- नई नवेली दुल्हन कर रही पहली तीज के लिए जमकर खरीदारी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: वैसे तो तीज के त्योहार पर भी थोड़ी-थोड़ी अधुनिकता की मार पड़ गई हैं, लेकिन आधुनिकता ने इसके उत्साह में कोई कमी नहीं की है। बेशक वक्त की कमी के चलते कभी सामूहिक तौर पर मनाया जाने वाला यह त्योहार अब घरों के अंदर तक सिमट गया है। अपने बचपन के दिनों में मनाई जाने वाली तीज की याद करते हुए नीरा तोमर बताती हैं कि पहले सावन लगते ही तीज की तैयारियां शुरू हो जाती थीं।
महिलाएं जवे, सेवाइयां आदि तोड़ने में लग जाती थीं। तीज महिलाओं की मौज-मस्ती का त्योहार होता था। हालांकि तीज को लेकर कामकाजी महिलाओं के उत्साह में आज भी कोई कमी नहीं है पर वक्त की कमी के चलते जवे तोड़ना जैसे काम अब वे खुद नहीं कर पातीं। आज हर कोई अपने परिवार में ही इस त्योहार को मनाता है।
झूले की बात करें तो बदलते दौर में झूलों की स्टाइल में भी कई परिवर्तन आए हैं। आज भी सावन के मौके पर अनेक स्थानों पर झूले सजते हैं और महिलाएं झूला भी झूलती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले इन त्योहारों को मनाने के लिए वक्त की कोई कमी नहीं थी।

सावन का महीना उल्लास और उमंग का है। सावन में कई परंपराएं लोगों के प्रकृति प्रेम और आपसी समन्वय और प्रेम को दशार्ती है। घेवर की मिठास, मेहंदी की खुशबू और रंगत के साथ नवविवाहिता उत्सुक है। इधर महिलाओं के लिए मार्केट में लहरिया की धूम मची है। सावन की झमाझम से सजी-संवरी, इठलाती, मुस्काती धरा सावन के पग पडते ही खिलखिलाती उठी है।
इसका रोम-रोम, कण-कण पुलकित है। नव पल्लव झूमते हैं, डालियां अगडाइयां लेती हैं। मोर, पपीहा, दादुर सभी मनभावन सावन की अगुवाई में सरगम सजाते हैं तो लोक जीवन कैसे ना गाए, कैसे ना नाचे! इस मनभावन सावन में जन मन इसी उल्लास को झूलों की पींगों और मल्हार के बोलों संग जीता है। देवालयों से लेकर गली-मोहल्लों, बाग-बगीचों और घर के अहातों में झूलों के नजारे और झूलों के गीत इस महीने का सौन्दर्य और भी बढ़ा देते हैं।
सावन के गीतों की होती थी धूम
कच्चे नीम की निंबोली, सावन जल्दी आइयो रे हरियाणा का यह लोकगीत तीज के मौके पर शहर और गांवों में रह रही बुजुर्ग महिलाओं की जुबान पर रहता है। बाजार में भी इन दिनों हरियाली तीज के आने की रौनक देखी जा सकती है। तीज के उपहारों और जरूरी सामान के खरीदारों का उत्साह देखते ही बनता है। सावन में पड़ने वाली इस तीज का नई नवेली दुल्हनें ही नहीं,बड़ी-बूढ़ी महिलाएं भी बेसब्री से इंतजार करती हैं।
तीज को झूला उत्सव भी कहा जाता है। न सिर्फ गांवों में बल्कि शहरों में भी झूले डालने की तैयारियां सावन लगते ही शुरू हो जाती हैं। शहरों में तो तीज को लेकर अनेक स्थानों पर तरह-तरह के आयोजन और समारोह भी होते हैं जहां महिलाओं के लिए मेहंदी, चूड़ियां, साज शृंगार के सामान और झूला झूलने की खास व्यवस्था रहती है।
डा. मंजू गुप्ता का कहना है कि तीज की तैयारियों की बात करें तो महिलाएं घरों की साफ-सफाई करने के साथ-साथ साज शृंगार का भी पूरा बंदोबस्त कर लेती हैं। साथ ही, तीज पर गाए जाने वाले गीतों को भी महिलाएं एकत्रित होकर गाती हैं। इन गीतों में कहीं भाई-बहन का प्यार झलकता है तो कहीं सास-बहू की नोक़झोंक और कहीं पिया से मिलन की कामना।
रीना सिंघल इस त्योहार पर महिलाओं के मायके से ससुराल में कोथली ले जाने की भी परंपरा है जिसमें भाई अपनी बहन के लिए मेहंदी, चूड़ियां मीठी सुहाली, घेवर और मिठाइयां आदि लेकर जाते हैं जिसके आने का बहन को भी बेसब्री से इंतजार रहता है। इस मौके पर सास भी अपनी बहुओं को सिंधारा देती हैं जिसके लिए तैयारियां कई दिन पहले से ही शुरुहो जाती हैं।
अनीता राणा का कहना है कि तीज के त्योहार का सभी को पूरे साल इंतजार रहता है। तीज को लेकर पहले घरों में सावन लगते ही तैयारियां शुरू हो जाया करती थी और नीम के पेड़ पर झूले पड़ जाते थे, लेकिन आधुनिकता के दौर में अब सब कुछ बदल गया है। मगर तीज की रौनक आज भी वहीं है।

