Wednesday, March 18, 2026
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अच्छे दिन की आस में आम आदमी

Samvad


Rajesh Maheshwariमहंगाई से आम आदमी परेशान है। बढ़ती महंगाई के कारण मध्यम वर्ग के व्यक्ति को अपने आप को एक स्थान पर बनाए रखने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ रहा है। देशभर में नवरात्रि के चलते फलों और सब्जियो के दाम आसमान छू रहे हैं। पिछले एक सप्ताह से फलों से लेकर सब्जियों के दामों में 20 से लेकर 30 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। चिंता की बात यह है कि महंगाई के प्रकोप के लंबे समय से चले आ रहे हालातों में सुधार होने की जगह परिस्थितियां दिन-प्रतिदिन विकट होती जा रही हैं। कोरोना काल के बाद देश में आर्थिक मंदी व सभी क्षेत्रों में बढ़ती महंगाई ने आम जनता के सामने ह्यवह जीवनयापन कैसे करेंह्णकी एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने पिछले दिनों दावा किया था कि महंगाई का दौर बहुत पीछे छूट गया है। हम महंगाई के प्रभावों से अब देश की अर्थव्यवस्था उबर रही है।

गर्वनर ने यह दावा तब किया, जब आकलन किए जा रहे हैं कि वित्त-वर्ष 2023-24 के दौरान खुदरा महंगाई दर 6.8 फीसदी, थोक की दर 11.5 फीसदी और फूड की महंगाई दर 7 फीसदी से अधिक होने के अनुमान हैं। संभावित महंगाई की दर उस लक्ष्मण-रेखा के पार लगती है, जो भारत सरकार और रिजर्व बैंक ने तय कर रखी है। यह लक्ष्मण-रेखा 6 फीसदी की है। अर्थात महंगाई की दर इससे ज्यादा नहीं होनी चाहिए, लेकिन रिकॉर्ड स्पष्ट बयां कर रहे हैं कि बीते 15 माह के दौरान महंगाई ने कमोबेश 10 बार से ज्याद लक्ष्मण-रेखा को लांघा है।

मोटे तौर पर बात करें तो बाजार में महंगाई का घटना और बढ़ना वस्तुओं की मांग एवं आपूर्ति पर निर्भर करता है। वस्तुओं की मांग व्यक्ति की खरीदने की क्षमता पर निर्भर करता है। अगर व्यक्ति के पास पैसे ज्यादा होंगे तो वह ज्यादा चीजें खरीदेगा, ज्यादा चीजें खरीदेगा तो वस्तुओं की मांग बढ़ेगी और उत्पाद की आपूर्ति कम होने के कारण उसकी कीमत बढ़ जाएगी। और इस तरह से बाजार महंगाई की चपेट में आ जाता है।

मौजूदा दौर में बाजार आंशिक तौर पर मांग और आपूर्ति के संतुलन को स्थापित नहीं कर पा रहा है जिससे महंगाई बढ़ रही है। लेकिन महंगाई के बेकाबू होने की सबसे बड़ी वजह पेट्रोल, डीजल और एलपीजी, सीएनजी, पीएनजी की कीमतों में भारी वृद्धि है. और इसके पीछे रूस-यूक्रेन युद्ध बड़ी वजह है। हालांकि, सरकार अपने स्तर पर महंगाई दर को रोकने का प्रयास कर रही है, लेकिन वो प्रयास जमीन पर असरदार साबित होते दिखते नहीं हैं।

फरवरी, 2023 में भी खाद्य महंगाई दर करीब 5.95 फीसदी थी और खुदरा दर 6.44 फीसदी रही। शायद आम आदमी इन प्रतिशतों को नहीं जानता होगा, लिहाजा मोटे तौर पर स्पष्ट कर दें कि महंगाई अब भी मौजूद है। बल्कि तय लक्ष्मण-रेखा के बाहर ही है, लिहाजा ह्यचरमह्ण पर है। बेशक केंद्रीय मंत्री और सत्ता-पक्ष के प्रवक्ता अब भी कोरोना महामारी के दुष्प्रभावों और रूस-यूक्रेन युद्ध की आड़ में छिप कर दलीलें देते रहे हैं, लेकिन ‘महंगाई भरे दिन बीते न भैया’ की तर्ज पर एक पुराना गीत लोगों के लबों पर है।

