
क्या किसानों की आत्महत्या सभ्यता की मृत्यु का संकेत है? क्या भूमिरहित किसानों का जीवन कटी पतंग की तरह होता है? क्यों ऐसा है कि विश्व के सबसे तेज और आगे बढ़ते हमारे मीडिया के पास फैशन, ग्लैमर, सोसाइटी…सबके लिए अलग-अलग संवाददाता हैं, लेकिन एक भी फुलटाइम संवाददाता या चैनल नहीं है जो गरीबी या किसानों की आत्महत्या के लिए लिखे? किसानों की आत्महत्याओं के पीछे क्या कोई षड्यंत्र है? क्या किसानों की दुर्दशा के बावजूद कोई इंसान व्यक्तिगत रूप से सफल हो सकता है? क्या वह इस सफलता का जश्न मना सकता है? किसानों से जुड़े ऐसे ही बहुत से सवाल हैं। मधु कांकरिया ने अपने हालिया उपन्यास ‘ढलती सांझ का सूरज’ (राजकमल प्रकाशन प्रा.लि.) ने इन सवालों से मुठभेड़ की है। ऐसा नहीं है कि किसानों पर लिखने वाली मधु कांकरिया पहली लेखक हैं। प्रेमचंद के लेखन की धुरी किसान रहे। उन्होंने किसानों के शोषण पर भरपूर लिखा। उनसे भी पहले उड़िया कथाकार फकीर मोहन सेनापति के कई उपन्यास किसानों को लेकर ही लिखे गए। इनमें छह बीघा जमीन खासा चर्चित रहा। तेलुगु के प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित उपन्यासकारों में केशव रेड्डी की गिनती होती है। उनके उपन्यास ‘भू-देवता’ (जिसका हिंदी में अनुवाद जेएल रेड्डी ने किया है) का कथाकाल 1950 का है, हालांकि इसे 1993 में रचा गया। भू देवता में लेखक ने 70 साल पहले की उन स्थितियों का चित्रण किया है, जब अकाल रोज तांडव किया करता था। लेकिन 70 साल बाद भी किसानों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। हां, शोषण के तरीकों में जरूर बदलाव आया। मधु कांकरिया शोधपरक लेखन की पक्षधर हैं। वह सच्चाई की तह तक जाती हैं। किसानों पर उपन्यास लिखने से पहले भी उन्होंने बाकायदा रिसर्च की। उन्होंने पाया कि 1997 से अब तक लगभग दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। क्यों, इसे जानने के लिए मधु कांकरिया ने मराठवाड़ा के उन किसानों के घरों में जाकर उनकी दयनीय हालत से साक्षात्कार किया।
उपन्यास की कथा नवंबर 2010 से शुरू होती है। अविनाश स्विट्जरलैंड से वापस भारत आया है। अविनाश वैभव की इच्छा लेकर 1989 में स्विट्जरलैंड जाता है। जाहिर है वहां वह हर भौतिक सुख सुविधा हासिल करता है। उसके पास पत्नी नैंसी है, एक बेटी है। यानी वह सब कुछ है जिस पर इतराया जा सकता है। यह भी संयोग है जिस वक्त अविनाश स्विट्जरलैंड जा रहा था, उसी वक्त यानी 90 के दशक में भारत में चीजें बदलनी शुरू हुई थीं। आर्थिक उदारीकरण, खुला बाजार, वैश्वीकरण, यह सब इसी दौर में हुआ। यही वह समय था जब सब कुछ पैसा हो गया। ग्रामीण संस्कृति लगभग समाप्त हो गई और बाजार की पहुंच ड्राइंगरूम तक आ गई। यही वह समय था जब नरसिंह राव-मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों ने कृषक संस्कृति को गर्त में पहुंचाने का काम किया। ‘ढलती सांझ का सूरज’ में मधु कांकरिया ने इसी नष्ट हो चुकी या हो रही संस्कृति को बचाने की कोशिश की है। अच्छी बात यह है कि उन्होंने एयर कंडीशंड कमरे में बैठकर किसानों की दुनिया नहीं देखी बल्कि वे मराठवाड़ा संभाग के 8 जिलो में से एक जालना जिले के परातुल, बाबुलतारा, बालखड़े गांवों में जिन किसानों ने आत्महत्या की उनके परिवारों से मिलती हैं।
