Friday, May 1, 2026
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बड़ा मुश्किल था एक साल की बच्ची को छोड़कर नौकरी पर जाना: सुनीता आर्य

  • एक कहानी शिक्षिका सुनीता आर्य की जुबानी

जनवाणी ब्यूरो |

शामली: उच्च प्राथमिक विद्यालय गागोर (सिविलियन) विकास क्षेत्र ऊन में सहायक अध्यापिका सुनीता आर्य की सफलता की कहानी खूब है। सुनीता आर्य बताती है कि एक महिला होकर सफलता की सीढ़ियां चढ़ना बड़ा मुश्किल लगता है पर कहते हैं, कि मंजिल उन्हें मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता हौसलों में उड़ान होती हैं।

सुनीता कहती है कि एक लड़की को अगर स्वावलंबी बनना है तो सामाजिक सुरक्षा आवश्यक हो जाती है। पुरुषों की तुलना में उसे अधिक संघर्ष से गुजरना पड़ता है। मैं एलएलबी की पढ़ाई कर रही थी और साथ में पीसीएसजे की तैयारी भी। पर एलएलबी कंप्लीट होते ही मेरा विवाह हो गया जिसके पश्चात मुझे फैमिली को समय देने के साथ-साथ अपना सपना भी पूरा करना था जो कि मुझे बड़ा कठिन लगता था।

पापा की कही बातें जो मेरे कानों में गूंजती थी वह कहते थे कि जो हार मान ले वह इंसान नहीं और मेहनत असंभव को भी संभव बना देती है। मेरा पीसीएसजे में तो सिलेक्शन नहीं हुआ पर पति की एक सलाह ने मेरी जिंदगी बदल दी और मैंने एक अध्यापक बनने की राह चुनी। मैंने बीएड किया और कड़ी मेहनत के पश्चात एक शिक्षिका के रूप में मुझे मेरी पहली पोस्टिंग बेसिक शिक्षा विभाग में मिली।

अपनों से दूर अपनी छोटी बच्चियों से दूर, जिसमें छोटी बेटी जो मात्र एक वर्ष की थी। अपनी बच्ची की मार्मिक भावनाओं को त्यागते हुए मैंने शिक्षिका का पद ग्रहण किया। मेरी पढ़ाई का माध्यम हिंदी था और किसी ने मुझे चुनौती दी थी की यूपी बोर्ड से पढ़े स्टूडेंट की इंग्लिश पर कमांड नहीं होती पर मैंने वह कार्य संभव कर दिखाया और ब्रिटिश काउंसिल से मुझे स्टेट रिसोर्स पर्सन फॉर इंग्लिश सब्जेक्ट के लिए चयनित किया गया।

इंग्लिश मास्टर ट्रेनर का पद अपनी मेहनत से हासिल किया। इसके पश्चात मेरा ट्रांसफर जिला शामली में हुआ जहां मुझे फिर से नई शुरूआत करनी थी जिसे मैंने बखूबी पूरा किया। इस कार्य के लिए शामली को धन्यवाद उन सभी अनुभवी अधिकारी एवं मेरे आदर्श स्वरूप बीएसए मैडम जिनके सानिध्य व दिशा निदेर्शों के फलस्वरूप मुझे शामली में अपने आप को अपने कार्य और दायित्व का निर्वाह करने के लिए मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

अपनी दोनों बेटी की पढ़ाई और परिवार के साथ-साथ मुझे एक अच्छी अध्यापिका के रूप में खुद को साबित भी तो करना है, और उन बच्चों का भविष्य भी तो बनाना है जिनके लिए शिक्षा प्राप्त करना बड़ा कठिनाइयों से भरा होता है। जो बच्चे मुझ पर विश्वास करते हैं अच्छा लगता है मुझे उन बच्चों के लिए मेहनत करना जे मुझे गुरु कहते हैं।

कहते हैं शादी बच्चे परिवार के साथ-साथ पढ़ाई जारी नहीं हो सकती पर मैंने शादी के बाद एमए इंग्लिश, एजुकेशन और बीएड भी पूरा किया। और शाम को घर आकर उन महिलाओं की मदद करती हूं जिन्हें मेरी कानूनी सलाह की जरूरत है। खुश हूं मैं एक शिक्षिका के रूप में कार्य करके।

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