
लॉटरी एक तरह का जुआ ही है। 1990 के दशक में इसी तर्क पर लंबी लड़ाई लड़ कर, पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल ने अपने लोक अभियान के जरिए दिल्ली में लॉटरी बंद करवाई थी। पीछे- पीछे कई राज्यों ने भी इसे बंद कर दिया था। जग जाहिर है कि लोग जीतने के चक्कर में एक के बाद एक लॉटरी की टिकटें खरीदते जाते हैं। ज्यादातर का इनाम नहीं निकलता, पैसा बर्बाद जाता रहता है। निकलता है, तो भी और बड़ी रकम जीतने की आस में टिकट खरीदते जाते हैं। खेल- तमाशे से शुरू लॉटरी न छूटने वाली लत बन जाती है। दिवाली आने वाली है, लॉटरियों के धन वर्षा बंपर भी धड़ाधड़ उतारे जा रहे हैं। पंजाब स्टेट का दिवाली बंपर लॉटरी का ढाई करोड़ रुपये का और नागालैंड दिवाली स्पेशल बंपर का 5 करोड़ रुपये का पहला इनाम इसी महीने निकलना है, तो केरल पूजा बंपर का 10 करोड़ रुपये का अगले महीने। इस दफा लॉटरी की टिकटों की बिक्री बढ़ने के आसार हैं। क्योंकि केरल के अनूप बी ने 500 रुपये की ओणम बंपर लॉटरी की टिकट से 25 करोड़ रुपये का जैकपॉट ताजा- ताजा ही जीता है। टैक्स कट- कटा कर बेशक उसके हाथ में 15 करोड़ 75 लाख रुपये ही आए होंगे। लेकिन यह कोई मामूली रकम नहीं है, और फिर, कौन बनेगा करोड़पति का जैकपॉट प्राइज इससे आधा साढ़े 7 करोड़ रुपये ही है। बताते हैं कि इस बंपर लॉटरी की 66.5 लाख टिकटें बिकीं थीं, जिनसे केरल सरकार को इनाम राशि, जी एस टी और अन्य खर्चे काट कर करीब 270 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ।
लॉटरी का हर टिकट सपनों का टिकट होता ही है। हरेक टिकट के खरीदार का सपना होता है, और उम्मीद भी कि पहला इनाम उसी के नाम होगा। हर लॉटरी खरीदने वाला करोड़पति बनने का सपना संजोने लगता है। और फिर, यही चाह फटाफट खजाने के ऐसे द्वार खोलती है, जो महज किस्मत पर निर्भर करता है। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से विपरीत इस का बुद्धिमत्ता और कौशल से कोई लेना- देना नहीं है। लॉटरी की एक टिकट खरीदते ही हसीन सपनों का कारवां आंखों के सामने तैरने लगता है। आज पंजाब, केरल, गोवा, पश्चिम बंगाल, असम, महाराष्ट्र वगैरह देश के कुल 13 राज्यों में लॉटरियों का वैध कारोबार फल- फूल रहा है। करोड़ों रुपये इनाम की लॉटरियां प्रलोभन और प्रचार का ऐसा जाल बुनती हैं कि कोई भी आम आदमी सम्मोहित होने से बच नहीं सकता।
लॉटरी का आज जो स्वरूप है, उसके पीछे केरल की सरकार का बड़ा हाथ है। भारत में पहली दफा लॉटरी बेचने का ख़्याल केरल सरकार को 1966 में आया। तब केरल के वित्त मंत्री पी के कुंजू की कोशिशों से 1967 में लॉटरी शुरू हुई थी। इसके पीछे दलील थी कि लॉटरी की टिकट बेचना जनता पर टैक्सों का भार डाले- वसूले बगैर राज्य की आय बढ़ाने का बेहतरीन जरिया है। साथ- साथ गरीबों को अमीर बनने का सुनहरा मौका मिलता ही है। देखा- देखी तब केरल के पीछे- पीछे जम्मू और कश्मीर को छोड़ कर, देश के सभी राज्य अपनी- अपनी लॉटरी निकालने लगे। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकारें ही कुछ कायदे- नियमों के तहत लॉटरियों का संचालन करती हैं, कर सकती हैं। कोई उद्यमी या कारोबारी कानूनन लॉटरी का बिजनेस नहीं कर सकता। अनुमान है कि देश में लॉटरी का कारोबार 50,000 करोड़ रुपये का है। पश्चिम बंगाल समेत लॉटरी चलाने वाले सभी राज्य हर साल त्योहारों से जुड़े कई बम्पर ड्रॉ आयोजित करते हैं, जैसे न्यू ईयर बंपर, होली बंपर, पूजा बंपर और दीवाली बंपर। लेकिन राज्यों को साल में ज्यादा से ज्यादा छह बंपर ही निकालने की इजाजत है।
