
समाज 21वीं सदी में विकास के नित्य नए आयाम गढ़ रहा है। किंतु आज भी वैश्विक पटल पर महिलाओं की स्थिति दयनीय है। हम क्यों इक्कीसवीं सदी में भी संविधान के मूल्यों समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय को अपनी जिंदगी का हिस्सा नहीं बना पाए हैं? क्यों अनेक नारीवादी आंदोलन के बावजूद स्त्री-पुरुष की समानता का तर्क यथार्थ का रूप नहीं ले सका? महिलाओं को लेकर हमारे देश में बहस होती रहती है, लेकिन वास्तविकता इसके उलट ही नजर आती है। आधी आबादी को पूरा हक दिलाने की थोथी राजनीति देश की महिलाएं आजादी के वक़्त से देखती आ रही हैं, लेकिन आजाद भारत में आज भी महिलाएं गुलामी की जंजीरों में ही बंधी हैं। महिलाओं के साथ भेदभाव तो उनके जन्म के पूर्व ही शुरू हो जाता है। ना जाने कितनी मासूम जिन्दगी को जन्म तक नहीं लेने दिया जाता है। अगर जन्म ले भी लेती है तो बेटों के समान शिक्षा नहीं दी जाती है। उन्हें बचपन से ही समझाया जाता है कि वह पराया धन है।