Wednesday, March 4, 2026
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भूकंप लाया तुर्की-भारत को करीब

Samvad 47


33 15गहन गंभीर और विशानकारी संकट वस्तुत: किस तरह से किसी मुल्क का मिजाज बदलकर रख देते हैं, इसका वर्तमान में इसतथ्य का ज्वलंत उदाहरण तुर्की राष्ट्र है, जोकि आजकल बेपनाह तबाही की भीषण त्रासदी से गुजर रहा है। अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरुद्ध पाकिस्तान के समर्थन में निरंतर प्रतिबद्ध तौर पर खड़ा होने वाला तुर्की आजकल भारत को अपना निकट दोस्त करार दे रहा है। 7.8 तीव्रता का अत्यंत विनाशकारी कहर लिए भूकंप के भीषणतम झटकों ने तुर्की के दक्षिण पूर्वी इलाकों को पूर्णत: तहस नहस कर डाला है। तकरीबन नौ करोड़ आबादी वाले राष्ट्र तुर्की को पश्चिम और पूरब के मध्य एक भौगौलिक औक सांस्कृतिक पुल करार दिया जाता है। रशिया की तरह से ही तुर्की भी एक यूरोप और एशिया में फैला हुआ यूरेशियन राष्ट्र है।

तुर्की के अभूतपूर्व संकट के इस दर्दनाक वक्त में भारत ने तुर्की की शत्रुतापूर्ण कूटनीति को पूर्णत: विस्मृत करके अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ तुर्की की मदद प्रारम्भ की है। यहां तक कि विनाशकारी भूकंप के पश्चात जब पाक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तुर्की की यात्रा करने का ऐलान किया तो तुर्की ने उनको अगवानी प्रदान करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि विनाशकारी संकट के इस विकट काल में भारत और तुर्की के कूटनीतिक संबंध एक नए संवेदनशील दौर में पहुंच गए हैं, जहां परस्पर संबंधों की वर्षों पुरानी कूटनीतिक कटुता यकीनन प्रखर मधुरता में परिवर्तित हो जाएगी। रुबेला वायरस का हवाला देकर भारत का गेहूं वापस लौटाने वाला तुर्की भीषण संकट के इन दुर्भाग्यपूर्ण लम्हों में भारत की भरपूर इमदाद हासिल कर रहा है।

वसुधैव कुटुंबकम की भावना से सदैव ओतप्रोत रहा, भारत वस्तुत: विश्वपटल पर कदापि किसी मुल्क को अपना स्थाई दुश्मन करार नहीं देता है। मुखतलिफ मुल्कों के मध्य उत्पन्न विवादों को सौहार्दपूर्ण तौर पर परस्पर बातचीत द्वारा निपटाने का भारत सदैव हिमायती रहा है। चीन और पाकिस्तान से साथ अपने विवादों को सुलझाने के लिए भारत द्वारा सदैव कूटनीतिक वार्ताएं प्रारम्भ करने की पहल अंजाम दी है।

आजादी प्राप्त करने के तत्पश्चात भारत और तुर्की के मध्य कूटनीतिक संबंधों का शानदार आगाज हुआ। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं।नेहरु वस्तुत: मुसलिम बाहुल्य वाले मुस्तफा कमाल पाशा के क्रांतिकारी राष्ट्र तुर्की की प्रगतिशालता और धर्मनिरपेक्षता के बहुत प्रशसंक थे। पं. नेहरू दिलो जान से चाहते थे कि तुर्की विश्वपटल पर गुटनिरपेक्षता प्रबल पक्षधर बने। किंतु तुर्की के लीडरों ने कोल्ड वॉर के दौर में अमेरिका की कयादत में नॉटो सैन्य संधि में शामिल करने का फैसला लिया। तुर्की ने कुछ वर्ष बाद में पाकिस्तान के साथ सैंटों सैन्य संधि का सदस्य बनने का भी निर्णय लिया।

इस कूटनीतिक पृष्ठभूमि में पाकिस्तान के साथ तुर्की की निकटता बढ़ती गई और भारत से दूरियाँ बनती चली गई। इंदिरा गांधी के शासन काल में वर्ष 1974 तुर्की ने जब साइप्रस के एक भाग पर सैन्य शक्ति द्वार आधिपत्य स्थापित किया। साइप्रस के तत्कालीन राष्ट्रपति आर्कबिशप मकारिओस, जोकि गुटनिरपेक्ष आंदोलन के महत्वपूर्ण लीडर भी थे, उनके पक्ष में और तुर्की की सैन्य आक्रमकता के विरुद्ध इंदिरा गांधी ने खड़े होने का निर्णय लिया। इस कारणवश भी भारत और तुर्की परस्पर विरोधी खेमों में खड़े हो गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन काल में वर्ष 2017-18 में राष्ट्रपति एर्दोगान ने भारत का दौरा इस उम्मीद पर अंजाम दिया था कि भारत थोरियम से परमाणु बिजली के उत्पादन की तकनीक तुर्की को उपलब्ध करा देगा, किंतु राष्ट्रपति एर्दोगान की यह उम्मीद कदापि पूरी नहीं हो सकी।

