Wednesday, May 20, 2026
- Advertisement -

अपनी अस्मिता को साबित करती वनतुलसी की गंध

Ravivani 34


Sudhanshu Gupta 1 2उपन्यास का जन्म किसी विचार से होता है। यह विचार सामाजिक भी हो सकता है और राजनीतिक भी। जब यह नया विचार लेखक को बहुत अधिक मथता है तो उपन्यास का जन्म होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी किरदार के रूप में यह ‘हैंग’ करता है और लेखक किरदार और उसके आसपास की दुनिया को जानते-समझते हुए किसी नये विचार तक पहुँचता है। इस स्थिति में उपन्यास की कथा यात्रा से ही विचार जन्म लेता है। विचार को स्थापित करने के लिए लेखक किरदार और घटनाएँ नहीं तलाशता। उपन्यास की कथा यात्रा से ही विचार जन्म देने वाले उपन्यास अधिक प्रामाणिक और सजीव व जीवंत होते हैं। शिव कुमार ‘शिव’ का ‘वनतुलसी की गंध’ (समीक्षा पब्लिकेशंस) ऐसा ही उपन्यास है, जो विचारों की बैसाखियों पर नहीं चलता बल्कि जीवन के पथरीले रास्ते पर चलते हुए विचार तक पहुँचता है। बेशक शिव कुमार ‘शिव’ की पहचान एक कहानीकार के रूप में है, लेकिन उन्होंने कविता, गीत, उपन्यास, लघु उपन्यास, संस्मरण और एकांकी जैसी अनेक विधाओं में काम किया है। संयोग से मैंने शिव कुमार ‘शिव’ को पहले कभी नहीं पढ़ा था। मेरे लिए वनतुलसी की गंध उनका पढ़ा गया पहला उपन्यास है। इसे लघु उपन्यास कहें तो ज्याद उचित होगा। वनतुलसी की गंध दरअसल सीता नाम की एक युवती की कथा है, लेकिन सीता के बहाने यह तीन पीढ़ियों (धनकुंवर गिनीया) के क्रूर और सामंती व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने की कथा है। किस्सागोई की शैली में लिखे इस उपन्यास की नायिका भी सीता है और नायक भी सीता ही है। धनकुंवर बिना विवाह किए ही ठाकुर महेससर सिंह के साथ रहने लगती है। वह सीता नाम बेटी और एक बेटे को जन्म देती है। धीरे-धीरे धनकुंवर के सामने पितृसत्ता का कुरूप चेहरा खुलने लगता है। धनकुंवर के प्रति ठाकुर महेसर सिंह का आकर्षण ‘शिफ्ट’ होकर सीता की तरफ हो जाता है। धनकुंवर भी समझ जाती है कि महेसर सिंह के लिए वह सिर्फ ‘रखैल’ थी। मेहसर सिंह का पहली पत्नी से हुआ बेटा धनकुंवर और सीता को घर से बाहर निकाल देता है। महेसर सिंह कुछ नहीं कर कर पाते या कुछ करना नहीं चाहते। जिद्दी सीता अपना अलग झोंपड़ा बना लेती है और माँ व भाई के साथ रहने लगती है। उसके चेतन में यह बात बैठ जाती है कि वह अपनी माँ (धनकुंवर) और नानी (गिनिया) के रास्ते पर नहीं चलेगी। वह अपना रास्ता खुद बनाएगी। रमेश नाम का एक युवक सीता से प्रेम करने लगता है और दोनों की शादी हो जाती है। लेकिन अलग रास्ता बनाने के संकल्प में सीता के सामने बहुत सी विपदाएँ आती हैं। यहां तक कि रमेश की मृत्यु के बाद उसकी सास सीता पर इस बात का दबाव बनाती है कि वह अपने देवर से विवाह कर ले। लेकिन सीता ऐसा करने से साफ मना कर देती है। वह अपनी लड़ाई खुद लड़ती है। शिव कुमार शिव की संवाद शैली बिना किसी बनावट के उपन्यास में दर्ज है। एक स्थान पर सीता की मां कहती है-‘सीता, बिना मरद वाली जनानी के जिनगानी घरी दुई घरी नाके लागिस, इ तोकई बच्छर कर बात हवे। तायें किस माफिक पहाड़ काटल कर बात करिस। (सीता बिना मरद वाली जनाना की जिन्दगी घड़ी दो घड़ी किनारे नहीं लगती है, यह तो बरसों की बात है, तुम किस तरह पहाड़ काटने की बात करती हो।)’ सीता जवाब देती है-‘खसम के मरते ही रांड सयानी हो जाती है माई। आज तुम अपनी ओर ताको न माई, ठाकुर ने बिसरा दिया, लेकिन ऊपरवाले ने तेरा चुग्गा तो नहीं छीना, भगवान पर भरोसा रख माई, उसने चोंच दी है तो चुग्गा भी देगा।’

