Friday, May 1, 2026
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जियो जी भर के, जिंदगी है बहुत कीमती

  • हर 40 मिनट में एक सुसाइड, जान देने से पहले करते हैं पूरी प्लानिंग
  • रातोंरात या फिर अचानक नहीं देता है कोई जान
  • नाकामी और अधूरी हसरतों के चलते अक्सर अपनाते हैं मौत के रास्ते
  • मरने से पहले देते हैं संकेत, इशारा करते हैं बचा लो हमें नहीं चाहते हैं मरना

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: आंखें हैं भरी-भरी और तुम मुस्कुराने की बात करते हो…किसी फिल्मी गाने की ये लाइनें डिप्रेशन का शिकार किसी युवा को सुनाई जाए तो शायद कुछ बेहतर हो। देश में हर 40 सेकेंड में सुसाइड से एक शख्स की मौत होती है। नेशनल क्राइम ब्यूरो के ये सरकारी आंकड़े इस बात की तस्दीक करने को काफी हैं कि अवसाद में लोग तेजी से जीने का मोह छोड़कर जिंदगी की डोर तोड़ने पर उतारू हैं।

इसमें बड़ी संख्या युवाओं की है। एनसीबी के ये आंकड़े केवल चौंकाने वाले नहीं है बल्कि चिंता में भी डालने वाले हैं कि दो दशक के भीतर ऐसा क्या हुआ जो जान देने वालों का आंकड़ा इतनी ज्यादा तेजी से ऊपर की ओर जा रहा है। एनसीबी के आंकड़ों की रोशनी में यदि बात की जाए तो मेरठ में 20 दिन में युवाओं के जान देने की पांच घटनाएं हुई हैं।

  • घटना-1

18 दिसंबर 2021 बाइपास स्थित सुभारती कालेज का बिहार के सीतामढ़ी निवासी छात्र शशि रंजन ने हॉस्टल की छत पर जाकर नीचे कूद कर जान दे दी।

  • वजह

कालेज में संग पढ़ाई करने वाली गर्ल फ्रेंड नाराज हो गयी थी। कई दिन से बात नहीं कर रही थी, यहां तक कि मोबाइल पर काल भी रिसीव नहीं कर रही थी। लगातार अनदेखी कर रही थी। मौत को गले लगाने से पहले उसकी फ्रेंड से भी मिन्नतें कीं, लेकिन उसने भी बात नहीं करायी। आखिरकर लगा ही लिया मौत को गले।

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  • घटना-2

बीते साल 21 अक्तूबर 2022 को बाइपास स्थित सुभारती में बीडीएस की पढ़ाई कर रही मेरठ की लिसाड़ीगेट निवासी एक छात्रा ने हॉस्टल की छत से कूद कर जान दे दी।

  • वजह

जिस बॉय फ्रेंड के साथ रिलेशनशिप में थी, उससे निकाह करना चाहती थी, लेकिन सोसाइटी और कुछ बॉय फ्रेंड ओर से बेरूखी ने मोहब्बत को लेकर जो सपने देखे थे, उनको चूर-चूर कर दिया। नाकाम मोहब्बत और प्यार में शिकस्त ने मौत की राह पर धकेल दिया, फिर वही हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।

  • घटना-3

16 दिसंबर 2023 परतापुर स्थित एमआइटी कालेज में पढ़ने वाले शिवम पुत्र विकास सिंह पेशे से बिल्डर ने अपने हॉस्टल के रूम में फांसी लगाकर जान दे दी।

  • वजह

नाकाम मोहब्बत जिसको चाहता था वो नहीं चाहती थी, यह बात जब पता चली तो काफी देर हो चुकी थी, नाकाम मोहब्बत के सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाया, हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि फैमिली दबाव की भी काफी था, उसको सहन नहीं कर पाया और परीक्षा भी छोड़ दी थी, डिप्रेशन में चला गया और 16 दिसंबर को उसने जान दे दी।

