेत्रीय अधिकारी के पद पर बैठा दिया जाता है।
इतना बड़ा खेल आयुर्वेदिक एवं यूनानी विभाग में चल रहा हैं, जिससे जनप्रतिनिधि भी अनभिज्ञ हैं। दरअसल, शहर के पुरानी तहसील में चार बेड का आयुर्वेदिक अस्पताल चल रहा है जहाँ डॉ रेणू बैठती है। वह सीनियर भी हैं, लेकिन मार्च में क्षेत्रीय अधिकारी डा. अजयपाल सेवानिवृत्त हो रहे हैं, इसलिए सबकी निगाहें उनके पद पर लगी है।

क्योंकि कार्यवाहक बनकर भी मलाई खाई जा सकती है। क्योंकि आयुर्वेद व यूनानी चिकित्सा में यूपी व केन्द्र सरकार अच्छा बजट जारी कर रही है। दवाएं भी खूब उपलब्ध कराई जा रही हैं, लेकिन सरकारी दवाएं प्राइवेट हकीमों को बेच दी जाती है। इस तरह के आरोप भी लगे हैं, जिनकी शिकायत लखनऊ में पहुंची थी। उसकी जांच हुई, लेकिन निष्कर्ष क्या हुआ? कुछ पता नहीं।
तहसील अस्पताल के हालात
शहर की पुरानी तहसील में आयुर्वेदिक अस्पताल हैं, वह भी चार बेड का। वहां मरीज कब भर्ती हुए, कब छुट्टी हुई, कुछ पता नहीं। मरीजों को देखा तो जाता हैं, मगर भर्ती करने के नाम पर खानापूर्ति की जाती है। आखिर इसकी चेकिंग के नाम पर भी खानापूर्ति की जा रही है। इसके लिए जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? पुराना तहसील के आयुर्वेदिक अस्पताल की ऐसी हालत नहीं हैं, बल्कि शहर के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जितने भी आयुर्वेदिक अस्पताल है, उनका बुरा हाल है। डॉक्टर जाते ही नहीं हैं।
जब दबाव बनता है तो क्लीनिक पर गए, फिर हाजिरी लगाई और चले गए। यही कुछ लंबे समय से चल रहा है, मगर कार्रवाई किसी पर नहीं होती। डा. रेणू मरीज को देखती हैं, लेकिन जिन मरीजों की हालत बिगड़ती है, उन्हें भर्ती नहीं किया जाता। क्योंकि मरीज के भर्ती करने के बाद डॉक्टर को भी अस्पताल में ही रहना पड़ेगा। इस वजह से डॉक्टर भर्ती के झंझट से दूर ही रहते हैं।
ये आयुर्वेदिक अस्पताल, जहां नहीं जाते डॉक्टर
ग्रामीण क्षेत्र में भी आयुर्वेदिक अस्पताल सरकार ने खोले हैं, लेकिन वहां पर डॉक्टर जाते ही नहीं हैं। बहसूमा, सलावा, सतवाई, भूड़बराल, कलीना, निलोहा, धनपुर, तारापुर, शाहजहांपुर, कैली, आमदपुर में आयुर्वेदिक क्लीनिक हैं। ये एक तरह से देखा जाए तो मिनी अस्पताल हैं। भूडबराल में डा. संजीव तो बैठते हैं, मगर कैली में डा. सर्वेश व बहसूमा में डा. अतुल नहीं बैठते। इनकी शिकायत भी शासन को गई हैं, लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं की गई।
इनके खिलाफ हुई शिकायत
आयुर्वेदिक अस्पतालों में तैनाती डा. स्वेता, डा. सुधा, डा. सारिका व डा. सुनील देशवाल की भी शिकायत हुई है। इन पर आरोप लगे है कि ये आयुर्वेदिक अस्पतालों में नहीं बैठती है। अब ही नहीं, पहले भी इनका यहीं हाल था। जूनियर ही मरीजों को दवाई देते हैं तथा रजिस्ट्रर में मरीज का नाम व मोबाइल नंबर लिखकर खानापूर्ति कर देते हैं।
क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवाखाना के कार्यवाहक अधिकारी डा. अजयपाल सिंह का कहना है कि जिन चार डॉक्टरों की शिकायत हुई है, वो एनआईसी में बने कोरोना कंट्रोल रूम में उनकी ड्यूटी चार माह से लगी हैं, वहीं पर वर्तमान में भी तैनाती चल रही है। ऐसे में अस्पताल कैसे जाएंगे। डीएम के आदेश के बाद ही इनको हटाकर अस्पताल में लगाया जा सकता है।

