- कारगिल युद्ध में जांबाजों ने छुड़ाए थे दुश्मन के छक्के
- जवानों ने लगा दी थी जान की बाजी
- लेकिन बदले में दुश्मन को इससे भी बड़ी चुकानी पड़ी थी कीमत
जब भी सरहद ने पुकारा, हमें जाना होगा। दुश्मने-मुल्क का सर जाके झुकाना होगा।
दूध का कर्ज भी ऐ मां तेरा वाजिब लेकिन, कर्ज मिट्टी का हमें पहले चुकाना होगा।
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: बर्फ से ढंकी कारगिल की वादियों को अपने कब्जे में लेने की गुस्ताखी करने वाली दुश्मन सेना के छक्के छुड़ाने में देश के जवानों ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी, लेकिन बदले में दुश्मन को इससे भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। चिर-परिचित दुश्मन पाक सेना से 26 जुलाई 1999 को कारगिल को आजाद कराते हुए विजय पताका फहराई गई।
इस खतरनाक इलाके में लड़ी गई जंग के दौरान मेरठ के पांच जांबाज मेजर मनोज तलवार और वीर चक्र विजेता शहीद सीएचएम यशवीर सिंह, लांसनायक सत्यपाल सिंह, नायक जुबैर अहमद, ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव की शहादत कभी न भुलाई जाने वाली दास्तान बनकर रह गई है। इनके साथ ही सिपाही सतीश कुमार, लेफ्टिनेंट तरुण नायर की शहादत भी स्मरणीय है, जिनके परिवारों का मेरठ से कभी न टूटने वाला संबंध रहा है।
इनका बलिदान इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहूति देते हुए देश की इंच-इंच जमीन को दुश्मनों के कब्जे से मुक्त कराया। कारगिल युद्ध में टाइगर हिल पर पाकिस्तानी सेना ने सबसे ज्यादा नुकसान किया। दुश्मन 18 हजार फीट की ऊंचाई पर और भारतीय जवान नीचे से उनका मुकाबला कर रहे थे।
पाक सेना की ओर से मशीनगन चल रही थी। कितने ही जवान शहीद हो गए थे। ऐसे में मेरठ के जवान ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने अपने सात साथियों के साथ प्वाइंट पर पहुंचकर पाकिस्तानी बंकरों को ध्वस्त किया। उन्होंने दुश्मन के 17 जवानों को मौत के घाट उतार दिया। पांच जुलाई 1999 की शाम को दुश्मन की जवाबी गोलीबारी में वो शहीद हो गए। उनकी वीरता के लिए वीर चक्र मेडल दिया गया।

मवाना रोड स्थित डिफेंस कालोनी ए-34 निवासी मेजर मनोज तलवार की फरवरी 1999 में फिरोजपुर पंजाब में तैनाती हुई, लेकिन वे देश के लिए कुछ करना चाहते थे, उन्होंने सियाचिन में नियुक्ति की मांग की। कारगिल में युद्ध हुआ तो उनकी बटालियन को टुरटुक में भेजा गया। 13 जून को उन्होंने कारगिल सेक्टर टुरटुक में तिरंगा फहरा दिया। इसी बीच दुश्मन की तोप के गोले के वार से वह शहीद हो गए।
थाना परीक्षितगढ़ के गांव ललियाना निवासी जुबैर अहमद की 22 ग्रेनेडियर हैदराबाद में तैनाती थी। वर्तमान में उनका परिवार नौचंदी थाना क्षेत्र में जैदी फार्म गली नंबर दो में रह रहा है। जून 1999 में जुबैर अहमद का हैदराबाद से जम्मू के लिए तबादला हो गया था। जुबैर पत्नी और बच्चों को छोड़ने के लिए छुट्टी लेकर मेरठ आ गए। इसी दौरान कारगिल की जंग शुरू हो गई। जुबैर आनन-फानन में 20 दिन की छुट्टी शेष रहने के बावजूद उेश के लिए मर मिटने का जज्बा दिल में लेकर जंग के मैदान में पहुंच गए। और दुश्मन से लोहा लेते हुए तीन जुलाई को पर शहीद हो गए।

मूलरूप से बागपत के सिरसली और बाद में रोहटा बाइपास पर रहने वाले हवलदार यशवीर सिंह की बटालियन को तोलोलिंग का टास्क मिला। 12 जून को टू-राजपूताना राइफल ने मेजर विवेक गुप्ता के नेतृत्व में 90 जवानों ने इस प्वाइंट पर हमला बोल दिया। प्वाइंट 4950 पर कब्जे को भीषण युद्ध हुआ। हवलदार यशवीर सिंह ने सीने पर गोलियां लगने के बावजूद ग्रेनेड के साथ पाकिस्तानी सेना के बंकरों पर हमला कर दिया। 40-50 दुश्मनों को मारकर वे शहीद हो गए। 13 जून 1999 को तोलोलिंग पर भारतीय सेना ने तिरंगा फहरा दिया था।

