Wednesday, May 20, 2026
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अफवाह को सच बनाने का प्रयास

SAMVAD


40 5तमिलनाडु में बिहारी मजदूरों पर हमलों की खबर पूरी तरह से अफवाह थी। इस अफवाह को पूरे देश में फैलाने वाले मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता थे। एक ही नहीं, कई राज्यों के भाजपा नेता। इन नेताओं के साथ हिंदुत्ववादी मीडिया ने भी इसमें हाथ बंटाया। हमलों की अफवाह के साथ यह खबर भी कि हिंसा के भय से बिहारी मजदूर तमिलनाडु छोड़ भाग रहे है, प्राय: अफवाह साबित हुई। वे होली के मौके पर हर साल की तरह इस बार भी त्योहार मनाने अपने घर जा रहे थे। ‘ऑल्ट  न्यूज’ के मोहम्मद जुबैर का हम सबको शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने इस अफवाह का पर्दाफाश किया। इस तरह उन्होंने इस अफवाह के चलते संभावित हिंसा को रोका। हिंसा के अलावा तमिल और हिंदी प्रदेशों में एक दूसरे को लेकर आशंका और दूरी भी बढ़ने का खतरा था। मोहम्मद जुबैर की खबरदारी की वजह से यह अभी के लिए टला। यानी, तमिलनाडु के खिलाफ नफरत फैलाने का एक हथियार जुबैर ने भाजपा और हिंदुत्ववादियों के हाथ से छीन लिया।

उम्मीद थी कि अखबार और दूसरे जनसंचार माध्यम इसके बाद भाजपा नेताओं की इस गैर-जिम्मेदाराना  अफवाहबाजी के लिए उसकी आलोचना करेंगे। अपने पाठकों और दर्शकों को उनसे सावधान रहने के लिए कहेंगे। लेकिन यह नहीं किया गया। इसकी जगह एक आम संतुलनवादी मशविरा दिया गया कि तमिलनाडु में दूसरे राज्यों के मजदूरों की सुरक्षा के लिए सबको साथ मिलकर काम करना चाहिए। उनके भय को दूर करने का काम सबका है। एक पत्रकार ने पूछा कि आखिर इस संकट से तमिलनाडु की सरकार कैसे पार पाएगी।

इससे किसको ऐतराज हो सकता है कि भारत के किसी भी हिस्से में दूसरे हिस्से के लोगों को इत्मीनान देने का दायित्व सबका है? लेकिन अभी मसला वह नहीं था। अभी बिहारियों के खिलाफ हिंसा की अफवाह को फैलाकर संदेह, दुराव और घृणा पैदा करने का काम भाजपा के लोगों ने किया। इन अफवाहों के चलते वाकई भय फैला। बिहार सरकार पर आरोप लगाया गया कि उसके नेता तमिलनाडु के मुख्यमंत्री से यारी निभा रहे हैं जबकि बिहारियों की तमिलनाडु में हत्या की जा रही है। यह सरासर झूठ था। लेकिन ढिठाई से भाजपा के लोग यह बोलते रहे। क्या यह राष्ट्र विरोधी कार्य नहीं? अफवाह का भंडाफोड़ हो जाने के बाद भी एक बड़े हिस्से में जो संदेह पैदा हुआ है, वह आसानी से नहीं जाएगा। अनेक लोग अभी भी मिल जाएंगे जो इसे अफवाह मानने से इनकार कर देंगे। उनका तर्क होगा कि अगर धुआं है तो कहीं तो आग होगी! कुछ तो इस खबर में सच होगा! वे तमिलनाडु के नेताओं के पुराने वीडियो दिखा रहे हैं जिनमें वे हिन्दीभाषियों का उपहास उड़ाते दिखते हैं। उसकी आलोचना तो की ही जानी चाहिए लेकिन अभी की अफवाहबाजी का उससे क्या रिश्ता?