यहां उनका प्रतिनिधित्व नायक अविनाश कर रहा है। अपनी मां की खोज में भारत आया अविनाश अपने मामा के साथ इन गांवों में घूमता है। वह गांवों का जीवन, गरीबी और कर्ज में डूबे किसानों को आत्महत्या करते देखता है। कहीं खेती के लिए पानी नहीं है, कहीं जमीन गिरवी पड़ी हैं, कहीं बैंकों के नोटिस किसानों की हिम्मत तोड़ रहे हैं। प्रतीकात्मक अर्थों में मां की खोज दरअसल अपनी ही मिट्टी की खोज है, खोज है उस डूबती सभ्यता की जो किसानों के साथ डूब रही है। एक जगह मधु लिखती हैं-मत पूछिए क्यों की उसने सुसाइड और वह भी बायको (पत्नी), मुलगा (बेटा), मुलगी (बेटी) और चार भाइयों के रहते। अकेले पड़ गए हैं किसान के आंसू।…आगे वह लिखती हैं, किसी कारण वर्षा नहीं हुई या समय पर नहीं हुई तो किसान फंस जाता है, कर्जा चुका नहीं पाता है। इन मल्टीनेशनल्स ने, बैंकों ने गुंडे पाल रखे हैं किसानों से वसूली के लिए, इन गुंडों ने किसानों की कमजोर कड़ी पकड़ ली है, वह है उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा। बस उसी को तार-तार कर देते हैं ये। घर के बाहर नोटिस चिपका देना, खुले आम धमकाना इनका हथियार है।
गांवों में घूमते हुए अविनाश को यह सब पता चलता है-किसानों के बारे में। हर किसान की कमोबेश यही हालत है। उपन्यास में नायक अविनाश मां को खोजने की प्रक्रिया में उन सभी गांवों में जाता है, जहां-जहां उनकी मां रहीं। मां कहीं नहीं मिलतीं, लेकिन इस बहाने वह बहुत से गांवों में घूमता है। इन्हीं गांवों में उसे पता चलता है कि मां यहां रहने वाले किसानों के लिए काम किया करती थी। कथा कहती है कि अविनाश की मां चाहती थीं कि वह इन गांवों में आए और असली भारत देखे। कथा के अंत में अविनाश को पता चलता है कि उसकी मां अब इस दुनिया में नहीं है। वह मां द्वारा अधूरे छूट गए कामों को पूरा करने का बीड़ा उठाता है, सड़क बनवाना, नदी बनवाना और कई अन्य कार्यों में अविनाश खुद को झोंक देता है। अब अविनाश पाता है कि उसे एक सुकून मिलने लगा है। अविनाश एक दिन अपने मामा से कहता है, यहां नहीं रहता तो जीवन भर कच्चा ही रह जाता। कहां जान पाता कि इस सदी का इतिहास किसान और मजदूरों के खून से सना इतिहास है। हमारी सारी प्रगति और आधुनिकता की उड़ानें, ये संचार क्रांति, ये उच्च प्रौद्योगिकी, ये फ्लाईओवर, ये भव्य मॉल, ये हाईवे, ये बड़े-बड़े बांध और ये गगनचुंबी अट्टालिकाएं, सब व्यर्थ हैं, यदि हम ढलती सांझ के इन सूरजों को न बचा सके।
‘ढलती सांझ का सूरज’ केवल गल्प नहीं है। बकौल वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग, इस उपन्यास में जो कथ्य है वह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो कथित सफलता अर्जित करने के बाद उसकी सीमाओं को महसूस करता है, उसमें एक तलाश है, अपनी सार्थकता की, अपनी आत्मा की, अपनी अर्थवत्ता की। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है। मधु कांकरिया अविनाश की इस खोज को जीवन और आत्मा की खोज तक ले जाती है। यह संयोग नहीं है कि मां की खोज में उसे उन किसानों के गांवों तक जाना पड़ता है, जो कर्जे में डूबे आत्महत्या कर चुके हैं या उस दिशा में बढ़ रहे हैं। यह उपन्यास उस सभ्यता की मृत्यु का संकेत है, जिसमें सिर्फ भोग विलास की वस्तुओं को ही परम सुख मान लिया जाता है।


