
ललिता जोशी |
मेरे घर आई एक नन्ही परी। एक समय था जब लड़की के जन्म लेते ही मरने के लिए छोड़ दिया जाता था। कहीं नवजात बच्ची के मुंह में अफीम भर दिया जाता था, तो कहीं उसे दूध के बर्तन में डूबा कर मार दिया जाता था। क्रमश: विज्ञान और टैक्नोयलॉजी के विकास के कारण अजन्मे कन्यार भ्रूण की कोख में ही हत्या कर दी जाती थी। जैसे-जैसे मानव ने विकास के पायदानों पर चढ़ना शुरू किया और विज्ञान टैक्नोलॉजी के विकास से जब भ्रूण में ही लिंग पहचान की जाने लगी तो लड़कियों की शामत आ गई और जन्म से पहले ही उसकी हत्या का प्रचलन चल पड़ा। लड़के के मुकाबले बालिकाओं का प्रति हजार पर प्रतिशत का ग्राफ गिरता ही चला गया। स्थिति भयावह होती चली गई।
देश में उस चिंताजनक स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार व राज्य सरकारों ने बालिकाओं के असत्तिवकी रक्षा के लिए कई अभियान चलाए ताकि बच्चियों की गिरती जन्मद दर में वृद्धि हो सके। कन्याओं को बोझ समझने वाले देश में कन्याओं की सुरक्षा के लिए सरकारों ने कई योजनाएं चलार्इं। लेकिन आज भी लड़कियों की स्थिति चिंताजनक है। कहीं दुष्कर्म का चीत्कार, कहीं दहेज उत्पीड़न तो कहीं ऐसिड अटैक से जूझती बच्चियां, तो दूसरी तरफ घरों और कार्यालयों में लैंगिक असमानता व यौन उत्पीाड़न का शिकार बनती युवतियां। यह सब हमारे देश में घटित होने वाली घटनाएं हैं, जबकि भारतीय संस्कृति में देवी पूजन को काफी महत्ता प्राप्त है, तो भी यहां देवी स्वरूप इन लड़कियों को अजन्मी ही रहना पड़ता है। मां की पीड़ा को भी किसी ने नहीं समझा न ससुराल वालों ने न ही पति ने।
लेकिन समय की करवट के कारण थोड़ा परिवर्तन आया है। और अब लड़कियों के जन्म की खुशियां मनाई जाती हैं। अब बेटियां पापा की परियां हैं और पापा भी बेटी के दोस्त ज्यादा और पापा कम हैं। यह बदलाव तो सुखद है, लेकिन एक आश्चर्यजनक परिवर्तन देखने में आया है कि जिन घरों में लड़कियां पापा की लाडली हैं, वो जब बात करती हैं तो वो अपना लिंग परिवर्तन कर लेती हैं। जी हां लिंग परिवर्तन। जैसे कि पापा मैं अभी आया, पापा मैं स्कूल जा रहा हूं, पापा मैं बाजार जा रहा हूं, मम्मा मैं अपने दोस्तों के साथ आज पार्टी करूंगा।
बड़ा अजीब-सा लगता है कि आप अपनी बिटिया को किस भ्रम में डाल और पाल रहे हैं। यह आदत इतनी पक जाती है कि उसे पता ही नहीं चलता कि वो बोल क्या रही है। हद तो तब हो गई जब शादी के बाद भी यह आदत नहीं छूटती है। यह समझने की बात है कि किसी को भी अपना लिंग स्वीतकारने में शर्म आनी चाहिए क्या? यदि हम ऐसा करते हैं तो निश्चय ही हमें अपने लिंग पर शर्म है। तब भी तो हम स्वयं को स्वीकार नहीं पाते हैं। क्या स्त्री होना कोई अपराध है जो हम कहते हैं कि हमने अपनी लड़की को लड़के की तरह पाला है। ऐसा क्योंं? क्या लड़कियां किसी से कम हैं? क्या झांसी की रानी लक्ष्मीीबाई, अहिल्याकबाई होल्कार जैसे न जाने कितने ही उदाहरण हैं सक्षम, समर्थ महिलाओं के। कन्या में प्रकृति प्रदत्त़ शक्तियां होती हैं। क्योंकि हम छोटी-छोटी बच्चियों के मन में हीन भावना पनपने देते हैं कि उसे बेटे की तरह पाला जा रहा है। यहीं से माता-पिता उसकी बुनियादी शुरुआत ही गड़बड़ा देते हैं। उस पर ऊपर से तुर्रा कि लड़कियां क्या लड़कों से कम हैं। अरे भई, प्रकृति की प्रत्येक रचना खूबसूरत होती है। इसी प्रकार बेटियां भी खूबसूरत रचना हैं
प्रकृति की।
आज हमें जरूरत है शक्ति स्वरूप कन्याओं को उनके भीतर के साहस, आत्म विश्वास से मुलाकात कराने की और उसमें वृद्धि की। ऐसा कौन-सा कार्य है जो लड़कियां नहीं कर सकतीं। लेकिन ‘क्याव तुम कोई लड़के से कम हो’ कहकर हम ही लड़कियों में अपराध बोध को गहराते हैं।
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि ‘यत्र नार्यस्तुह पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ अर्थातजहां नारी की पूजा होती है, वहीं देवताओं का वास होता है। कहने का तात्पतर्य यह है कि जब हमारे देश में नारी पूजनीय है, कन्याओं का देवी पूजन होता है तो फिर नन्हीं बच्चियों के परिवारों को यह समझ लेना चाहिए कि मैं जा रहा हूं या आ रहा हूं कह लेने से आप लड़की को लड़के में परिवर्तित नहीं कर सकते। परिवर्तित करना है तो अपना नजर व नजरिया बदलें। तभी समाज में लड़कियों की स्थिति और सुदृढ़ हो सकेगी।


