Sunday, July 25, 2021
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12वीं की परीक्षा और कोरोना महामारी

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कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बढ़ते प्रकोप के कारण 14 अप्रैल को सीबीएसई ने दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा रद्द करने और 12वीं की परीक्षा स्थगित करने का फैसला किया था। सीबीएसई की तर्ज पर राज्यों के शिक्षा बोर्डों ने इसी तरह के फैसले करके दसवीं के विद्यार्थियों को राहत दे दी थी। लेकिन 12वीं कक्षा की परीक्षाएं अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने से देश के 1.4 करोड़ विद्यार्थियों को अपनी परीक्षाओं को लेकर भारी तनाव से गुजरना पड़ा है। गत 23 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, प्रकाश जावडेकर, संजय धोत्रे की उपस्थिति में राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा मंत्रियों, शिक्षा विभागों व बोर्डों के अधिकारियों की आॅनलाइन बैठक में 12वीं की परीक्षाओं को लेकर विचार-विमर्श हुआ है। बैठक में परीक्षा के आयोजन, परीक्षा के स्वरूप, परीक्षा केंद्र सहित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई, लेकिन कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका।

महाराष्ट्र और झारखंड के शिक्षा मंत्रियों ने महामारी में बच्चों की मनोदशा को रेखांकित किया। खास तौर से उन विद्यार्थियों की जो खुद या उनके परिजन कोरोना की चपेट में हैं। उन विद्यार्थियों की दशा के बारे में सोचा जा सकता है, जिन्होंने महामारी में अपने स्वजनों को खो दिया है। केंद्र ने राज्यों से लिखित सुझाव मांगे हैं। यह सही है कि 12वीं की परीक्षा को लेकर अंतिम फैसला जल्द ही लिया जाना चाहिए। यह विद्यार्थियों को तनाव से निकालने के लिए भी जरूरी है। 12वीं स्कूली शिक्षा की अंतिम कक्षा होती है। इस कक्षा की परीक्षा और उसके परिणाम पर विद्यार्थियों का भविष्य निर्भर करता है। तब तो इन परीक्षाओं का महत्व और बढ़ जाता है, जब इनके बाद विद्यार्थियों को दूसरे शिक्षण संस्थान में दाखिला लेना होता है।

12वीं के बाद बहुत से विद्यार्थी देश भर के संस्थानों में प्रबंधन, इंजीनियरिंग, चिकित्सा सहित विभिन्न व्यावसायिक कोर्स में दाखिले के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं देते हैं। बढ़ती प्रतियोगिता के कारण कई बार एक अंक कम आने पर भी विद्यार्थियों का कॉलेज में वांछित कोर्स में दाखिला नहीं हो पाता है। परीक्षाओं को लेकर विद्यार्थी बहुत चिंतित रहते हैं। परीक्षाएं पूरी होने तक विद्यार्थियों पर इनका बोझ बना रहता है। अच्छे अंक हासिल करने के लिए विद्यार्थी कड़ी मेहनत करते हैं। किसी भी कारण से परीक्षाएं स्थगित होती हैं तो उन्हें की गई मेहनत के बेकार होने का भय सताने लगता है। परीक्षा समय पर नहीं होने पर इनका बोझ निरंतर बढ़ता ही जाता है।

सामान्य स्थितियों में भी अंकों की होड़ व हमारी परीक्षा व्यवस्था की खामियां विद्यार्थियों को तनाव और अवसाद से भरे रखती हैं। परिजन भी तनाव में रहते हैं। कईं बार परिजनों व अध्यापकों की अपेक्षाओं का बोझ भी विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है। परिणाम घोषित होने के बाद वांछित परिणाम ना आने पर बहुत से विद्यार्थी आत्महत्या तक के निर्णय ले लेते हैं। जब सामान्य हालात में विद्यार्थियों पर ऐसी गुजरती है तो महामारी के दौर में परीक्षाओं की देरी और अनिश्चितता से उन पर क्या गुजर रही होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। चारों तरफ महामारी की दूसरी लहर से उपजी दर्दनाक खबरों का हर एक वर्ग पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।

ऐसे समय में सबकी जिम्मेदारी है कि महामारी के चंगुल से देश को निकालने के साथ-साथ विद्यार्थियों को तनाव से मुक्त किया जाए। उच्च स्तरीय बैठक में परीक्षाओं के आयोजन के बारे में तीन घंटे के परीक्षा समय की बजाय डेढ़ घंटे का परीक्षा समय और महत्वपूर्ण विषयों की बहुविकल्पीय या लघु उत्तरात्मक प्रश्रों की परीक्षाएं आयोजित करने का सुझाव दिया गया। विद्यार्थियों के स्कूल में ही परीक्षाएं आयोजित करने की बात की गई ताकि परीक्षा केन्द्रों की संख्या बढ़ जाए और शारीरिक दूरी बनाकर परीक्षाएं हो सकें। लेकिन एक बात की तरफ ध्यान नहीं दिया गया कि सरकारों ने खुद निर्णय करके बहुत से स्कूलों को आईसोलेशन सेंटर बना रखा है।

जिन अध्यापकों को जमीनी स्तर पर परीक्षाएं आयोजित करवानी हैं, वे स्वास्थ्य जांच योजना के तहत सर्वेक्षण और एकांतवास केंद्र में ड्यूटियां दे रहे हैं। बहुत से अध्यापक कोरोना पोजिटिव हैं और क्वारंटाइन हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में पंचायत की चुनावी ड्यूटी के कारण 15सौ से अधिक अध्यापक कोरोना की चपेट में आकर जान गंवा चुके हैं। हालांकि सरकार ये आंकड़े नहीं मान रही है। परीक्षाओं के बाद उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में भी अध्यापकों को ड्यूटियां देनी होंगी। सवाल यह है कि ऐसे में परीक्षाएं होंगी कैसे? दूसरा, क्या परीक्षा केंद्रों में विद्यार्थियों का आना सुरक्षित होगा? विद्यार्थियों को एक स्थान पर इक_ा करने से क्या महामारी के बढ?े का खतरा नहीं होगा?

12वीं की परीक्षा के बाद विद्यार्थी पूरे देश में दाखिले लेते हैं। ऐसे में परीक्षाएं तो भले ही ले ली जाएं, लेकिन ये परीक्षाएं बहुत आसानी से दी जाने वाली होनी चाहिए। विद्यार्थियों को दसवीं की तरह ही बिना परीक्षा दिए आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर परिणाम प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए। जो विद्यार्थी लिखित परीक्षाएं देना चाहें, उनके लिए आईसोलेशन सेंटर बने स्कूलों में परीक्षाएं नहीं ली जानी चाहिए।

परीक्षा केंद्रों पर ज्यादा विद्यार्थियों का जमावड़ा ना हो और जो बच्चे परीक्षा केंद्र में ना आ पाएं, उनके लिए घर पर ही परीक्षाएं देने के विकल्प भी खुले रखे जा सकते हैं। ऐसे समय में परीक्षाएं विद्यार्थियों के समक्ष बाधाएं खड़ी करने के लिए नहीं होनी चाहिएं। महामारी, उससे उपजे संकट, परीक्षाओं को लेकर अनिश्चितता व उहापोह ने पहले ही जीवन में तनाव बना रखा है।


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