Monday, March 30, 2026
- Advertisement -

नैया किनारे लगाने के प्रयास में ‘भंवर’ में फंसे चौधरी जयंत!

  • मुजफ्फरनगर दंगों के बाद गांव-गांव दी थी भाईचारे की दुहाई
  • दंगों से पैदा हिंदू-मुस्लिम खाई पाटने की कोशिश लाई थी रंग
  • भाजपा से हाथ मिलाने से शायद ही अब मुस्लिम कर पाए भरोसा

राजपाल पारवा |

शामली: मुजफ्फरनगर-शामली के 2013 के सांप्रदायिक दंगों का सर्वाधिक नुकसान अगर किसी राजनीतिक दल को हुआ, तो वह था राष्ट्रीय लोकदल। दंगों के बाद 2014 तथा 2019 के लोकसभा चुनाव में जहां उसको एक भी सीट नहीं मिली थी, वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में उसका महज एक विधायक चुनाव जीता सका था, वह भी बाद में भगवा रंग में रंग गया।

हालांकि दंगों के बाद हिंदू-मुस्लिम के बीच की खाई को पाटने के लिए तत्कालीन रालोद सुप्रीमो और जयंत चौधरी ने करीब एक दशक तक पश्चिमी उप्र में कड़ा संघर्ष किया, लेकिन आसन्न लोकसभा चुनाव में वैतरणी पार लगाने के लिए जयंत चौधरी द्वारा भाजपा से गलबहिया के कारण आज वे एक दशक पूर्व की स्थिति में आकर खड़े हो गए हैं।

सितंबर 2013 के मुजफ्फरनगर-शामली सांप्रदायिक दंगों के कारण हिंदू-मुस्लिम के बीच बड़ी खाई पैदा हो गई थी। इन दंगों में करीब 65 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी।

साथ ही, हजारों परिवारों को शिविरों में सालों तक रहना पड़ा था। दंगों का कलंक प्रदेश की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के माथे पर लगा था। इसका खामियाजा सपा को 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की सत्ता से बेदखल होने के रूप में भुगतना पड़ा था। तो, राजनीतिक रूप से राष्ट्रीय लोकदल को बड़ा नुकसान हुआ था।

दंगों के बाद जहां 50 फीसदी जाट वोट भाजपा के साथ खड़ा हो गया था, वहीं मुस्लिम वोट भी रालोद से छिटक गया था। इसलिए 2014 और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में रालोद का सूपड़ा साफ हो गया था जबकि कांग्रेस-रालोद और महान दल ने मिलकर चुनाव लड़ा था। यहां तक की चौ. अजित सिंह तथा जयंत चौधरी तक को हार का मुंह देखना पड़ा था। सांप्रदायिक दंगों का असर 2017 के विधानसभा चुनाव तक रहा। यही कारण रहा कि रालोद का सिर्फ एक विधायक सहन्दरपाल रमाला रालोद की परंपरागत सीट छपरौली से जीत पाया था, लेकिन वह भी बाद में भगवा रंग में रंग गया था। मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों से हिंदू-मुस्लिम के बीच की खाई को पाटने के लिए चौधरी अजित सिह और उनके सुपुत्र जयंत चौधरी ने ऐड़ी-चोटी के जोर लगाए। गांव-दर-गांव भाईचारा सम्मेलन किए।

फिर, 2020 के किसान आंदोलन और मुस्लिमों के साथ खड़ा होने से रालोद को संजीवनी मिल गई। इसलिए 2022 के विधानसभा चुनाव हुए तो उसके 33 में 9 प्रत्याशी विधायक बन गए। इससे पश्चिमी उप्र में रालोद की दमदार उपस्थित हो चली थी, लेकिन पिछले दिनों समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव के साथ लोकसभा के लिए सीट शेयरिंग पर बात बिगड़ने से जयंत चौधरी ने एक बार फिर से पुराने साथी भाजपा के पाले में दस्तक दे दी। इसकी मजबूत नींव उस समय पड़ी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री किसान मसीहा स्व. चौ. चरणसिंह को भारत रत्न देने की घोषणा की।
ऐसे में जयंत चौधरी ने भी साफ कह दिया कि ‘अब वे किस मुंह से इंकार करें’।

उन्होंने इतना भी नहीं सोचा कि जिस मुस्लिम वोटर का साथ पाने के लिए उन्होंने एक दशक तक पसीना बहाया है, अब उनका क्या होगा? इसलिए जयंत चौधरी के पलटी मारने से सर्वाधिक मुस्लिम मतदाता अपने आपको ठगा महसूस कर रहा है। इसलिए भले ही जयंत चौधरी भाजपा के साथ खडेÞ हो गए हों, लेकिन मुस्लिम वोटरों का उनके साथ आना आसान ही नहीं बल्कि नामुमकिन नजर आ रहा है।

साथ ही, जाट बिरादरी का 20 से 25 फीसदी वोटर ऐसा है, जो जयंत चौधरी के निर्णय से खफा है। जाट-मुस्लिम वोटरों में नाराजगी तथा रालोद का वोट प्रतिशत निरंतर कम होना उसके खिसकते जनाधार की ओर इशारा कर रहा है। ऐसे में जयंत चौधरी की राजनीतिक नैया ‘भंवर’ में हिचकोेले खाने के कगार पर पहुंच गई है।

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

Mahavir Jayanti 2026: कब है महावीर जयंती? जानिए तारीख, महत्व और इतिहास

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत...

Gold Silver Price: सर्राफा बाजार में गिरावट, सोना ₹1,46,000, चांदी ₹2,27,000 पर फिसली

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी तनाव...
spot_imgspot_img