मूलरूप से गढ़मुक्तेश्वर के लुहारी गांव निवासी लांसनायक सत्यपाल सिंह का जनवरी 1999 में जम्मू तबादला हुआ था। कारगिल की जंग शुरू हो गई। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूताना राइफल्स को कारगिल पहुंचने का आदेश मिला। तोलोलिंग जीतने के बाद 28 जून को दुश्मनों से लड़ते हुए द्रास सेक्टर में शहीद हो गए।
मेरठ कैंट में तैनात 17 गढ़वाल राइफल्स के ये सपूत हुए शहीद
कैप्टन जिंदू गोगोई, सूबेदार प्रताप सिह, हवनदार मदन सिंह, नायक शिव सिंह एसएम नायक ज्ञान सिंह, नायक सुरेन्द्र सिंह, लांस नायक सुरेन्द्र सिंह, लांस नायक हरीश सिंह, लांस नायक दिलवर सिंह, मदन सिंह, राम प्रसाद, देवेन्द्र प्रसाद, कृपाल सिह, दिनेश दत्त, राइफल मैन वीरेन्द्र लाल, अमित नेगी, विजय सिंह, जयदीप सिंह भंडारी, रजीत सिंह,सतीश चंद्र दलवीर सिंह, भगवान सिंह आदि।
मेरठ के शहीद जवान
- 13 जून 1999 को मेजर मनोज तलवार शहीद
- 13 जून 1999 को ही वीर चक्र से अलंकृत सीएचएम यशवीर सिंह
- 28 जून 1999 को सेना मेडल से अलंकृत नायक सत्यपाल सिंह शहीद
- तीन जुलाई 1999 को 22 ग्रेनेडियर जुबैर अहमद शहीद
- पांच जुलाई 1999 को ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव शहीद
कारगिल शहीदों की अर्द्धांगिनियों को किया सम्मानित
आजादी के 75वें अमृत महोत्सव पर आज कारगिल विजय दिवस के 23 वर्ष होने की पूर्व संध्या पर जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास कार्यालय मेरठ की ओर से कारगिल विजय में दुश्मन के षड्यंत्र को जज्बे से असफल करने वाले बलिदानियों की वीर नारियों का सम्मान किया गया। जिनमें उर्मिला पत्नी सिपाही योगेन्द्र सिह यादव, मुनेश देवी पत्नी हवलदार यशवीर सिंह, बिमलेश देवी पत्नी सतीश कुमार, बबीता देवी पत्नी लांस नायक सत्यपाल सिंह शामिल रहीं।
इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रपति पदक से अलंकृत सरबजीत सिंह कपूर ने 1999 में दुश्मन की घुसपैठ के बाद दो महीने तक भीषण युद्ध के दौरान पेश आई परिस्थितियों और इस युद्ध में भारतीय सेना के 527 जवान शहीद होने और 1363 अन्य घायल होने के इतिहास पर प्रकाश डाला। एक-एक कर कारगिल की सभी चोटियों पर भारतीय परचम फिर से लहराने लगा और 26 जुलाई 1999 को विजय की घोषणा हुई।

जनपद मेरठ के लिए यह बहुत गर्व की बात है कि यहां से पांच वीर सपूतों ने बलिदान दिया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि ने कारगिल युद्ध के बलिदानियों को श्रद्वांजलि दी, और बलिदानियों की वीर नारियों को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कैप्टन (आईएन) राकेश शुक्ला ने कहा कि मेरठ की इस क्रांतिधरा के वीर सपूतों ने भी मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी।
शौर्य समर्पण और राष्ट्र प्रेम की भावना के कारण ही कारगिल में एनएच-1 पर कब्जा करने की पाकिस्तानी साजिश को भारतीय सैनिकों नें असफल कर दिया। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर बलिदानियों की वीर नारियों के सम्मान समारोह में कर्नल वेटरन, कर्नल जेके तोमर हेड क्वार्टर पश्चिम यूपी सब एरिया उपस्थित रहे। समाज सेवा से जुड़े रहने तथा इस कार्यक्रम में भाग लेने पर जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कैप्टन (आईएन) राकेश शुक्ला ने मुख्य अतिथि का आभार प्रकट किया।

