Saturday, May 9, 2026
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मायावती ने बसपा को उबारने के लिए उठाए यह कदम, बढ़ेंगीं भाजपा-सपा की मुश्किलें

जनवाणी ब्यूरो |

नई दिल्ली: कभी अकेले दम पर यूपी में सत्ता हासिल करने वाली बहुजन समाज पार्टी इस बार एक सीट पर ही सिमट कर रह गई। पार्टी पिछले 10 साल के अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। इस दौरान कई दिग्गज नेताओं ने साथ छोड़ दिया। वोट प्रतिशत भी घटता रहा।

हमेशा साथ देने वाले कोर वोटर्स ने भी दूसरी पार्टियों पर भरोसा करना शुरू कर दिया। ऐसे में पार्टी को नई ताकत देने के लिए बसपा प्रमुख मायावती ने बड़ा प्लान बनाया है। उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का नेशनल कोआर्डिनेटर बना दिया है। यही नहीं, कई बड़े रणनीतिक बदलाव की तरफ भी कदम बढ़ा दिए हैं।

मायावती ने क्या कहा?

बैठक में मायावती ने कहा, ‘ये वक्त हताश होने का नहीं, बल्कि एकजुट होकर संघर्ष करने का है। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए मुसलमानों ने सपा का साथ दिया और वे विफल हुए। अब मुसलमान भी यह समझ चुके हैं कि भाजपा को बसपा ही हरा सकती है। इसलिए मुसलमानों को अकेले छोड़ने की बजाय अब उन्हें साथ लेकर चलना है।’

मायावती ने अपने भतीजे यानी आकाश आनंद को बड़ी जिम्मेदारी देते हुए नेशनल कोआर्डिनेटर बना दिया है। मतलब साफ है कि अब पार्टी को युवा हाथों में सौंपने की कवायद शुरू हो गई है।

तीन नए प्रभारी बनाए गए हैं जो सीधे आकाश आनंद को रिपोर्ट करेंगे। यह जिम्मेदारी मुनकाद अली, राजकुमार गौतम और डॉ. विजय प्रताप को दी गई है।

बसपा की सभी इकाइयों को भंग कर दिया गया है। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा अध्यक्षों को छोड़कर बाकी सभी को पद से हटा दिया गया है।

बसपा का साथ छोड़ने वाले शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को वापस पार्टी में शामिल कराया गया और आजमगढ़ से उन्हें लोकसभा उप-चुनाव का प्रत्याशी बना दिया।

संगठन के सभी जिम्मेदार पदाधिकारियों से चुनाव हारने के कारणों की रिपोर्ट मांगी गई है।

बसपा सुप्रीमो ने रविवार को ही समीक्षा की। इस बैठक में शामिल पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘अब पार्टी का इससे ज्यादा नुकसान नहीं हो सकता। अब जो होगा वो पार्टी और बहनजी पर विश्वास रखने वालों के लिए अच्छा ही होगा। 38 साल में पहली बार पार्टी को एकदम से नया रूप देने की तैयारी शुरू हो गई है।’

मायावती ने बताया इस तरीके से पार्टी बढ़ेगी आगे 

  1. रणनीतिक स्तर पर बदलाव करके अब दलित-मुस्लिम गठजोड़ को नए सिरे से मजबूत बनाया जाएगा। ब्राह्मणों पर कम फोकस होगा।
  2. पार्टी में अब युवाओं को बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी। बसपा सुप्रीमो मायावती के भतीजे आकाश आनंद खुद इस मोर्चे को संभालेंगे।
  3. पार्टी ने यूपी, पंजाब और उत्तराखंड में सर्वे करवाने का फैसला लिया है। इस सर्वे के जरिए बसपा से छिटके कोर वोटर्स से संपर्क होगा। उनसे सलाह लिए जाएंगे।
  4. मुद्दों को लेकर कार्यकर्ता-नेता सड़क पर उतरकर संघर्ष करेंगे।
  5. वरिष्ठ नेताओं और युवाओं में तालमेल बनाने के लिए मायावती खुद काम करेंगी।
  6. नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने के लिए भी आकाश आनंद को जिम्मेदारी दी गई है। वह सीधे सभी से रूबरू होंगे।
  7. छात्र, कर्मचारी, वकीलों का अलग वर्ग बनेगा।
  8. युवाओं को सोशल मीडिया की कमान सौंपी जाएगी, ताकि पार्टी के खिलाफ चल रहे ट्रेंडिंग व खबरों को मजबूती से काउंटर किया जा सके।
  9. हर महीने जिले स्तर और दो महीने में जोन व मंडल स्तर पर बैठकें होंगी। इसकी रिपोर्ट सीधे नेशनल कोआर्डिनेटर आकाश आनंद को देनी होगी।
  10. मायावती और आकाश आनंद हर तीन से पांच महीने में सभी जिले और जोन की समीक्षा करेंगे।

पत्रकार अशोक कुमार बताते हैं कि जिन तैयारियों के साथ बसपा दोबारा मैदान में उतरने की कोशिश में है वह काफी जरूरी है। पार्टी को ये आज साल पहले ही कर लेना चाहिए था जब 2012 में उन्हें हार मिली थी।

हालांकि, ये प्लानिंग बड़े रणनीतिक बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। चुनाव हारने के बाद मायावती ने सबसे पहले मुसलमानों का ही जिक्र किया था। कहा था, ‘मुसलमानों ने भाजपा को रोकने के लिए सपा का साथ दिया। ये उनकी सबसे बड़ी भूल है। मुस्लिम वोट अगर दलित के साथ मिलता तो परिणाम चमत्कारी होते।’

पत्रकार अशोक कुमार बताते हैं, ‘मायावती का यह कहना भी एक तरह से ठीक है। यूपी में दलित वोटबैंक करीब 21 फीसदी है, वहीं करीब 20% मुस्लिम वोटर्स हैं। अगर ये दोनों एकजुट होकर वोट कर देते तो भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती थीं। अब लोकसभा और फिर 2027 के चुनाव के लिए मायावती यही फैक्टर फिर से मजबूत बनाना चाहती हैं।’

पत्रकार अशोक कुमार कहते हैं, ‘अगर मायावती दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाने में कामयाब होती हैं तो इसका सीधा नुकसान भाजपा और सपा को होगा। खासतौर पर समाजवादी पार्टी के लिए ज्यादा मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। अभी सपा के साथ मुस्लिम वोटर्स मजबूती के साथ खड़े हैं। यादव और कुछ गैर-यादव वोटर्स भी सपोर्ट कर देते हैं। अगर मुस्लिम वोटर्स वापस बसपा में चले गए तो सपा के साथ केवल यादव वोटर्स और कुछ गैर-यादव वोटर्स ही बचेंगे।’

पत्रकार अशोक कुमार बताते हैं कि भाजपा के साथ अभी ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य व अन्य सामान्य वर्ग के वोटर्स हैं। गैर यादव ओबीसी वोटर्स का भी बड़े पैमाने पर साथ मिला। इस बार के परिणाम में इसकी झलक भी देखने को मिलती है। भाजपा के करीब 20 कुर्मी विधायक चुने गए हैं। अपना दल (एस) और निषाद पार्टी का भी साथ है। बसपा से छिटकने वाले दलित वोटर्स ने भी भाजपा पर ही विश्वास जताया है। अगर ये दलित वोटर्स वापस बसपा में चले गए तो भाजपा के लिए भी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।

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