कुछ अर्सा पहले राजस्थान लॉटरी विभाग के एक सर्वे की रिपोर्ट से लॉटरी का गणित समझा जा सकता है। बताया गया कि टिकटों की बिक्री की कुल क्लेक्शन की 80 – 85 फीसदी रकम आम जनता में ही बंट जाती है। सबसे ज्यादा 40 से 45 फीसदी रकम विजेताओं को बतौर पुरस्कार बंटे जाते हैं। बाकी में से अंदाजन 10 फीसदी प्रचार- प्रसार पर और 5 फीसदी टिकटों की छपाई पर खर्च होता है।कमीशन वगैरह मिलाकर एजेंटों के हिस्से में कुल 20 फीसदी आता है। शेष 15 से 20 फीसदी मुनाफा होता है, जो राज्य सरकारें जन- कल्याण योजनाओं में लगाती हैं। मोटा अनुमान है कि भारत में हर महीने लॉटरी की 25 करोड़ से अधिक टिकटें बिकती हैं। इस सर्वे में और बताया गया कि राज्य सरकारों की साप्ताहिक लॉटरियों से हर हफ्ते 43 व्यक्ति लखपति बनते हैं। साप्ताहिक के साथ ‘बम्पर ड्रा’ मिला कर हर महीने 202 लखपति बनते हैं। इस हिसाब से, रोजाना औसतन 8 लोग महज लॉटरियों से रातोंरात लखपति बन जाते हैं।
एक समय लॉटरी ब्लैक मनी खपाने का अहम जरिया भी थी। कारोबारी इनामी टिकट खरीद लेते थे, और इनाम की राशि अपने अकाउंट में डलवा लेते थे। उनके खातों में लॉटरी से निकला इनाम सफेद धन हो जाता है। एक लाख की इनामी टिकट सवा लाख रुपये की ब्लैक मनी दिला देती थी। 1980 के शुरूआती सालों में चर्चा थी कि सुपर स्टार राजेश खन्ना ने अपने खातों में, लॉटरी के टिकटों से एक नहीं, बल्कि 250 इनाम मिलना दिखाया है ! शुरूआती दौर में, लॉटरी के टिकट के खरीदार का नाम- पता दर्ज करने का कायदा था। परिणाम निकलने पर लॉटरी के खरीदार को लॉटरी विक्रेता या एजेंट भी सूचित करते थे। अब जीतने वाले को खुद अखबार में अपना नम्बर देखना पड़ता है। आमतौर पर, तीस दिन के भीतर इनाम न लेने पर, राज्य सरकार इनाम राशि डकार जाती है। विभिन्न राज्य सरकारें इस तरीके से भी अब तक बेहिसाब धनराशि हजम कर चुकी हैं, क्योंकि टिकट गुम होने या परिणाम न देखने की भूल की सूरत में रकम का कोई दावेदार नहीं होता। जाहिर है कि राज्य सरकारें अपने दोहरे फायदे के लिए टिकट के खरीदार का नाम- पता दर्ज करने के पुराने नियम को बहाल करने के लिए कोशिशें नहीं करती।
देखा जाए, तो लॉटरी एक तरह का जुआ ही है। 1990 के दशक में इसी तर्क पर लंबी लड़ाई लड़ कर, पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल ने अपने लोक अभियान के जरिए दिल्ली में लॉटरी बंद करवाई थी। पीछे- पीछे कई राज्यों ने भी इसे बंद कर दिया था। जग जाहिर है कि लोग जीतने के चक्कर में एक के बाद एक लॉटरी की टिकटें खरीदते जाते हैं। ज्यादातर का इनाम नहीं निकलता, पैसा बर्बाद जाता रहता है। निकलता है, तो भी और बड़ी रकम जीतने की आस में टिकट खरीदते जाते हैं। खेल- तमाशे से शुरू लॉटरी न छूटने वाली लत बन जाती है। सवाल है कि जुआ रोकने के लिए सरकार कानून बनाती है, जुआरियों- सट्टेबाजों की धरपकड़ करती है, फिर आखिर क्यों राज्य सरकारें खुद लॉटरी की टिकटों के जरिए मासूम लोगों को कथित ‘सरकारी जुआह्ण खेलने के लिए उकसाती हैं ? लॉटरी की बिक्री से अर्जित राजस्व जन – कल्याण योजनाएं मुहैया करने के उद्देश्यों को सामने रख कर, लोगों को खुलेआम ‘सरकारी जुआ’ खेला कर लूटने को भी तो कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता।


