आनंद कुमार अनंत |
मिस के पिरामिडों में ‘तूतन खामन का मकबरा‘ एक कुख्यात अभिशप्त स्थान है। इस मकबरे में जुड़ी एक सूचक पट्टिका पर अंकित इबादत आज के सैंकड़ों वैज्ञानिकों के अनुसंधान का विषय बनी हुई है। इस मकबरे में प्रवेश करने वाले कितने ही लोग अब तक अपने जीवन से हाथ धो चुके हैं।
17 फरवरी 1923 को लार्ड कैनीखान और उनके साथी हावर्ड कार्टर ने जानकारी प्राप्त करने के लिए राजा तूतन के मकबरे में प्रवेश किया था पर वह पिरामिड रूपी उस मकबरे से जिंदा वापिस लौटकर नहीं आ पाये थे। तब से आज तक 35 से अधिक संख्या में प्रमुख वैज्ञानिक और पुरातत्ववेत्ताओं ने अपने अन्य विशेषज्ञ मित्रों के साथ इस मकबरे में दर्दनाक मौत का आलिंगन किया है।
मिस्र के पिरामिड विज्ञान के इस युग में भी आम जनता के लिए ही नहीं बल्कि वैज्ञानिकों, अनुसंधानकर्ताओं और खोजी पत्राकारों के लिए भी रहस्यमय बने हुए हैं। मिस्र के इन पिरामिडों को लेकर जन सामान्य में तो अनेक प्रकार की मान्यताएं और भ्रान्तियां प्रचलित हैं।
एक आम धारणा तो उनमें यह भी फैली हुई है कि प्राचीन मिस्र के निवासियों ने अपने प्रियजनों के मृत शरीर को चिरकाल तक सुरक्षित रखने के लिए अपने तत्कालीन ज्ञान-विज्ञान और अनुसंधान के आधार पर इन विशेष रचनाओं (पिरामिडों) का निर्माण करवाया था। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि प्रियजनों के मृत शरीरों को सुरक्षित रखने के पीछे उनकी यह धारणा थी कि प्रलय की अवधि के बाद एक दिन उनके प्रियजन जी उठेंगे परन्तु अधिकांश लोग इस तर्क से बिल्कुल सहमत नहीं हैं।
आज भी यह मूल प्रश्न अबूझ पहेली ही बनी हुई है कि सैंकड़ों मील के क्षेत्रा में फैले इन विशाल पिरामिड भवनों को बनाने की उनको क्यों जरूरत पड़ी? इस संबंध में इतिहासकार भी पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। शताब्दियों पूर्व जब इन पिरामिडों के लिए भवनों का निर्माण किया गया था, उनकी उपयोगिता चाहे कुछ भी रही हो पर अब तो ये भवन भुतहा जगह मात्रा बनकर ही रह गये हैं।
इन भवनों के विषय में उठे कौतुहल को शान्त करने के लिए उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ से ही सैकड़ों वैज्ञानिक, अनुसंधान शास्त्राी, पुरातत्व विज्ञ, और खोजी पत्राकार जुटे हुए हैं। इससे इन पिरामिडों के विषय में एक और रहस्यमय परिचर्चा चल पड़ी है कि इन पिरामिडों में मृतात्माओं का वास है और जो भी जिज्ञासु व्यक्ति इन पिरामिड भवनों में ठहरने, उनकी जानकारी प्राप्त करने या उनके रहस्य को सुलझाने का प्रयास करता है, ये अतृप्त आत्माएं उन सभी लोगों का विनाश कर डालती हैं।
ऐसा भी कहा जाता है कि सैंकड़ों लोगों, जिनमें कितने ही वैज्ञानिक, खोजी पत्राकार और इतिहास सम्मिलित हैं, उन्होंने स्वयं अपनी आंखों से इन भवनों में भूत-प्रेतों को विचरण करते देखा है। एक विश्वविख्यात खोजी पत्राकार फिलिप बैडन वर्ग ने ‘द कर्स ऑफ फराओज‘ नामक अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ऐसी अनेक घटनाओं का वर्णन किया है जो आधुनिक वैज्ञानिकों की सोच से बहुत दूर या फिर कल्पनालोक की बात लगती हैं। मि. फिलिप ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा इन पिरामिड भवनों के बीच, मुख्यतः फराओ के मकबरे और ममियों (विशेष तकनीक से सुरक्षित रखे शव) के मध्य उनके अध्ययन में व्यतीत किया था।
