
आयुष विदेश में नौकरी करता है और आज अवकाश में घर आ रहा था। उसकी मा पंकजा अति उत्साहित थी, आखिर उसका लाडला बेटा जो आ रहा था।
पंकजा अपने पति से बोली, सुनो बाजार से मैथी की भाजी ले आओ, आज आयुष को मैथी के पराठे और मटर की सब्जी बनाकर खिलाती हूं। विदेश में कहां मेथी की भाजी मिलती होगी और मिलती भी होगी तो पराठे कौन खिलाता होगा उसे। पति ने भी उसकी हां में हां मिलाई और बाजार से मेथी लेकर आ गए। पराठों की खुशबू से घर और पड़ोस महक उठा।
अचानक घर के सामने पीठ पर एक बड़ा झोला लादे एक डिलीवरी बॉय ने आवाज लगाई-पार्सल।
पंकजा ने देखा एक भोजन का बड़ा सा पैकेट पति के हाथ में देकर वह रवाना हो गया। उसका सारा उत्साह ठंडा पड़ गया, वह सोच रही थी की बेटा विदेश में मेरे हाथ के बने भोजन के लिए तरस गया होगा और घर आकर सब व्यंजनों की फरमाइश करेगा। किंतु यह क्या उसने तो पहले ही आॅनलाइन बाजार का भोजन आॅर्डर कर दिया!
आयुष ने जैसे ही घर में प्रवेश किया, मैथी के पराठों की सुगंध से उसका मन प्रसन्न हो गया, किंतु मां ने बुझे बुझे मन से उसका स्वागत किया। उसने भी तुरंत ही पिता से पूछ लिया की मां क्यों नाराज है?
मां को थोड़ा सताने के लिए वह जान बूझकर सीधा स्नानघर में चला गया। जब निकला तो मां ने शिकायत प्रारम्भ की-मेरे हाथ का भोजन भूल गया, तुझे तो अब बाजार का ही भोजन पसंद है, फोन पर तो बड़ी शिकायत करता है की यहां आपके हाथ वाले टेस्ट का भोजन नहीं मिलता है, और यहां आया तो पहले ही आॅनलाइन आॅर्डर कर दिया भोजन का। अरे मां सुनो तो सही, आयुष ने कहा। कुछ नहीं सुनना मुझे अब रह ही क्या गया, पंकजा बोली।
आयुष ने मां को अपने गले लगाके कहा-मेरी प्यारी भोली भाली माता जी! जिस पैकेट से आप नाराज हैं, वह तो मैंने अपनी मेहरी आंटी के लिए आॅर्डर किया था। पिछली बार जब फोन से बात हो रही थी, तब उसने कहा था की उसे उस प्रसिद्ध होटल का भोजन करना है। आप भूल गर्इं, आपके पीछे से ही तो कह रही थी वो।
पंकजा ने आयुष के गाल खींचे और कहाबदमाश!!!
सुरेश रायकवार