  • घटना-4

24 दिसंबर को मेरठ के बहसूमा थाना क्षेत्र में रामराज की रहने वाले युवती तथा लक्सर निवासी युवक ने प्रेम में नाकाम होकर मौत को लगे लगा लिया। दोनों जंगल में जाकर फांसी के फंदे पर झूल गए। मरने से पहले युवक ने युवती की मांग भरी। ऐसा ही दूसरा मामला रोहटा के सिवाल में गंगनहर पर सामने आया है, जहां प्रेमी युगल बताए जा रहे युवक युवती ने नहर में छलांग लगा दी। यह अच्छा हुआ कि उनके कूदते देखकर कुछ साहसी लोग पानी में कूद गए और युवती को तो बचा लिया लेकिन युवक का पता नहीं चल सका।

वानिगी भर, काफी लंबी है फेहरिस्त

ये घटनाएं केवल वानिगी भर हैं और एक माह के भीतर केवल मेरठ जनपद भर की हैं, यदि आसपास और साल भर के ऐसे मामलों का ब्योरा जमा किया जाए जिसमें नाकामी के चलते जान दे बैठे तो काफी लंबी फेहरिस्त हो जाएगी। नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों की मानें तो हर 40 सेकेंड में एक सुसाइड भारत में होता है।

10 सालों में 200 फीसदी मामले बढ़े

बीते 10 साल में 15 से 24 साल के युवाओं में आत्महत्या के मामले 200 प्रतिशत तक बढ़े हैं। इसके तेजी से बढ़ने के पीछे अब तक केवल आर्थिक कारणों को जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन कई रिसर्च में खुलासा हुआ कि युवाओं में इसकी बड़ी वजह स्कूल और परिवार का दबाव है। मेरठ एजुकेशन हब होने के कारण यहां देशभर के छात्र-छात्राएं शिक्षा लेने आते हैं और इसी वजह से यहां ऐसे प्रकरण ज्यादा सामने आ रहे हैं। आत्महत्या के बड़े कारण मानसिक दबाव, मानसिक रोग और पारिवारिक झगड़े लगते हैं।

रातोंरात इरादा नहीं

मनोविज्ञानिक बताते हैं कि कोई भी आत्महत्या करने वाला रातों रात इसका इरादा नहीं करता। युवा तो इसके लिए पहले प्लानिंग भी करते हैं। यहां तक कि वे कुछ दिन पहले से ही मैं अब शिकायत नहीं करुंगा..अब नहीं आऊंगा..मैं चला जाऊंगा..जैसे संकेत भी देते हैं। हालांकि यह संकेत उनके साथ रहने वाले मित्रों या परिजनों को पता चलते हैं। कई फोन कॉल्स पर तो यह पता चलता है कि आत्महत्या का कारण इतनी छोटी बात है, जिसे मात्र शेयर करने से हल किया जा सकता है।

रोके जा सकते हैं ऐसे

यदि इन बातों की तरफ ध्यान दिया जाए, तो आत्महत्या का इरादा बदला जा सकता है। युवाओं का अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रहने के कारण भी वे आमतौर पर प्यार में असफल होने पर आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं। माता पिता और शिक्षकों को चाहिए कि वे हर विद्यार्थी को एक ही तराजू में तौलकर न देखें। बच्चे को उसकी रुचि के विपरीत सब्जेक्ट दिलाने का निर्णय भी उसे सुसाइड की ओर ले जा सकता है।

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आत्महत्या के बारे में बात करना मदद की गुहार हो सकती है और यह आत्महत्या के प्रयास की दिशा में प्रगति का देर से संकेत हो सकता है। जो लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं उनमें आत्महत्या के बारे में बात करने के अलावा अन्य लक्षण भी दिखेंगे। यदि आपको किसी ऐसे युवा व्यक्ति के बारे में चिंता है जो आत्महत्या के बारे में बात करता है। उसे आगे बात करने के लिए प्रोत्साहित करें और उचित परामर्श सहायता पाने में उसकी मदद करें।

