Saturday, May 23, 2026
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यूसीसी भाजपा का आखिरी एजेंडा

Samvad 52


ashok bhatiyaप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ ही मध्य प्रदेश सहित 5 राज्यों में 5 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा का एजेंडा सेट कर दिया है। पीएम मोदी ने भोपाल से देश में भाजपा के 10 लाख बूथ प्रभारियों को संबोधित करने के साथ-साथ संवाद भी किया। संवाद के दौरान देश के विभिन्न राज्यों के कार्यकर्ताओं ने सवाल किए, जिसके जवाब में उन्होंने यह संदेश दिया कि पार्टी चुनाव में गांव-गरीब और किसान पर फोकस करेगी। मोदी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भाजपा तुष्टिकरण का जवाब संतुष्टिकरण से देने की तैयारी से चुनावी मैदान में उतरेगी। दरअसल समान नागरिक संहिता भाजपा का आखिरी प्रमुख अधूरा एजेंडा है , जिसका मतदाताओं से दशकों से वादा किया गया था।

चूंकि भारत का संविधान देश के सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, अपनी मान्यताओं, प्रथाओं, परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और विरासत को मानने और संरक्षित करने का अधिकार देता है, इसलिए अलग-अलग समुदाय के लोगों के लिए कई सारे व्यक्तिगत कानूनी यानी पर्सनल लॉ की व्यवस्था की गई है।

जैसे-हिंदुओं के लिए 4 अलग-अलग कानून हैं। हिंदू मैरिज एक्ट 1955, हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956, हिंदू हिंदू एडोपशन एक्ट और हिंदू माइनोरिटी एंड गार्जियनशिप, 1956। ये चारों कानून हिंदू समुदाय के साथ-साथ बुद्ध, जैन, सिख पर भी लागू होते हैं।

इसी तरह मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ शरीयत एक्ट 1937 है, जिसे बोलचाल में मुस्लिम पर्सनल लॉ कहते हैं। क्रिश्चियन समुदाय के लिए इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872, इंडियन डिवॉर्स एक्ट आदि है।आदिवासी समुदाय के लिए भी अलग-अलग कानूनों की व्यवस्था है।

जैसे- आर्टिकल 371ए कहता है, नागा समुदाय के लोगों की धार्मिक, सामाजिक प्रथाओं, परंपराओं, कानून और प्रक्रिया से जुड़े मामलों में संसद का कोई अधिनियम राज्य पर लागू नहीं होगा। इसी तरह से मेघालय का खासी समुदाय को संविधान की छठी अनुसूची में विशेष अधिकार मिले हुए हैं। खासी एक मातृसत्तात्मक समुदाय है।

यहां परिवार की सबसे छोटी बेटी को पारिवारिक संपत्ति का संरक्षक माना जाता है। और बच्चों को उनकी मां का उपनाम दिया जाता है। यदि हम केवल यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात करें तो यूनिफॉर्म सिविल कोड तीन शब्दों से मिलकर बना है यूनिफॉर्म, सिविल और कोड। कोड का मतलब होता है ढेर सारे कानूनों का एक समूह।

जैसे अपराध से जुड़े सारे कानूनों को इंडियन पीनल कोड यानी भारतीय दंड संहिता में इकट्ठा किया गया है जिसे हम आईपीसी कहते हैं। यूनिफॉर्म का मतलब एकरूपता, एक समान, एक तरह से। सबसे जरूरी चीज है सिविल। अगर आपने कभी भी अदालती प्रक्रिया या कानूनी मसलों पर गौर किया होगा तो पाया होगा कि इनमें दो शब्दों का खूब जिक्र आता है, सिविल और क्रिमिनल।

क्रिमिनल, अपराधिक मामले होते हैं जैसे-हत्या, बलात्कार, चोट पहुंचाना आदि। माना जाता है कि ये अपराध किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि समाज के खिलाफ है जबकि सिविल मामले ऐसे होते हैं जो दो पार्टियों के बीच के अधिकारों को लेकर होते हैं जैसे- पारिवारिक मामले, मालिकाना हक के मामले, प्रॉपर्टी बंटवारा, कॉन्ट्रैक्ट, लापरवाही आदि के मामले।

