Friday, March 6, 2026
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कर्मों का फल

Samvad 1


व्यासजी, महाराजा धृतराष्ट्र को उसके पूर्व जन्म की कथा सुनाते हैं। सौ जन्मों से पूर्व तू भारतवर्ष का एक बड़ा ही प्रतापी और धार्मिक राजा था। तब रामेश्वरम को जाते हुए मानसरोवर का एक हंस, जिसकी हंसिनी गर्भवती थी, वह तुम्हारे पास आया और तुमसे निवेदन किया कि मैं अपनी गर्भवती पत्नी को बाग में छोड़े जा रहा हं और वह हंस रामेश्वरम चला गया। इधर, उस हंसिनी ने सौ बच्चों को जन्म दिया। एक दिन तुम्हारे रसोइये ने एक हंस के बच्चे को पकाकर तुझे खिला दिया। तुम्हें वह बड़ा स्वादिष्ट लगा।

जीभ इन्द्रिय ने बल पकड़ा, तुम मोह में अंधे हो गए और रोज उसी मांस की इच्छा करने लगे और इस प्रकार उस हंसिनी के मोती चुगने वाले सौ-के-सौ बच्चों को तुम खा गए। अब वह हंसिनी अकेली रह गई। हंस रामेश्वरम यात्रा से वापस आया तो हंसिनी ने सारा किस्सा सुनाया। हंस ने राजा से कहा कि तुमने मेरे सौ बच्चों का मांस खा लिया? राजा ने रसोइये को बुलाकर पूछा।

उसने कहा कि महाराज! यह तो आपकी ही आज्ञा थी कि इसी को नित्य बनाया करो। तब हंस-हंसिनी ने कहा कि तूने अंधे होकर यह काम किया, तू अंधा हो जायगा और तेरे सामने ही तेरे सौ पुत्र मरेंगे। ऐसा कहकर उन्होंने प्राण त्याग दिये। व्यासजी बोले-हे राजन! कर्म करते वक्त, जरा सोचें कि इनका फल तो हर हाल में मिलना है। सतर्क रहें और हमेशा हर हाल में सबका भला सोचें और भला करें।
                                                                                                प्रस्तुति : राजेंद्र कुमार शर्मा


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