Wednesday, March 25, 2026
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गेहूं में लगने वाले प्रमुख रोग एवं निदान

KHETIBADI


पीली गेरूई (धारीदार रतुआ)

यह रोग दिसम्बर-जनवरी में देश के उत्तर-पश्चिमी मैदानी भागों में अधिक कोहरा एवं ठंड होने पर आता है। इसका रोगकारक पक्सीनिया स्ट्राइफॉर्मिस एफ. स्पे. ट्रिटिसी है। ठंडा तापमान (10-16 त्उ), बारिश अथवा ओस के साथ पत्ती नम होना रोग विकास के लिए अनुकूल होता है।

रोग-लक्षण

सर्वप्रथम यह रोग चमकीले पीले-नारंगी स्फॉट दाने या सॉराई के रूप में पत्तियों पर धारियों में प्रकट होता है। रोग के लक्षण पत्ती आवरण, बाली की गर्दन और ग्लूम्स पर भी बन सकते है। फफोले मुख्य रूप से ऊपरी पत्ती की सतहों पर एपिडर्मिस को तोडकर पीले-नारंगी यूरेडोबीजाणु (यूरेडोस्पॉर्स) पैदा करते हैं। रोग का ज्यादा प्रकोप होने पर खेत दूर से पीला दिखाई पड़ता है। यह फसल उपज को काफी हानि पहुँचाता है।

रोग-प्रबंधन

नत्रजन युक्त उर्वरकों की अधिकता पीला रतुआ रोग को बढ़ाती है। अत: संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें।
रोगरोधी किस्में: डीबीडब्ल्यू 303, डीबीडब्ल्यू 187, डीबीडब्ल्यू 173, एचडी 3086 आदि की बुवाई करें।
रोग के दिखाई देने के तुरंत बाद प्रोपिकॉनाजोल 25प्रतिशत ई.सी. या टेबूकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी के 1 प्रतिशत का छिडकाव अथवा टेबूकोनाजोल 25प्रतिशत + ट्राइफ्लोक्सीस्ट्रोबिन 50प्रतिशत डब्ल्यूजी का 0.06प्रतिशत का छिडकाव करें। रोग की उग्रता व प्रसार को देखते हुए छिडकाव 15-20 दिन बाद दोहरायें।

पत्ती रतुआ अथवा भूरा रतुआ रोग

यह रोग पक्सीनिया रिकॉन्डिटा एफ. स्पे. ट्रिटिसी कवक के कारण होता है। गर्म (15-20 त्उ) नम (बारिश या ओस) मौसम के दौरान रोग का विकास सबसे अनुकूल होता है।

रोग-लक्षण

प्रारम्भ में छोटे, गोल, नारंगी स्फॉट (पस्च्युल्स) या सोराई बनते हैं, जो पत्तियों पर अनियमित रूप से बिखरे रहते हैं। भूरे रतुआ में पीले रतुआ की अपेक्षाकृत कुछ बडे पस्च्युल्स बनते हैं। सोराई परिपक्वता के साथ भूरे रंग की हो जाती है। संक्रमण ज्यादा होने से उपज में कमी आती है।

रोग-प्रबंधन

नत्रजन युक्त उर्वरकों की संतुलित मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।
रोगरोधी किस्में: नई प्रतिरोधी किस्में डीबीडब्ल्यू 303, डीबीडब्ल्यू 222, डीबीडब्ल्यू 187 आदि हैं।
फसल पर रोग के दिखाई देने के तुरंत बाद प्रोपिकॉनाजोल 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा टेबूकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी के1प्रतिशत का छिडकाव अथवा टेबूकोनाजोल 25 प्रतिशत + ट्राइफ्लोक्सीस्ट्रोबिन 50 प्रतिशत डब्ल्यूजी के 0.06 प्रतिशत का छिडकाव करें। रोग की उग्रता व प्रसार को देखते हुए छिडकाव 15-20 दिन बाद दोहरायें।

चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्डयू) रोग

यह रोग ब्लूमेरिया ग्रेमिनिस एफ.स्पे. ट्रिटिसी (एरीसाइफी ग्रेमिनिस) कवक द्वारा लगता है। संक्रमण तथा रोग के बढ़ने के लिये अनुकूलतम तापमान 20 त्उ है।

