Thursday, April 2, 2026
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हर-हर महादेव के जयकारों के साथ आगे बढ़ रहे कांवड़िये

  • कोई नौकरी तो कोई किसी को बनवाना है मकान
  • भोलेनाथ के प्रति लोगों का है अटूट विश्वास
  • पैदल ला रहे गंगाजल 12 से 30 फीट की है कांवड़

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: सावन का यह माह उमंग, उल्लास व खुशी से भरपूर रहता है। भोलेनाथ से भक्त मनोकाना पूरी कराने के लिए उनके द्वार अपने अलग-अलग तरीकों से मनोकामना पूर्ण कराने के लिए जाते है। भक्ति व आस्था का यह नजारा ऐसा है कि मनोकामना पूरी होने की आस मन में संजोकर आस्था की डगर पर कदम बढ़ाते चले आ रहे शिवभक्तों का सैलाब लगातार बढ़ता जा रहा है।

किसी के मन में मनोकामना पूरी होने की खुशी है तो किसी के मन में मनोकामना पूरी होने की पूरी उम्मीद है। इसी आस्था व श्रद्धा के वशीभूत होकर शिवभक्त तपस्या के साथ कांवड़ ला रहे हैं। जनवाणी टीम ने जब हरिद्वार से कांवड़ ला रहे कांवड़ियों से बातचीत की तो उन्होंने अपनी बात कुछ इस प्रकार सांझा की।

हापुड़ निवासी निशांत ने बताया कि वह चार साल से लगातार कांवड़ ला रहे हैं। इस वर्ष कांवड़ शिविरों में गत वर्षों से अधिक सुविधाएं कांवड़ियों को दी जा रही हैं। निशांत ने बताया कि वह अपने परिवार में सुख शांति के लिए कांवड़ लाते हैं। गत वर्ष उनकी मनोकामना पूरी हो गई थी, जिसके बाद इस वर्ष वह कांवड़ लेने आए थे।

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दिल्ली निवासी रितिक ने बताया कि इस वर्ष शिवभक्तों में कलश कावंड़ का अधिक क्रेज देखने को मिल रहा है। निशांत छह साल से कांवड़ ला रहे हैं, लेकिन दो साल वह कांवड़ नहीं ला पाए थे। नौकरी के लिए वह कांवड़ ला रहे है। उन्होंने बताया कि इसबार में परिवार का जीवन सुखद व खुशहाल रहे और राम मंदिर जल्द से जल्द बन जाए इस की मन्नत भी मांग कर आए हैं।

फरीदाबाद निवासी मनीष ने बताया कि वह दो साल से कांवड़ ला रहे हैं और हर साल वह अपने गांव और परिवार की सुख शांति के लिए कांवड़ लाते हैं। सावन महीना बोले की भक्ति का होता है। इसलिए वह इस माह में भोले बाबा को मनाने का काम जरूर करते हैं।

गाजियाबाद निवासी प्रमोद ने बताया कि भोले की भक्ति करने में अलग ही मन लगता है। वह कई साल से कांवड़ ला रहे हैं। उन्होंने बताया कि इसबार चारों ओर केसरिया रंग उमड़ा हुआ है। जिससे रास्ता का सफर पूरा करने में आसानी हो रही है। भोले के जयकारे मन में और उमंग भरने का काम कर रहे हैं। जिससे पैरों में पड़े छाले भी कुछ मायने नहीं रख पा रहे हैं।

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दिल्ली निवासी कुलदीप शर्मा छह साल की उम्र से लगातार कांवड़ ला रहे हैं। उनका कहना है कि भगवान शिव की आस्था और श्रद्धा के सामने शरीर की सभी परेशानियां छोटी पड़ जाती है। वह भगवान शिव की निरंतर पूजा करते हैं।
32 साल से ला रहे कांवड़, कोरोना काल में साइकिल का किया था प्रयोग

फरीदाबाद से ग्रुप में कांवड़ लेकर आए रहे सतवीर ने बताया कि वह तो 32 साल से लगातार कांवड़ ला रहे हैं। कोरोना काल में भी उन्होंने कांवड़ लाना नहीं छोड़Þा। छुपती-छुपाते वह कच्चे रास्तों पर होते हुए कांवड़ लेने हरिद्वार पहुंच गए थे। इस बार उनका 15 लोगों को ग्रुप आया हैं, जिसमें सामान्य कांवड़, डाक कांवड़ और दंड़ी कांवड़ है। वह हरिद्वार से लेकर आ रहे हैं। सतवीर ने बताया कि और वर्षों के मुकाबले इस वर्ष शिव भक्तों को अधिक सुविधाएं सरकार की ओर से दी गई।

एक से बढ़कर एक सुंदर कांवड़

भोलेनाथ की भक्ति के साथ-साथ शिवभक्त देश प्रेम का अनोखा सदेश दे रहे हैं। ऐसे में कोई सुदंर व अनोखी कांवड़ बनाकर जल लेकर आ रहा हैं तो कोई मंदिर तो कोई 131 फीट का तिरंगा ले कर चल रहा है। इसके साथ लोग भी कांवड़ियों के मेले का नजारे देखने का आनंद ले रहे हैं।

कांवड़ियों के कंधों पर गंगाजल और मन में भगवान शिव के प्रति दृढ़ संकल्प है। कांवड़ियां कई तरह की कांवड़ लेकर शिवालयों की ओर बढ़ रहे हैं। जिसमें कंधों पर लाने वाली सामान्य व कठिन कांवड़, डाक कांवड़, खड़ी कांवड़ और दंडी कांवड़ मुख्य रूप से है।

पत्नी और बच्चों के साथ कमल हर साल ला रहे कांवड़

दिल्ली निवासी कमल पत्नी रेखा और बेटी आलिया के साथ हर साल कांवड़ लाते हैं। आलिया नौ साल की है। उनका कहना था कि मैं पापा के साथ कई साल से पैदल कांवड़ ला रही हूं।

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कमल ने बताया कि वह किसी मन्नत के लिए नहीं अपने परिवार की शांति के लिए कांवड़ लाते हैं। कांवड़ के दौरान वह दुकान को भी बंद रखते हैं। भोले बाबा सब की मुराद पूरी करते हैं।

इस वर्ष कांवड़ियों ने बढ़ाई गंगाजल की मात्रा

कांवड़ यात्रा में हर साल कुछ न कुछ बदलाव देखने को मिलता है। इस बार कांवड़ यात्रा में शिवभक्त भारी भरकम कांवड़ कंधों पर उठाए हुए हैं। युवाओं के साथ-साथ बड़ी उम्र के कांवड़ियां भी इस वर्ष कलश कांवड़ लेकर हरिद्वार से आए रहे हैं। देखने में आ रहा है कि इस वर्ष गंगाजल की मात्रा बढ़ाने पर कांवड़ियों ने अधिक जोर दिया है। जिसके चलते बड़े कलशों का प्रयोग किया गया है।

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