Thursday, April 2, 2026
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हाईकोर्ट पहुंचे मलियाना कांड के पीड़ित

  • लोअर कोर्ट ने 31 मार्च 2023 को 39 आरोपियों को बरी कर दिया था
  • अब हाईकोर्ट ने मंगाए रिकॉर्ड, 14 अगस्त को होगी अगली सुनवाई

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: सन् 1987 में उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में हुए दंगों के दौरान दो बड़े नरसंहार हुए थे। इनमें पहला नरसंहार हाशिमपुरा मोहल्ले के करीब 50 लोगों को पुलिस और पीएसी द्वारा गोली मारकर नहरों में बहा दिया गया था और दूसरा अगले दिन मेरठ के नजदीक मलियाना में हुआ था, जहां पुलिस और पीएसी की मदद से भड़की हिंसा में 72 लोग मारे गए थे।

करीब 36 बरस तक चले मुकदमे के बाद मेरठ की सेशन अदालत ने इस वर्ष 31 मार्च को सबूतों के भाव में इस मामले के 39 आरोपियों को बरी कर दिया था। निचली अदालत के इस फैसले को अब मलियाना दंगों के पीड़ितों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

मलियाना नरसंहार के तीन पीड़ितों वकील अहमद, याकूब अली और इस्माइल खान ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका, हाईकोर्ट में दायर की थी, जिस पर 11 जुलाई को अदालत में सुनवाई हुई। अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए इस केस की फाइल और तमाम जरूरी कागजात निचली अदालत से समन जरिये तलब किये हैं। साथ ही साथ ही केस की अगली सुनवाई के लिए 14 अगस्त की तारीख तय कर दी।

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इस मुकदमे की पैरवी कर रहे वरिष्ठ पत्रकार कुरबान अली का कहना है कि सेशन कोर्ट के जज लखविंदर सिंह सूद की ओर से दिए फैसले को चुनौती देने वाली हमारी याचिका को हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। हाईकोर्ट में वकील दानिश अली इस केस में पैरवी करेंगे। मलियाना नरसंहार केस में मेरठ सेशन कोर्ट में 93 आरोपियों के खिलाफ 36 साल तक केस चला। 900 सुनवाई हुई।

सेशन कोर्ट के जज लखविंदर सूद ने इस लंबे चले केस में 31 मार्च को फैसला सुनाया। सभी 39 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। मेरठ कोर्ट के फैसले पर अतिरिक्त जिला काउंसिल सचिन मोहन कहते हैं कि इस मामले में आरोपियों को बरी किए जाने के कई कारण रहे। पहला, पुलिस ने आरोपियों की पहचान के लिए पीड़ितों के सामने परेड नहीं कराई। दूसरा, पुलिस ने वोटर लिस्ट से 93 नामों को केस में आरोपी बना दिया। इसमें से तो कई पहले से मरे हुए थे।

घटनास्थल से कोई हथियार बरामद नहीं किया जाना भी बड़ा कारण रहा। सचिन मोहन कहते हैं कि पीड़ित पक्ष की ओर से 10 गवाह पेश किए गए। लेकिन, पीड़ित पक्ष आरोपियों के खिलाफ दोष साबित करने में सफल नहीं हो सका। उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले। हालांकि, पीड़ित पक्ष का दावा है कि निचली अदालत में उनके पक्ष को सही तरीके से नहीं सुना गया। अब हाईकोर्ट की सुनवाई पर हर किसी की नजर होगी।

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