
समसामयिक विसंगतियों, समाज व सत्ता के मिथ्या आडंबरों और समाज में व्याप्त प्रत्यक्ष एवं छद्म जातिवाद के प्रति घोषित विद्रोह है-संतोष पटेल का काव्य संग्रह ‘कारक के चिन्ह’। इस काव्य संग्रह में कवि की कुल पचपन कविताएं हैं, जो समकालीन विषयों पर केंद्रित हैं। इन कविताओं की भाषा एकदम सीधी और सरल है किंतु इनकी गूंज बहुआयामी है। इन कविताओं में प्रेम है, रंगों का मनोविज्ञान है, जातिवाद का दंश है, नारी के प्रति सम्मान है, कुप्रथाओं का विरोध है, शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि है, किसान आंदोलन का समर्थन है और सबसे बढ़कर कवि का विस्तृत अनुभव है।
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इन कविताओं में अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों के दर्शन होते हैं क्योंकि कवि समकालीन विषयों का वर्णन कालक्रम के अनुसार उदाहरण देकर करता है। कवि बहुजन समाज का अलमबरदार है और अपनी पहली ही कविता में बहुजनों के महानायक बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को याद करते हुए घोषणा करता है कि ‘मैं अंबेडकर हूं’ और कवि अपनी बात का आरंभ ही स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के नारे से करता है। आज भारत में जितनी मूर्तियां सत्तासीन छलावों लगवाई जा रही हैं उससे कहीं अधिक मूर्तियां अंबेडकर साहब की तोड़ी जा चुकी हैं।
बाबा साहब अंबेडकर अब केवल नाम नहीं है बल्कि एक पूरे प्रतीक के रूप में विद्यमान हैं और यही जातिवादी कीड़ों की पीड़ा का सबसे बड़ा कारण है। एक अन्य कविता है, ‘कारक के चिन्ह’ तथा पुस्तक का शीर्षक और यह कविता समान हैं। यह कविता इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कविताओं में से एक है तथा शोषण व जातिवाद के व्याकरण को क्रमानुसार अभिव्यक्त करती है। यह सर्वविदित है कि सत्ता अपने विरोध को सह नहीं पाती है, जबकि कवि और साहित्यकार को स्थायी विपक्ष की संज्ञा दी जाती है। कवि प्रत्यक्ष जातिवाद के शिकार छात्रों यथा रोहित वेमुला, पायल तड़वी, फातिमा लतीफ, बालमुकुंद भारती आदि न जाने कितनी ही प्रतिभाओं को अपनी कविता के माध्यम से याद करते हैं।
पुस्तक : कारक के चिन्ह, लेखक : डॉ. संतोष पटेल, प्रकाशक : नव जागरण प्रकाशन, नई दिल्ली
अजय कुमार अजेय