शिव कुमार ‘शिव’ की भाषा में एक खास तरह की तल्खी है। स्थानीयता उनकी भाषा में भी है और उनके प्रयोग किये गए मुहावरों में भी। उपन्यास में उन्होंने लोकोक्तियों के साथ स्लैंग का तो इस्तेमाल किया ही है, स्थानीय लोकगीतों का भी प्रयोग किया है। इस सबने कथ्य को प्रभावशाली व प्रामाणिक बना दिया है। इस उपन्यास की जमीन सोभद्र, पलामू, सीधी, बैढन, बीजपुर, अनपरा, रिहंद डैम, पिपरी, रेणुकोट की जमीन है। यह वह क्षेत्र है, जो कोयला खदानों और बिजली परियोजनाओं का बड़ा केन्द्र है। संयोग से यही शिवकुमार शिव का अपना क्षेत्र है। उपन्यास में उन्होंने दिखाया है कि विकास के साथ किस तरह विस्थापन भी अपने पैर फैलाता है और आजीविका के लिए संकट खड़ा करता है। इस उपन्यास में शिव कुमार ‘शिव’ ने यह भी ‘एस्टबलिश’ किया है कि आर्थिक और विकासात्मक गतिविधियों से जड़ता टूटती है। इस उपन्यास की एक और खास बात यह है कि यहाँ विचार आरोपित नहीं हैं। वे कथा में से उपजते हैं। मिसाल के तौर पर लेखक ने कहीं भी स्त्री विमर्श की बात नहीं की। लेकिन पूरा उपन्यास स्त्री पर केन्द्रित है और पितृसत्ता के विरुद्ध खड़ा दिखाई पड़ता है। उपन्यास को रोचक बनाने के लिए उन्होंने कहीं भी नाटकीय घटनाक्रम का इस्तेंमाल नहीं किया है। कहानी का सिरा उन्होंने कहीं नहीं छोड़ा है, यही वजह है कि लगभग 100 पेज के इस उपन्यास की पठनीयता कमाल की है।

उपन्यास का मुख्य किरदार सीता न केवल समाज की कुदृष्टि से खुद को सफलतापूर्वक बचाती है बल्कि अपनी माई और भाई को भी सुरक्षित कर पाती है। शिव कुमार ‘शिव’ ने सीता के रूप में एक ऐसी स्त्री की कथा कही है, जो अपनी शर्तों पर जीना और प्रेम करना चाहती है, जो स्त्री को पुरुष के बराबर देखना चाहती है। जो समाज के बीहड़ों को अपना संघर्ष की खुशबू से महका देना चाहती है। और ये सब सिर्फ चाहतों में ही नहीं है, वह सचमुच ऐसा करके दिखाती है। यही वजह है कि सीता का किरदार हमारे लिए अहम हो जाता है। सीता आपसी रिश्तों की विद्रूपताओँ, पतन में जा रही नैतिकताओं और रूढ़िवादी परंपराओं के खिलाफ खड़ी दिखाई देती है, केवल खड़ी ही नहीं है बल्कि संघर्ष करती है। यह भी एक कारण है कि उपन्यास अपने समय को चित्रित करता है।

