Thursday, April 23, 2026
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24 प्लाट मिसिंग, कैसे मिलेंगे आवंटियों को?

  • जनवाणी की छानबीन में तथ्य आया सामने
  • प्लाट पर दो दशक से आवंटियों को नहीं मिला कब्जा

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: मेरठ विकास प्राधिकरण (एमडीए) के प्रथम ले-आउट में तो आवंटियों को प्लाट आवंटित कर दिये गए, लेकिन इन आवंटियों को प्लाट पर दो दशक से कब्जा नहीं मिला। अब एमडीए कह रहा है कि आवंटियों को आवंटित प्लाट मिसिंग हैं। जब ले-आउट में प्लाट होना दर्शाया गया। आवंटन भी कर दिया गया। फिर प्लाट मिसिंग कैसे हो गए? यह बड़ा सवाल हैं। आखिर जमीन कहां चली गई, जो ले-आउट में भी दर्शायी गयी।

जनवाणी की छानबीन में यह तथ्य सामने आया है कि 24 आवंटी ऐसे हैं, जिनके प्लाट मिसिंग हैं। जहां पर उन्हें प्लाट आवंटित किये गये, वहां पर जमीन ही नहीं हैं, फिर प्लाट पर कब्जा कैसे मिलेगा? कहीं पूर्व में जमीन को लेकर कोई गडबड़झाला तो नहीं हुआ। इसकी भी संभावनाएं बनी हुई हैं। यही वजह है कि वर्तमान में प्राधिकरण उपाध्यक्ष मृदुल चौधरी ने मिसिंग प्लाटों का समायोजन करने से इनकार कर दिया तथा फाइल बोर्ड बैठक में रखी जाएगी।

दरअसल, हम बात कर रहे गंगानगर योजना के पॉकेट ‘यू’ और ‘एक्स’ की। ये सभी प्लाट 120 वर्ग मीटर और 200 वर्ग मीटर के हैं। एमडीए के अधिकारियों की बात पर विश्वास करें तो ले-आउट चेंज हुआ था, जिसके बाद यह चूक हुई हैं। इसमें चूक करने वाले अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। अब परेशानी झेलने के लिए आवंटियों को छोड़ दिया गया हैं। आवंटी हर रोज एमडीए आॅफिस के चक्कर लगाते हैं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल रहा हैं। यह एक-दो वर्ष से नहीं, बल्कि दो दशक से आवंटी एमडीए आॅफिस आ रहे हैं, मगर समस्या ज्यो की त्यो बनी हुई हैं।

आखिर 20 वर्ष पहले जो व्यक्ति रिटायर्ड हुआ था, उसने अपनी जिंदगी भर की कमाई आशियाना बनाने के लिए एमडीए से प्लाट खरीदा। उसका अंतिम सपना होता है कि कम से कम उसके पास अपना मकान तो हैं, लेकिन यहां भी एमडीए से उसे धोखा ही मिला। बताया गया कि प्रथम ले-आउट 2005 में तैयार किया गया था। इसमें बदलाव हुआ हैं। इसके बाद ही आवंटियों को प्लाट पर कब्जे नहीं मिले।

आवंटियों का पूरा पैसा है जमा

जिन चौबीस आवंटियों के प्लाट मिसिंग हैं, उनका पूरा पैसा एमडीए में जमा हैं। जब उनका पूरा पैसा जमा है तो फिर एमडीए ने उन्हें प्लाट पर कब्जा क्यों नहीं दिया? यह भी बड़ा सवाल है। एमडीए के अधिकारियों ने इसमें आवंटियों को प्लाट पर कब्जे देने का प्रयत्न क्यों नहीं किया? इतने लंबे समय तक लोग परेशान घूमते रहे।

आखिर पूरा पैसा जमा करने के बाद आवंटियों की क्या गलती है कि उन्हें इसकी एमडीए सजा दे रहा हैं। एमडीए ने आवंटन किया, पूरा पैसा लिया। फिर आवंटियों को प्लाट नहीं देने की कौन सी सजा दी जा रही है? इसके लिए जवाबदेही किसकी हैं? क्या इसके जिम्मेदार अफसरों पर एमडीए के अधिकारी कार्रवाई कर पाएंगे।

100 प्लाट खाली, फिर भी समायोजन क्यों नहीं?

एमडीए में आवंटियों को प्लाट दिये जा सकते हैं। करीब 100 प्लाट यू और एक्स पॉकेट में खाली हैं। इनमें इन आवंटियों का समायोजन किया जा सकता हैं, लेकिन समायोजन करने से अधिकारी बच रहे हैं। क्योंकि इसमें विवाद पैदा भी हो सकता हैं। जब आवंटन किया तो प्लाट कहां चले गए?

यह सवाल तो उठना लाजिमी हैं, फिर वर्तमान अधिकारी इस विवाद में क्यों उलझे। क्योंकि आवंटन उनके समय का नहीं हैं। आवंटन जिनके समय में हुआ, उनके खिलाफ जांच होनी चाहिए, तभी कार्रवाई भी की जानी चाहिए। हालांकि जिस समय एमडीए ने इन आवंटियों को प्लाट का आवंटन किया, तब 3200 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर थी और वर्तमान में उन्नीस हजार रुपये वर्ग मीटर का मूल्य चल रहा है। इस तरह से एमडीए को एक तरह से घाट ही हो रहा हैं। इस वजह से भी आवंटन करने से बचा जा रहा है।

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