रोग-लक्षण

सर्वप्रथम पत्तियों की ऊपरी सतह पर अनेक छोटे-छोटे सफेद धब्बे बनते हैं जो बाद में पत्ती की निचली सतह पर भी दिखाई देते हैं। अनुकूल वातावरण में यह धब्बे शीघ्र बढ़ते हैं और पर्णच्छद, तना, बाली के तुषों (ग्लूम्स) एवं शूकों (आॅन्स) पर भी फैल जाते हैं। रोगग्रस्त पत्तियाँ सिकुड़कर ऐंठने लगती हैं और विकृत हो जाती हैं तथा सूख जाती है। रोगग्रस्त पौधों की बालियों में दानें छोटे एवं सिकुड़े हुए और कम बनते हैं।

चूर्णिल आसिता रोग

रोग-प्रबंधन

रोगी पौध-अवशेषों नष्ट करें। संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।
रोग की रोकथाम के लिए 3 वर्षों तक गैर-अनाज फसलों को उगायें।

रोगरोधी किस्में

सदैव रोगरोधी या रोग सहिष्णु किस्में जैसे डीबीडब्ल्यू 173 आदि ही उगाना चाहिये। लक्षण दिखने पर प्रोपीकोनाजोल (1 मि.ली. /लीटर पानी) का छिड़काव करें।

करनाल बंट (अधूरा बंट)

अनेक देशों की संगरोध सूची में शामिल होने के कारण यह अति महत्वपूर्ण है। रोगजनक टिलेशिया इंडिका कवक है। आपेक्षिक आर्द्रता 70प्रतिशत से अधिक और दिन का तापमान 18-24 त्उ व मृदा तापमान 17-21 त्उ होना, एंथेसिस के दौरान बादल छाना या वर्षा करनाल बंट की गंभीरता बढाता है।

रोग-लक्षण

इस रोग को फसल की कटाई से पहले पहचान करना आसान नही है। फसल की कटाई के पश्चात रोग को आसानी से दृश्टि परीक्षण द्वारा पहचाना जा सकता है। काले रंग के टीलियोबीजाणु बीज के कुछ भाग का स्थान ले लेते है। रोगी दानों को कुचलने पर ये सड़ी हुई मछली की दुर्गन्ध देते हैं।

रोग-प्रबंधन

पुष्पन या एंथेसिस के समय प्रोपीकोनाजोल 25 ईसी @ 0.1प्रतिशत का पर्णीय छिडकाव करें।
अंत: फसलीकरण (इंटरक्रॉपिंग) व फसल चक्र को अपनाना चाहिए। करनाल बंट की रोकथाम के लिए क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत रोग प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें।

अनावृत कंड या खुला कंडवा (लूज स्मट) रोग

यह रोग अस्टीलैगो सेगेटम प्रजाति ट्रिटीसी कवक से होता है। हवा और मध्यम बारिश व ठंडा तापमान (16-22 त्उ) रोग के लिए अनुकूल हैं।

रोग-लक्षण

इस रोग के लक्षण केवल बालियां निकलने पर दृष्टिगत होते हैं। इस रोग में पूरा पुष्पक्रम (रैचिस को छोडकर) स्मट बीजाणुओं के काले चूर्णी समूह में परिवर्तित हो जाता है। यह चूर्णी समूह प्रारम्भ में पतली कोमल धूसर झिल्ली से ढका होता है जो शीघ्र ही फट जाती है और बडी संख्या में बीजाणु वातावरण में फैल जाते हैं। यें काले बीजाणु हवा द्वारा दूर स्वस्थ पौंधों तक पहुंच जाते हैं जहाँ ये अपना नया संक्रमण करते हैं।

रोग-प्रबंधन

बीज को कार्बोक्सीन (5 प्रतिशत) + थीरम (37.5 प्रतिशत) के 2.0-2.5 ग्राम प्रति किग्रा से उपचार करें।
मई-जून के माह में बीज को पानी में 4 घंटे (सुबह 6-10 बजे तक) भिगोने के बाद कड़ी धूप में अच्छी तरह सुखाने पर कवकजाल मर जाता है जिससे इस बीज की बुआई करने पर नई फसल में यह रोग नही पनपता है। क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत रोग प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें।
                                                                                        लेखक गण : रविन्द्र कुमार, चरण सिंह, अंकुश कुमार, ईश्वर सिंह, चंद्र नाथ मिश्र, उमेश आर. काम्बले, विकास गुप्ता एवं संतोष कुमार बिश्नोई


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