दो सवाल फिर भी उठते हैं। पहला, इसका शीर्षक वनतुलसी की गंध क्यों है? दूसरा सवाल, मुख्य किरदार का नाम सीता क्यों। संभवत: पहले सवाल का जवाब है, वनतुलसी प्रतीकात्मक है और वन की तुलसी को देखभाल की जरूरत नहीं होती। ना ही उसपर जल चढ़ाने की आवश्यकता होती है। वह घर आंगन की तुलसी नहीं है, उसका अस्तित्व फैलकर घर परिवार की सीमाओं को लांघ गया है, लांघ रहा है। नायिका का नाम सीता शायद इसलिए रखा, क्योंकि आज सीता का संघर्ष और अग्निपरीक्षा बदल गई है।


janwani address 3

spot_imgspot_img
[tds_leads title_text="Subscribe" input_placeholder="Email address" btn_horiz_align="content-horiz-center" pp_checkbox="yes" pp_msg="SSd2ZSUyMHJlYWQlMjBhbmQlMjBhY2NlcHQlMjB0aGUlMjAlM0NhJTIwaHJlZiUzRCUyMiUyMyUyMiUzRVByaXZhY3klMjBQb2xpY3klM0MlMkZhJTNFLg==" f_title_font_family="467" f_title_font_size="eyJhbGwiOiIyNCIsInBvcnRyYWl0IjoiMjAiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIyMiIsInBob25lIjoiMzAifQ==" f_title_font_line_height="1" f_title_font_weight="700" msg_composer="success" display="column" gap="10" input_padd="eyJhbGwiOiIxNXB4IDEwcHgiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMnB4IDhweCIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCA2cHgifQ==" input_border="1" btn_text="I want in" btn_icon_size="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxNyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTUifQ==" btn_icon_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjMifQ==" btn_radius="3" input_radius="3" f_msg_font_family="394" f_msg_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_msg_font_weight="500" f_msg_font_line_height="1.4" f_input_font_family="394" f_input_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_input_font_line_height="1.2" f_btn_font_family="394" f_input_font_weight="500" f_btn_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjExIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMCJ9" f_btn_font_line_height="1.2" f_btn_font_weight="700" f_pp_font_family="394" f_pp_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjEyIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMSJ9" f_pp_font_line_height="1.2" pp_check_color="#000000" pp_check_color_a="var(--metro-blue)" pp_check_color_a_h="var(--metro-blue-acc)" f_btn_font_transform="uppercase" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjYwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGUiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjUwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGVfbWF4X3dpZHRoIjoxMTQwLCJsYW5kc2NhcGVfbWluX3dpZHRoIjoxMDE5LCJwb3J0cmFpdCI6eyJtYXJnaW4tYm90dG9tIjoiNDAiLCJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBvcnRyYWl0X21heF93aWR0aCI6MTAxOCwicG9ydHJhaXRfbWluX3dpZHRoIjo3NjgsInBob25lIjp7ImRpc3BsYXkiOiIifSwicGhvbmVfbWF4X3dpZHRoIjo3Njd9" msg_succ_radius="2" btn_bg="var(--metro-blue)" btn_bg_h="var(--metro-blue-acc)" title_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjEyIiwibGFuZHNjYXBlIjoiMTQiLCJhbGwiOiIxOCJ9" msg_space="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIwIDAgMTJweCJ9" btn_padd="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCJ9" msg_padd="eyJwb3J0cmFpdCI6IjZweCAxMHB4In0=" f_pp_font_weight="500"]

Related articles

Gold-Silver: डॉलर की तेजी से सोना-चांदी की कीमतें गिरीं, 1% से अधिक की गिरावट

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: सोने और चांदी की कीमतों...

UP News: सपा मुख्यालय पर पोस्टर विवाद, भाजपा सरकार पर पीडीए आरक्षण घोटाले के आरोप

जनवाणी ब्यूरो | यूपी: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में...
spot_imgspot_img