Saturday, May 23, 2026
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‘कूड़ा बम’ के मुहाने पर शहर

Samvad 1


08 5दिल्ली ही नहीं उससे सटे फरीदाबाद, गाजियाबाद, नोएडा और गुरुग्राम में बीते दो दशकों के दौरान बढ़ी आबादी और उपभोग वस्तुओं की वृद्धि की तुलना में कभी भी उससे उपजे कूड़े पर न कभी समाज चिंतित दिख और न ही सरकार। यह सच है कि सन 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल के बाद देश में स्वच्छता के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी और लोग इस पर चर्चा भी करने लगे। पिछले महीने ही केंद्र सरकार ने स्वच्छता अभिशन के दूसरे चरण में कूड़ा प्रबंधन पर विमर्श शुरू किया और तभी दिल्ली में नगर निगम के चुनाव की घोषणा हो गई। दिल्ली में कूड़ा उठाई से ले कर उसे खंती में पुहंचाने और यहां के कई हजार किलोमीटर नालों की सफाई के दस्तावेजी शेरों की हकीकत थोड़ी सी बरसात या मौसम बदलते ही होने लगती हैं।

अदालतें कई-कई बार सरकरों को कूडे के पहाड़ पर दिशा-निर्देश देती रहीं, लेकिन हकीकत तो यह है कि अकेले दिल्ली ही नहीं, देश के हर छोटे-बड़े शहर-कस्बे के निवासी की चिंता बस अपने घर-दुकान से कूड़ा निकाल कर बाहर फेंकने तक ही है। वह कैसे उठ रहा है, उसका निराकरण क्या है? उस पर कितना खर्च हो रहा है? ऐसे सभी सवाल आम लोगों के लिए बेमानी हैं।

यह जान लें कि दिल्ली, मुंबई सहित सभी महानगर ही नहीं, देश के तीन सौ से अधिक जिला मुख्यालय भी इस समय ‘कूड़ा-बम’ के मुहाने पर हैं। दिल्ली में तो यह कूड़ा बम यदा-कदा फटते रहते हैं, कभी ढह जाते है, तो कभी आग लगती है तो इनकी चर्चा भी होती है, लेकिन दूरस्थ शहरों में कूड़े के जलने से अस्पताल पुहंचने वालों का रिकार्ड तक नहीं है।

समझना होगा कि एक तरफ कूड़े को बढ़ाना और दूसरी तरफ उसको निबटाने के बारे में सोचना वैसा ही है जैसे नल खोल कर फर्श पर पोंछा लगाया जाए। सूखे फर्श के लिए पहले नल बंद करना होगा, यानी कूड़ा काम करने के तरीको ंपर विचार करना होगा।
हाल ही में एनजीटी ने दिल्ली सरकार पर कूड़े के पहाड़ पर लापरवाही बरतने के लिए 900 करोड़ का जुर्माना लगाया है।

इसके अलावा कूड़े के निस्तारण के प्रति बेपरवाही के चलते महाराष्ट्र, पंजाब, तेलंगाना , कनार्टक और राजस्थान सरकारों पर कुल मिला कर कोई तीस हजार करोड़ का जुर्माना लगाया जा चुका है। साफ दिखता है कि आदालतें सरकारों की नाकामी से हताश हैं और अपना रसूख जताने के लिए बड़े-बड़े जुर्मान ठोक रही हैं।

हमारे देश के शहर हर दिन लगभग 1,50,000 टन ठोस कचरा (एमएसडब्ल्यू) उगल रहे हैं, जिसमें से महज 25 फीसदी का प्रसंस्करण होता है। बाकी बचा कचरा या तो खुले में फेंक दिया जाता है या जला दिया जाता है। वर्ष 2030 तक कचरे की यह मात्रा 4,50,000 टन प्रतिदिन हो जाएगी।

सालों से हमारे यहां इस कूड़े से बिजली बनाने की चर्चा रही है, लेकिन यह प्रयोग बुरी तरह असफर रहा। इस तरह का पहला संयंत्र (डब्ल्यूटीई) दिल्ली के तिमारपुर में 1987 में लगा, लेकिन चला नहीं। तब से देश में 130 मेगावाट क्षमता के 14 और डब्ल्यूटीई संयंत्र लगाए गए, लेकिन इनमें से आधे बंद हो चुके हैं। बाकी पर पर्यावरण नियमों की अनदेखी की जांच चल रही है।

दिल्ली के ओखला संयत्र पर तो 25 लाख का जुर्माना भी हो गया। इन संयंत्रों के फेल होने का कारण कचरे की गुणवत्ता और संघटन है। कचरे में नमी ज्यादा होती है सो जलाने में अधिक ऊर्जा लगती है, जबकि बिजली कम मिलती है। देश में आए रोज कूड़े की ख्ांतियों में खुद ब खुद आग सुलगने का असली कारण कूड़े का लगातार सड़ना व उससे खतरनाक गैसों का उत्सर्जन होना ही बताया गया है।

सनद रहे कि इन दिनों कूड़े में बड़ी मात्रा में सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों और मोबाइल का है। इसमें पारा, कोबाल्ट और न जाने कितने किस्म के जहरीले रसायन होते हैं। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलोग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा लेड और 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। शेष हिस्सा प्लास्टिक होता है।

इसमें से अधिकांश सामग्री गलती-सड़ती नहीं है और जमीन में जज्ब हो कर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने का काम करती है। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाइलों से भी उपज रहा है। इससे निकला धुआं बड़ी आबादी को सांस की स्थाई बीमारियों दे रहा है।

असल में कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है और इसकी सबसे बड़ी मार भी आम लोगों पर ही पड़ रही है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला फाउंटेन पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफील बदलती थी। आज बाजार मे ंऐसे पेनों को बोलबाला है, जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं।

देश की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बमुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह शेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले यूज एंड थ्रो वाले रेजर ही बाजार में मिलते हैं।

अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन ले कर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है, पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फेंकी जाती हैं।

मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बरतनों का प्रचलन, बाजार से सामन लाते समय पोलीथीन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग; ऐसे ही ना जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। घरों में सफाई और खुशबू के नाम पर बढ़ रहे साबुन व अन्य रसायनों के चलन ने भी अलग किस्म के कचरे को बढ़ाया है।

यह अनिवार्य है कि दिल्ली के कूड़े को ठिकाने लगाने के लिए नए ठिकाने तलाशें जाएं, इससे भी ज्यादा अनिवार्य हैै कि कूड़ा कम करने के सशक्त प्रयास हों। इसके लिए केरल में कन्नूर जिले से सरीख ले सकते हैं, जहां पूरे जिले में बॉल पेन के इस्तेमाल से लोगों ने तौबा कर ली है, क्योंकि इससे हर दिन लाखों रिफील का कूड़ा निकलता था।

पूरे जिले में कोई भी दुकानदार पॉलीथीन की थैली या प्लास्टिक के डिस्पोजेबल बर्तन ना तो बेचता है और ना ही इस्तेमाल करता है। जाहिर है कि अनिवार्यता कूड़े को कम करने की होना चाहिए। जब कूड़ा कम होगा तो उसके निबटान में कम संसाधन व स्थान की जरूरत होगी।


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