
उस दिन व्यंग्य एक कुटिल हंसी के साथ हंस रहा था। उसकी अंतरात्मा रो रही थी, कराह भी रही थी। वो दुखी व्यथित था। उसे आज अपने व्यंग्य होने के गुमान पर पीड़ा हो रही थी। विसंगति को उजागर करने वाला व्यंग्य स्वयं विसंगति बन गया था। उसे कठपुतली होने का अहसास हो रहा था। डोर ऐसे लोगो के हाथों में थी, जो उसके कंधे पर बंदूक रखकर खुद स्वार्थ पूरा कर रहे थे। हाथ में कलम थामे ये लोग नव-आगत को कलम करना चाहते थे। उक्त पंक्तियां जिस तड़प, नाराजगी और ऐतराज को व्यक्त करती हैं, यही पीड़ा व्यंग्य लेखन की वजह होती है। व्यंग्य लिख कर भले खुश हुआ जा सकता हो लेकिन खुश होकर व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता। ‘व्यंग्य का एपिसेंटर’, यह समीक्षा तैलंग का नया व्यंग्य संग्रह है जिसे पढ़ने के दौरान यह बाते जहन में जन्मी। जो अच्छी रचनाएं होती हैं, वे पाठक की सोच को चमका देती है।
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रचना जहां खत्म होती है पाठक की सोच उसके आगे का सोचने लगती है , ऐसी खासियत से भरपूर है समीक्षा तैलंग का यह संग्रह। समीक्षा तैलंग व्यंग्य लेखन में अपने कहन के अंदाज से दर्जेदार रचनाओं की रचियता होते जा रही है। व्यंग्य का एपिसेंटर में समीक्षा तैलंग की 42 व्यंग्य रचनाएं समाहित हैं। वह घटना जो इन रचनाओं को लिखने का सबब बनीं, उसे लेखिका ने बहुत नजदीक से महसूस किया है। ये अनावश्यक थोपी गई रचनाएं नहीं हैं, भोगी गर्इं रचनाएं हैं। व्यंग्य पहले भोगा जाता फिर रचा जाता है। इन 42 रचनाओं में कुछ एक रचनाएं अधिक लंबी हो गई हैं।
रचना का लंबी होना गलत नहीं है, लेकिन वह विषय की मांग हो तो ही उचित है। लंबी रचनाओं का गठन और छोटी रचनाओं का गठन की अलग-अलग तकनीक होती है। लंबी रचनाओं का आरंभ मध्य और अंत योजनाबद्ध तरीके से होता है, इनमें फैलाव आरंभ से ही मौजूद रहता है। जहां रचना को खत्म हो जाना चाहिए उसे वहां से आगे कैसे बढ़ाया जा सकता है ? भावना प्रकाशन ने पुस्तक को जो खूबसूरती दी है वह भी पाठक को पढ़ने के लिए आकर्षित करती है।
पुस्तक : व्यंग्य का एपिसेंटर, लेखिका : समीक्षा तैलंग, प्रकाशक : भावना प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य : 225 रुपये
अख्तर अली


