- 2009 में रालोद-भाजपा गठबंधन पर सांसद बने थे संजय चौहान
- चंदन चौहान को विरासत में मिली है राजनीति, दादा रह चुके हैं डिप्टी सीएम
मिर्जा गुलजार बेग |
मुजफ्फरनगर: मीरापुर विधायक चंदन चौहान को एनडीए गठबंधन से बिजनौर लोकसभा सीट से रालोद प्रत्याशी बनाया गया है। 2009 में चंदन सिंह चौहान के पिता संजय सिंह चौहान भी भाजपा-रालोद गठबंधन से बिजनौर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े थे और विजयी हुए थे। इस बार भी चंदन सिंह चौहान के कांधों पर 2009 के इतिहास को दोहराने का भार रहेगा। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि चंदन सिंह चौहान भाजपा के पारंपरिक वोट के अलावा गुर्जर मतदाताओं के सहारे अपनी नैय्या को पार लगा सकते हैं।
बता दें कि चंदन सिंह चौहान को राजनीति विरासत में मिली हैं। चंदन सिंह चौहान के दादा बाबू नारायण सिंह चौहान बड़े राजनीतिज्ञ रहे है। वर्ष 1977 में बाबू नारायण सिंह जनता पार्टी की सरकार में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री रहे थे। उस समय बाबू नारायण सिंह कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी के सदस्य थे, जिसका बाद में जनता पार्टी में विलय हो गया था। उस दौरान भी जन संघ इस जनता पार्टी का घटक दल थी, जो बाद में 1983 में भारतीय जनता पार्टी बनी थी। बाबू नारायण सिंह के बाद उनके पुत्र संजय चौहान राजनीति में आये और उन्होंने समाजवादी पार्टी, रालोद में रहकर कर्इं चुनाव लड़े।
संजय चौहान भी मोरना विधासभा से विधायक रहे थे।
इसके बाद 2009 में संजय चौहान को भी भाजपा-रालोद गठबंधन से बिजनौर विधानसभा का चुनाव लड़ाया गया था। संजय चौहान इस चुनाव में विजयी हुए थे। संजय चौहान के बाद इनके पुत्र चंदन सिंह चौहान ने राजनीति में पदार्पण किया और अपना पहला चुनाव वर्ष 2017 में खतौली विधानसभा से लड़ा, परन्तु भाजपा लहर के चलते चंदन सिंह चौहान चुनाव हार गये थे।
2022 के चुनाव में चंदन सिंह चौहान ने विरासत में मिली मोरना (जो अब मीरापुर विधानसभा है) से चुनाव लड़ा और अपने विरोधी प्रशांत गुर्जर को शिकस्त देकर विधायक बनने का गौरव प्राप्त किया। चंदन सिंह चौहान भी रालोद-सपा के टिकट पर विधायक बने। बता दें कि इनके पिता संजय चौहान भी सपा के टिकट पर ही मोरना से विधायक बने थे।
लक्ष्य एक, चुनौतियां अनेक
2009 के लोकसभा चुनाव व 2024 के लोकसभा चुनाव की बात करें, तो बिजनौर लोकसभा पर भाजपा व रालोद गठबंधन पर चुनाव लड़ा गया। 2009 में चंदन के पिता संजय चौहान गठबंधन प्रत्याशी थे। 2024 में चंदन सिंह चौहान प्रत्याशी है। 2009 के चुनाव की बात करें, तो संजय चौहान भाजपा रालोद गठबंधन से चुनाव तो लड़े थे, परन्तु उस समय विपक्ष बिखरा हुआ था।
सपा, बसपा, कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ीं थी, जिसमें वोटों का धु्रवीकरण हुआ था और इस धु्रवीकरण का फायदा संजय चौहान को मिला था और वें लोकसभा चुनाव जीत गये थे। 2024 के चुनाव की बात करें, तो परिस्थितियां बदली हुई है। इस बार पार्टियां अलग-अलग चुनाव न लड़कर गठबंधन से चुनाव लड़ रही है। एक तरफ जहां इंडिया गठबंधन है, दूसरी ओर एनडीए गठबंधन है। सीधे-सीधे कहा जाये तो एक तरफ सत्ता पक्ष है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष है। वोटो के धु्रवीकरण के चांस इस चुनाव में कम है। जो चंदन चौहान के लिए चुनौती बन सकता है।
इस चुनाव में बसपा प्रत्याशी घोषित होने के बाद से ही तस्वीर सामने आयेगी, क्योंकि बसपा प्रत्याशी जितना मजबूत होगा, उतना फायदा इंडिया गठबंधन को मिलेगा। हालांकि, इस चुनाव में चंदन के लिए भाजपा की लहर संजीवनी का काम कर सकती है।