कश्मीर विवाद पर भारत के विरुद्ध पाकिस्तान का सदैव सैन्य समर्थन करने वाले तुर्की ने पाक को सदैव ही आर्थिक और सैन्य सहायता फराहम की है। तुर्की का धर्मनिरपेक्ष चरित्र वर्ष 2002 में इस्लाम का परचम लहराने वाले राष्ट्रपति एर्दोगान के सत्तानशीन होने के तत्पश्चात बुनियादी तौर पर परिवर्तित होने लगा। तुर्की के उस्मानी आॅटोमन साम्राज्य के गौरवशाली अतीत से प्रेरित और पोषित राष्ट्रपति एर्दोगान विगत दो दशक से वस्तुत: तुर्की को इस्लामिक दुनिया का लीडर बनाने पर आमादा रहे हैं। अत: इस्लामिक दुनिया के परम्परागत लीडर रहे सऊदी अरब से साथ तुर्की का वैमनस्य बाकायदा बरकरार बना हुआ है। वर्ष 2017 में राष्ट्रपति एर्दोगान की हुकूमत का सैन्य तख्ता पलट की नाकाम कोशिश अंजाम दी गई। इस सैन्य तख्तापलट के प्रयास के पीछे एक उदारवादी मुसलिम विद्वान दार्शनिक फैहतुल्ला गुलान नामक शख्सियत की प्रेरणा बताई गई। अमेरिका में निवास कर रहे फैहतुल्ला गुलान को लेकर तुर्की और अमेरिका के मध्य कूटनीतिक तनाव कायम बना रहा है।

इस सैन्य वारदात के तत्पश्चात राष्ट्रपति एर्दोगान द्वारा अपने राजनीतिक विरोधियों का जबरदस्त दमन आरम्भ कर दिया। नॉटो सैन्य संधि के चालीस देशों के विपरीत जाकर नॉटो संगठन के सदस्य राष्ट्र तुर्की ने यूक्रेन युद्ध के दौर में रुस के साथ अपने संबंध को प्रगाढ़ किया है और रुस के साथ तुर्की ने ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में अनेक संधियां अंजाम दी है। तुर्की द्वारा अमेरिका के विरुद्ध जाकर रुस से एंटी मिसाइल सिस्टम-एस 400 हासिल किया गया है। इस तरह से तुर्की ने यूरोपीय यूनियन से एकदम पृथक विदेशनीति का अनुसरण किया है।

भविष्य में तुर्की के साथ भारत के ताल्लुकात यकीनन सुधर सकते है, क्योंकि तबाही के भीषण संकट के दौर में भारत विगत काल की कूटनीतिक कटुताओं को पूरी तरह से भुलाकर तुर्की की इमदाद करने वालों में अग्रणी देश रहा है और अत्यंत भावुकता के साथ तुर्की ने इस तथ्य को स्वीकारा किया है। कश्मीर विवाद पर इस्लामिक देशों के संगठन द्वारा ओआईसी ने सऊदी अरब की कयादत में पाकिस्तान की हिमायत बंद कर देने के पश्चात पाक लीडरॉन को अंतरराष्ट्रीय तौर पर मुसलिम मुल्कों में अभी तक केवल तुर्की के राष्ट्रपति एदोर्गान का ही कूटनीतिक सहारा शेष बचा हुआ था।

ऐसा प्रतीत होता है कि भारत, तुर्की और रशिया के मध्य स्थापित होती जा रही प्रबल प्रगाढ़ता के कारण विश्वपटल पर पाकिस्तान अत्यंत अलग-थलग पड़ता जा रहा है। पाकिस्तान का अनेक दशक तक प्रबल हिमायती रहा अमेरिका पहले ही पाकिस्तान से अपना दामन छुड़ा चुका है। अब तो पाकिस्तान को केवल चीन का ही सहारा शेष रह गया है, जोकि पाकिस्तान की डूबती हुई नैया को बचा सकता है। यह तो आने वाला भविष्य ही तय कर पाएगा कि भारत और तुर्की के ताल्लुकात किस शिखर को स्पर्श कर सकेंगे किंतु यह तथ्य निश्चित है कि विगत कूटनीतिक कटुताओं को दोनों देश अवश्य ही तिलांजलि दे देंगे और दोस्ती की राह पर आगे चल निकलेंगे।


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