वर्ष 1962 में काहिरा विश्वविद्यालय, मिस्र के एक प्रमुख अनुसंधानकर्ता और प्रमुख वैज्ञानिक डॉ इज्जेहीन ताहा, जो भूत-प्रेत, आत्माओं, वरदान-अभिशाप जैसी बातों पर तनिक भी विश्वास नहीं करते थे, के साथ एक ऐसी विचित्रा घटना घटित हो गयी थी जिसका रहस्य आज तक ज्यों का त्यों अनसुलझा पड़ा हुआ है।
डॉ ताहा मिस्र के पिरामिडों के अनुसंधान कार्य में जुटे हुये थे। उनका मानना था कि पिरामिडों में पाई जाने वाली विशेष ‘काई‘ के कारण ही उनमें प्रवेश करने वाले व्यक्तियों को श्वास और त्वचा संबंधी ऐसी भयानक बीमारियां लग जाती हैं जो अन्ततः उनके लिये जानलेवा सिद्ध होती हैं। उन्होंने पिरामिडों में प्रवेश के लिए ‘काई‘ को समाप्त करने की एक विस्तृत कार्य योजना बनाई थी।
डॉ. ताहा अपनी योजना को अन्तिम रूप देने में जुटे ही थे कि अचानक उनकी कार की एक अन्य कार से टक्कर हो जाने से उनकी काहिरा में ही मृत्यु हो गई। इस तरह उनका अनुसंधान कार्य भी धरा का धरा रह गया। उनकी मौत की जांच के लिए जब पुलिस ने कारों की टक्कर की जगह परिस्थितियों और दुर्घटनाओं के कारणों की जांच पड़ताल की, तब पुलिस तंत्रा भी यह देख कर दंग रह गया कि जिन परिस्थितियों में कारें टकरायी थी, उनमें ऐसी भीषण दुर्घटना होने की संभावना बहुत ही कम रहती है। डॉ ताहा की मौत को भी अभिशप्त पिरामिडों का प्रतिशोध मानकर उनकी जांच फाइल भी बंद कर दी गई।
बैंडनवर्ग की पुस्तक के अनुसार वर्ष 1929 तक तूतन खामन के पिरामिड को खोल कर और उसमें अंदर जाकर जानकारी प्राप्त करने वाले 22 शोधकर्ता अकारण ही मृत्यु की गोद में समा चुके थे जबकि अन्य अनेक शोधकर्ता तरह-तरह की अज्ञात आधि-व्याधियों से पीडि़त हो गये थे। उनमें अधिकांश तो शेष जीवन अर्द्धविक्षिप्त जैसी हालत गुजारने पर मजबूर थे। इन शोधकर्ताओं की मौत और रोग के कारणों की जांच करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि इतना सब कुछ मात्रा एक काई से ही होना कतई संभव नहीं हो सकता।
बैंडनवर्ग के अनुसार तूतन खामन अपने समय का एक क्रूर और दुराचारी शासक था। वह रोज एक अविवाहित कन्या के साथ मौजमस्ती करता था। रात भर मौजमस्ती के बाद प्रातः होते ही वह उस लड़की के पेट को फाड़ कर मार डाला करता था। उसका यह क्रम कई वर्षों तक चलता रहा था। सम्पूर्ण जनता उसकी इस प्रवृत्ति से भयभीत थी। एक दिन ‘नूर फातिमा‘ नामक लड़की की बारी आयी। वह अपने अधोवस्त्रों के नीचे खंजर छिपाकर ले गई थी। जैसे ही तूतन ने उसके वस्त्रों को खोलना प्रारंभ किया, फातिमा ने उसके पेट में खंजर घोंपकर उसका अंत कर दिया। कहा जाता है कि तूतन के खास सेवकों ने उसके मकबरे का निर्माण कराया था।
अध्ययनों से पता चला है कि आज भी नित्य एक-एक लड़की उसके मकबरे के पास पहुंचती दिखती है और पूर्ण संतुष्ट होकर लौटती है। यंत्रावत चलती हुई लड़कियां किस प्रभाव से वहां पहुंचती है इसकी जानकारी आज तक नहीं हो पायी है क्योंकि शोधकर्ता बचते ही नहीं हैं।