एशिया-प्रशांत के लिए त्रैमासिक आर्थिक जानकारी को अद्यतन करते हुए एसएंडपी ने कहा कि मुद्रास्फीति दर चालू वित्त की 6.8 प्रतिशत से नरम होकर 2023-24 में पांच प्रतिशत पर होगी। वहीं, भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) चालू वित्त वर्ष (2022-23) में सात प्रतिशत की दर से बढ़ेगा लेकिन 2023-24 में यह कम होकर छह प्रतिशत पर आ जाएगा। इसमें कहा गया, ‘2024-2026 में भारत की औसत वृद्धि दर सात प्रतिशत होगी।’ इसके बाद, 2024-25 और 2025-26 में जीडीपी के 6.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है, 2026-27 के लिए यह 7.1 प्रतिशत होगी।

रेटिंग एजेंसी ने कहा, ‘भारत में अर्थव्यवस्था को परंपरागत रूप से घरेलू मांग प्रभावित करती रही है।’ हालांकि बाद में यह वैश्विक चक्र के प्रति अधिक संवदेनशील हो गई, जिसकी एक वजह जिसों के निर्यात में वृद्धि है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जीवन जीने के लिए बेहद जरूरी दैनिक उपभोग की वस्तुओं व पेट भरने वाली रसोई के बढ़ते बजट ने आम व खास सभी वर्ग के लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, प्रत्येक व्यक्ति का घरेलू खर्चे का बजट पूरी तरह से गड़बड़ा गया है, लोग भविष्य में स्थित को नियंत्रित करने के लिए अब अपनी आय के स्रोत बढ़ाने के लिए चिंतित नजर आने लगे हैं, लेकिन उनको सरकार के सहयोग के बिना इस गंभीर समस्या का कोई समाधान नजर नहीं आ रहा है।

प्रतिदिन के कुछ उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा कि महंगाई कितने छद्म तरीके से हमें प्रभावित कर रही है। बिस्कुट का 5 रुपए वाले पैकेट का वजन 80 ग्राम होता था, जिसे घटाकर 52 ग्राम कर दिया गया है। चाय की पत्ती का जो 250 ग्राम वाला पैकेट 60 रुपए में मिलता था, उसे घटा कर 200 ग्राम कर दिया गया है।

नमकीन का 10 रुपए वाला पैकेट 60 ग्राम से घटा कर 42 ग्राम कर दिया गया है। बेशक ये छोटे-छोटे खर्च हैं, जो आम आदमी को उतने नहीं चुभते होंगे, लेकिन आटा, चावल, दाल, चीनी, सरसों का तेल, मसाला, मांस-मछली, अंडा, दुग्ध उत्पाद, अनाज और सबसे अधिक रसोई गैस का सिलेंडर आदि लगातार महंगे होते रहे हैं, नतीजतन औसत घर का बजट भी डांवाडोल हुआ होगा!

राजधानी दिल्ली में गैस का सिलेंडर 1103 रुपए का बिक रहा है। यह स्थिति तब है, जब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाजार में दाम 72 डॉलर प्रति बैरल है। यह कीमत 116 डॉलर प्रति बैरल से लुढ़क कर आई है, लेकिन आम आदमी के लिए पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम यथावत हैं। बीते 10 माह से दाम न तो बढ़े और न ही कम किए गए हैं।

सवाल है कि जब कच्चा तेल लगातार सस्ता हो रहा है, तो उसका फायदा आम उपभोक्ता को क्यों नहीं दिया जा रहा है? विकास के साथ महंगाई का पुराना रिश्ता है, जहां तरक्की होगी वहां महंगाई होनी स्वाभाविक है, लेकिन सरकार का दायित्व है कि दैनिक प्रयोग में आने वाली वस्तुओं पर बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगाए। जिससे कि गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार अपना जीवन यापन ठीक प्रकार से कर सकें। आमजन को सुविधा हो।

विशेषज्ञ आशंकाएं जताने लगे हैं कि महंगाई ही नहीं, शीघ्र ही मंदी की मार भी हमें झेलने को तैयार रहना चाहिए! क्या सरकार यह सब कुछ देख-सुन रही है? गरीब वर्ग को सस्ते दाम पर सरकारी राशन दिया जा रहा है। खराब मौसम व अन्य विभिन्न प्रकार के कारकों के चलते फल-सब्जियों के दाम आसमान को छू रहे हैं, अपना घरेलू बजट ठीक रखने के चक्कर में फल, दाल व सब्जियां लोगों की थाली से तेजी से गायब होती जा रही हैं।

महंगाई के चलते अब गरीब तबके की तो बात ही छोड़ दो, एक आम ठीक-ठाक मध्यमवर्गीय परिवार के सामने भी अपने घर को चलाना बेहद कठिन कार्य होता जा रहा है। अब देश में वह समय आ गया है जब ‘अच्छे दिन आने वालें हैं’ का सपना देख रही आम जनता महंगाई से बेहद त्रस्त है।


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