पूछें कि क्या व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करने के बारे में सोच रहा है। पूछें कि क्या उस व्यक्ति के पास कोई योजना है। योजना की पूर्णता और यह कितनी खतरनाक है, इसके बारे में सोचें। उन योजनाओं को तुच्छ न बनाएं जो कम पूर्ण या कम खतरनाक लगती हैं। सभी आत्मघाती इरादे गंभीर हैं और इन्हें इसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। युवा व्यक्ति को व्यक्तिगत सुरक्षा योजना विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करें।

इसमें दूसरों के साथ बिताया गया समय, महत्वपूर्ण व्यस्कों के साथ चेक-इन पॉइंट/भविष्य की योजनाएं शामिल हो सकती हैं। जिन बच्चों में आत्महत्या के बारे में सोचने की आदत (सुसाइडल फैंटेसी) होती है, वही आत्महत्या ज्यादा करते हैं। निजात के लिए आत्महत्या के कारण उससे ग्रसित मरीज के लक्षण एवं भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न हो, इसका भी ध्यान रखा जाए। युवा वर्ग के लिए युवावस्था संक्रमण काल है, जिसमें युवाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

खासतौर से कॅरियर, जॉब, रिश्ते, खुद की इच्छाएं, व्यक्तिगत समस्याएं जैसे लव अफेयर, मैरिज, सैटलमेंट, भविष्य की पढ़ाई आदि। जब वह इस अवस्था में आता है, तो बेरोजगारी का शिकार हो जाता है और भविष्य के प्रति अनिश्चितता बढ़ जाती है। अपरिपक्वता के कारण कई बार परेशानियां आती हैं। जिससे डिप्रेशन, एंग्जाइटी, सायकोसिस, पर्सनालिटी डिसआॅर्डर की स्थिति बन जाती है

उसके बाद शार्ट कट दे दो जान। इस गंभीर विषय पर कुछ विशेषज्ञों से चर्चा की गयी। इसको लेकर सबसे कॉमन बात यह है कि जान देने वाले खुद को समाज में अलग-थलग समझने लगते हैं। दूसरी बात यह है कि वो यह भूल जाते हैं कि उनके अपनों का उनके बाद क्या होगा।

  • न, बर्दाश्त नहीं

आज के युवाओं को ना बर्दाश्त नहीं है। इसके अलावा पारिवारिक माहौल भी काफी हद तक जिम्मेदार होता है। साथ ही महत्वाकांक्षाएं एक बड़ा फैक्टर है। जहां तक प्यार में जान देने वालों का सवाल है तो वो बहुत संवेदनशील होते हैं अपने प्यार को लेकर। भारत में हर एक 40 सेकेंड में एक सुसाइड होता है। एनसीबी के ये सरकारी आंकड़े हैं। इससे अंदाजा लगा लीजिए कि हालात कितने गंभीर हैं।

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इसको ना रोका गया तो सोसाइटी को कुछ नयी प्राब्लम का सामना करना पड़ सकता है। जिन परिवारों में माता-पिता दोनों ही कमाने वाले होते हैं, वहां सावधानी की अधिक जरूरत है। इसके अलावा बच्चे मोबाइल में क्या देख रहे हैं, इसका भी ध्यान रखा जाए तो बेहतर है। -डा. नीलम राठी, सीनियर साइक्लॉजिस्ट एलएलआरएम मेडिकल

  • हालात ज्यादा गंभीर

भारत में हर एक 40 सेकेंड में एक सुसाइड होता है। एनसीबी के ये सरकारी आंकड़े हैं। इससे अंदाजा लगा लीजिए कि हालात कितने गंभीर हैं। इसको ना रोका गया तो सोसाइटी को कुछ नयी प्राब्लम का सामना करना पड़ सकता है। जिन परिवारों में माता पिता दोनों ही कमाने वाले होते हैं,

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वहां सावधानी की अधिक जरूरत है। इसके अलावा बच्चे मोबाइल में क्या देख रहे हैं, इसका भी ध्यान रखा जाए तो बेहतर है। -डा. तरुण पाल, सीनियर साइक्लॉजिस्ट एलएलआरएम मेडिकल मेरठ

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