- नगर निगम के ही एक अधिकारी ने 2.25 करोड़ के भूसे के टेंडर करने पर की आपत्ति
जनवाणी ब्यूरो |
मेरठ: गोशाला में भी भ्रष्टाचार के रास्ते तलाशे जा रहे हैं। भ्रष्टाचार एक-दो लाख का नहीं, बल्कि करोड़ों में करने की तैयारी नगर निगम के अधिकारी कर रहे थे। इस भ्रष्टाचार की कलई तक खुली जब नगर निगम के ही एक अधिकारी ने 2.25 करोड़ के भूसे के टेंडर करने पर आपत्ति कर दी थी।
आपत्ति होने के बाद भ्रष्टाचार की बात निगम से बाहर नहीं निकले, इसलिए इस पूरे मामले पर आला अफसरों ने लीपापोती कर दी थी। यही नहीं, तब गोशाला के प्रभारी रहे राजपाल यादव को भ्रष्टाचार में बाधा बनने के बाद प्रभारी के पद से भी हटा दिया था। इस भ्रष्टाचार के जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गोशाला प्रोजेक्ट पर पूरा फोकस रहता है। बावजूद इसके नगर निगम के अधिकारी इसमें भी भ्रष्टाचार तलाश रहे हैं। दिल्ली रोड पर स्थित नगर निगम के अधीन गोशाला में 300 गाय हैं, जबकि भूसे का टेंडर 900 गाय का किया जा रहा था।
300 गाय का खर्च ही निगम के अधिकारी आॅन रिकॉर्ड स्वीकृत कर रहे थे, लेकिन अचानक भूसे के टेंडर में बड़ा खेल किया जा रहा था। नगर निगम के ही एई राजपाल यादव ने आपत्ति कर दी, जिसके बाद इस भ्रष्टाचार की पोल खुल गई। इस गोशाला में 300 गाय हैं। तो फिर 300 गाय के भूसे का टेंडर होना चाहिए, लेकिन नगर निगम के अधिकारियों ने 900 गाय का टेंडर प्रक्रिया में ले आए थे।
एक तरह से यह टेंडर करीब 2.25 करोड़ का नौ माह के लिए होने जा रहा था, जिस पर तत्कालीन गोशाला प्रभारी राजपाल यादव ने आपत्ति कर दी थी। उनकी आपत्ति 900 गाय के भूसे के टेंडर को लेकर थी। उन्होंने जो आपत्ति की थी, उसमें स्पष्ट किया गया था कि गोशाला में 300 गए हैं, जबकि टेंडर 900 गाय के भूसे का कैसे किया जा सकता है?
गाय के भूसे को लेकर भी बड़ा भ्रष्टाचार नगर निगम में किया जा रहा था, लेकिन शुक्र है कि राजपाल यादव को उसकी आत्म ने झकझोर दिया,जिसके चलते भ्रष्टाचार होने से बच गया। दरअसल, 5.25 लाख का भूसा प्रत्येक माह गोशाला पर खर्च हो रहा था।
इस तरह से पूरे वर्ष का खर्च 65 लाख का बैठता है, जबकि भूसे का टेंडर 2.25 करोड़ का कैसे किया जा रहा था? यह बड़ा सवाल है। इस भ्रष्टाचार में कौन-कौन शामिल था ? इस भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा रहा था, इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? इसकी बड़े स्तर पर जांच पड़ताल की जानी चाहिए।
क्योंकि गोशाला के तत्कालीन प्रभारी राजपाल यादव की आपत्ति के बाद ही भूसे का टेंडर तब तो टल गया था, लेकिन बाद में राजपाल यादव को गोशाला प्रभारी के पद से हटाया गया। वर्तमान में दिल्ली डिपो प्रभारी गजेन्द्र सिंह को ही गोशाला का भी प्रभारी बनाया गया है। इसके बाद टेंडर कितने का हुआ?
इसको नगर निगम के अधिकारी छुपा रहे हैं। टेंडर मौजूद गाय के संख्या के अनुसार होना चाहिए। इतना हो सकता है कि बीस गाय बढ़ भी सकती है तथा घट भी सकती है।
उसको देखते हुए गाय के भूसे का टेंडर किया जाना चाहिए। टेंडर प्रभारी कौन थे? मामले पर लीपापोती करने के बाद टेंडर प्रभारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई। यह बड़ा सवाल है।