कई लोग कहते मिल जाएंगे कि अगर मोहम्मद जुबैर ने तथ्य बतलाया है तो जरूर कुछ सच होगा। ऐसे लोग होंगे जो इस अफवाह को इसलिए मानना चाहेंगे कि इससे उनका तमिल विरोधी पूर्वाग्रह पुष्ट होता है। इसलिए इस अफवाह का जीवन इतना संक्षिप्त भी न होगा। भाजपा के लोगों द्वारा किया गया नुकसान इसीलिए बहुत गहरा है। वह इस देश के ही दो हिस्सों में विभाजन करने की साजिÞश है। सिर्फ़ बिहार नहीं, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि हिंदी भाषी राज्यों के लोगों में भी तमिलनाडु को लेकर एक आशंका तो बैठ ही जाएगी। भाजपा के इस कृत्य को सबसे घृणित अपराधों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। इस तरह के कृत्य के बाद कायदे से भाजपा के लोगों को ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ कहा जाना चाहिए। भारत के लोगों में आपस में ही संदेह, घृणा पैदा करने की यह कोई भाजपा की पहली हरकत नहीं है। कुछ रोज पहले हमने देश के गृह मंत्री को कर्नाटक में बोलते हुए सुना। वे कह रहे थे कि कर्नाटक के करीब केरल है जिससे कर्नाटक के लोगों को सावधान रहने की जरूरत है।

केरल के प्रति भारत के हिंदी भाषी प्रदेशों में घृणा भरने की यह कोशिश ही घृणित है। लेकिन ऐसा करने वाले वे अकेले भाजपा नेता नहीं। उत्तर प्रदेश के चुनाव के दौरान भाजपा नेताओं ने कहा कि उत्तर प्रदेश को केरल, बंगाल और तमिलनाडु होने से बचाना है। इसलिए भाजपा को लाना बहुत जरूरी है। केरल के प्रति जो घृणा अमित शाह अपने भाषण से फैला रहे थे वह इस कदर लोगों में भरी गई है कि जब वह राज्य बाढ़ की तबाही से जूझ रहा था तब हिंदुत्ववादी उसे किसी तरह की मदद देने से लोगों को मना कर रहे थे। कहा जा रहा था कि उन्हें मरने दो, ईश्वर ने गोमांस खाने का दंड केरल वालों को दिया है।

केरल के लोगों, खासकर मुसलमानों को दहशतगर्द के रूप में पेश किया गया है। उसके पहले जम्मू कश्मीर के प्रति भी नफरत भरी गई। कश्मीरी लोगों पर भारत के हिंदी भाषी राज्यों में हमलों की खबर अक्सर सुनी जाती है। तमिलनाडु या केरल को लेकर नफरत क्यों उत्तर प्रदेश आदि में भरी जाती है? यह दिखाने के लिए कि इन प्रदेशों में पर्याप्त भारतीयता नहीं है। वे हिंदी को स्वीकार नहीं करते, इस बात को लेकर भी उनके खिलाफ हिंदीभाषियों में घृणा भरी जाती है। यह हिंदीभाषियों का कर्तव्य है कि वे तमिलनाडु आदि में भारतीयता भरने के लिए वे भाजपा को सत्ता में बनाए रखें। हिंदीवाले यह भी मानते हैं कि तमिलनाडु का हिंदी को कबूल न करना भारत विरोधी है। इस ‘भारत विरोध’ को समाप्त करना ही राष्ट्रवाद है इसलिए भाजपा का शासन आवश्यक है, यह हिंदीवालों को समझाया जाता है।
इन प्रदेशों के प्रति भाजपा के दुराव और घृणा का प्रचार भाजपा की व्यापक घृणा की राजनीति का हिस्सा है।

हिंदुत्ववादी राजनीति का आधार है घृणा और वह भी प्रमुख रूप से मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ घृणा। लेकिन घृणा को अपनी जनता का स्वभाव बनाने के लिए घृणा के नए-नए पात्रों की तलाश, उन्हें गढ़ना जरूरी हो जाता है। इस घृणा को स्थायी बनाने के लिए झूठ गढ़ने पड़ते हैं जिनसे उसे उचित ठहराया जा सके। इसीलिए यह नया झूठ गढ़ा गया। इस झूठ से द्वेष तो फैला ही, हिंसा भी भड़क सकती थी। देर से सही, तमिलनाडु पुलिस ने भाजपा नेताओं पर मुकदमे दर्ज किए हैं। आप देखिएगा, तुरत ही यह उपदेश दिया जाएगा कि तमिलनाडु पुलिस को बदले की कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। भाजपा के घृणा और मिथ्या प्रचार को उसका राजनीतिक अधिकार मान लिया गया है। जब तक हम इस मनोवृत्ति को नहीं समझेंगे, बार-बार भाजपा अपनी घृणा का आक्रमण हम पर करती रहेगी। जरूरत यह है कि हम इस घृणा की राजनीति के खिलाफ बिना अगर मगर के खुलकर बोलें।


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