ये सब सिविल मामले होते हैं। तो इस तरह से यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब हुआ पूरे देश में रहने वाले सभी लोगों के लिए एक समान कानून फिर वो चाहे किसी भी धर्म, जाति, समुदाय के हों, कोई भी भाषा बोलते हों, किसी भी क्षेत्र में रहते हों। सबके लिए एक तरह का कानून।

भारत के संविधान का आर्टिकल 44 भी कहता है, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।
यानी अभी सिविल (खासतौर पर फैमिली मैटर्स) के लिए जो अलग-अलग समुदाय के लिए अलग-अलग कानून है, उसकी जगह एक कानून बना दिया जाए।

देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, अलगाव (सेप्रेशन), उत्तराधिकार, गोद लेने का अधिकार, संपत्ति का अधिकार आदि पर एक व्यापक कानून हो। जो पूरे देश के लोगों पर लागू हो। चाहे वो किसी भी धर्म जाति क्षेत्र के हों।आगे बढ़ने से पहले ये समझना जरूरी है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड किस तरह का हो सकता है?

क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड में शादी, विरासत, अडोप्शन इस सबके के लिए एक ही कानून होगा या फिर हर चीज के लिए एक अलग कानून होगा मसलन शादी के लिए पूरे मुल्क का एक कानून, विरासत का एक।अब यहां एक सवाल ये भी है कि जब संविधान में समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कही गई तो फिर इसे उसी समय क्यों लागू नहीं कर दिया गया?

बीच-बीच में इस पर बहस जरूर तेज हुई, खासतौर पर तब, जब फैमिली मैटर्स से जुड़े मसलों पर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट का कोई फैसला आया। एक नजर ऐसे चर्चित मसलों पर डाल लेते हैं। सभी के लिए एक कानून होगा तो एक नेशनल आइडेंटिटी एस्टैब्लिश होगी।

जाति-धर्म-क्षेत्र के आधार पर बंटा समाज एकजुट होगा। अलग-अलग कानून की जगह एक कानून होने से चीजें स्पष्ट और सरल होंगी।एक तर्क ये भी दिया जाता है कि सुधार के नाम पर केवल हिंदू कानूनों और परंपराओं में बदलाव हुए। मुस्लिम समुदाय की ऐसी परंपराएं या प्रथाएं जो महिलाओं के साथ भेदभाव करती हैं, उनमें बदलाव नहीं किया गया। अगर वास्तव में समानता स्थापित करनी है तो सबके लिए एक कानून की जरूरत है।

वहीं दूसरी तरफ समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले इसे लेकर कुछ खतरों की आशंका जताते हैं। कहा जाता है कि समान नागरिक संहिता भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को खत्म कर देगा। यह संविधान से मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को खत्म कर देगा।

जो यूनिफॉर्म कानून होंगे-उनका क्या प्रारूप होगा? क्या समान नागरिक संहिता पर बहुसंख्यकवाद हावी नहीं होगा? सामाजिक सुधारों की आड़ में बहुसंख्यकों के कानून, समान नागरिक संहिता के रूप में लागू हो जाएंगे तो अल्पसंख्यकों को भी वही मानना पड़ेगा। ऐसे भी कानून जो उनके धार्मिक परंपराओं के खिलाफ हो।

हिंदू समाज में ही अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं हैं। विवाह से लेकर संपत्ति तक। जैसे दक्षिण में रिश्तेदारों में विवाह होता है। लेकिन उत्तर में नहीं होता। आदिवासी समुदाय की अपनी अलग मान्यताएं हैं। वे आशंका जताते हैं कि अगर सबके लिए एक ही कानून आया तो उनकी कल्चरल आइडेंटिटी खत्म हो जाएगी।

अब जब बात निकली है तो दूर तक जाएगी। इसके पहले भी मोदी सरकार ने जो बड़े फैसले लिए है बिना नफे नुकसान के लिए है और लगता है कि समान नागरिक संहिता का कानून भी इसी तरह पास होगा।


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