Tuesday, April 21, 2026
- Advertisement -

जल तनाव से जूझती दुनिया

Samvad 52


MANISH KUMAR CHAUDHARYब्रह्मांड में पृथ्वी एकमात्र ज्ञात ग्रह है जिस पर पानी और जीवन है। भले ही ग्रह का 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका हुआ है, केवल 1 प्रतिशत तक ही आसानी से पहुंचा जा सकता है। पानी ग्रह पर सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है और यह पारिस्थितिकी तंत्र और जलवायु को भी बनाए रखता है, जिस पर हमारी निर्मित और प्राकृतिक दुनिया दोनों निर्भर हैं। आज हम मीठे पानी के संसाधनों पर पहले से कहीं अधिक दबाव डाल रहे हैं। तेजी से बढ़ती आबादी, शहरीकरण और बदलती जलवायु के बीच, दुनिया भर में पानी का तनाव बढ़ रहा है। विश्व स्तर पर अत्यधिक दोहन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण भूजल संसाधनों पर दबाव बढ़ता चला जा रहा है। भारत की स्थिति इस मामले में और भी चिंताजनक है। बेंगलुरु के गंभीर जल-संकट की इन दिनों देशभर में चर्चा है। शहर के 13,900 बोरवेलों में से लगभग 6,900 बोरवेल निष्क्रिय हो गए हैं। स्थिति इतनी विकट हो चली है कि कई लोग शहर से पलायन करने लगे हैं। हैदराबाद में भी इस संकट की आहट सुनाई देने लगी है। चेन्नई में 2019 के भीषण जल संकट को लोग अभी भुला नहीं पाए हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट में वर्ष 2030 तक देश के करीब 30 शहरों में भारी जल संकट का अनुमान जताया गया है। दिल्ली, गुरुग्राम, अमृतसर, लुधियाना, गाजियाबाद, बेंगलुरू, गांधीनगर, इंदौर, जयपुर जैसे प्रमुख शहर इसमें शामिल हैं।

देश की कृषि उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि, जिसे हरित क्रांति कहा जाता है, उर्वरकों और कीटनाशकों के व्यापक उपयोग के साथ-साथ भूजल संसाधनों के विकास पर आधारित थी। वर्ष 1950 के दशक की शुरुआत में भारत ने भूजल के बड़े पैमाने पर पंपिंग को प्रोत्साहित किया और सब्सिडी दी, जिससे ड्रिल किए गए ट्यूबवेलों की संख्या 1 मिलियन से बढकर लगभग 30 मिलियन हो गई। भारत पहले से ही किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक भूमिगत जल पंप करता है, मुख्यत: गेहूं, चावल और मक्का जैसी मुख्य फसलों की सिंचाई के लिए। ग्रामीण क्षेत्रों में मुफ्त या सस्ती बिजली से किसानों द्वारा जब-तब बिजली पंप चलाने के कारण भूजल निकासी में और वृद्धि हुई है। भारत में वाष्पीकरण के बाद वार्षिक उपलब्ध पानी 1999 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है, जिसमें से उपयोग योग्य जल क्षमता 1122 अनुमानित है। भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है, जिसका अनुमानित उपयोग प्रतिवर्ष लगभग 251 बीसीएम है, जो वैश्विक कुल के एक चौथाई से अधिक है। 60 प्रतिशत से अधिक सिंचित कृषि और 85 प्रतिशत पेयजल आपूर्ति इस पर निर्भर है, और बढ़ते औद्योगिक/शहरी उपयोग के साथ, भूजल एक महत्वपूर्ण संसाधन है। यह अनुमान लगाया गया है कि प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 2025 में लगभग 1400 घन मीटर और 2050 तक 1250 घन मीटर तक कम हो जाएगी। यह देश के बड़े हिस्से में एक गंभीर समस्या है, न कि केवल उत्तर-पश्चिमी, पश्चिमी और प्रायद्वीपीय भारत में। भारत वैश्विक आबादी के 17 प्रतिशत का घर है, लेकिन इसके जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत है। भारत की आधी से ज्यादा आबादी को किसी न किसी स्तर पर अत्यधिक जल तनाव का सामना करना पड़ता है। हालांकि, पानी का तनाव पानी की साधारण भौतिक प्रचुरता से परे कारकों, विशेष रूप से पानी की गुणवत्ता और प्रदूषण से भी प्रेरित है।

वर्तमान में दुनिया का 80 प्रतिशत से अधिक अपशिष्ट जल बिना किसी उपचार के वापस नदियों, नालों और महासागरों में छोड़ दिया जाता है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र को व्यापक नुकसान होता है और महत्वपूर्ण मानव जल स्रोत प्रदूषित होते हैं। भूजल संदूषकों का पता लगाने और प्रबंधन करने के लिए सतही जल की तुलना में एक अलग दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। सतही जल में प्रदूषण का अक्सर आसानी से पता लगाया जा सकता है और इसे शीघ्र ही दूर भी किया जा सकता है। लेकिन भूजल प्रदूषण की विशेषताएं लगभग विपरीत हैं। यह धीरे-धीरे होता है और इसके गंभीर परिणाम होते हैं। एक बार जब गुणवत्ता खराब हो जाती है, तो उसे ठीक होने में बहुत अधिक समय लगता है। चूंकि पेट्रोलियम उत्पादों का उपयोग इतना व्यापक हो गया है कि पृथ्वी के प्रत्येक आबादी वाले क्षेत्र में उथले भूजल को भी प्रदूषण के खतरे में माना जाना चाहिए। समस्या यह है कि भूजल गुणवत्ता प्रबंधन को सार्वभौमिक रूप से तब तक उपेक्षित किया जाता है जब तक कि मानवीय और आर्थिक लागत इतनी स्पष्ट न हो जाए कि इसे नजरअंदाज न किया जा सके।

मनुष्य विश्व स्तर पर हर साल लगभग चार हजार क्यूबिक किलोमीटर पानी निकालता है। यह 50 साल पहले की हमारी निकासी का तिगुना है, और निकासी प्रतिवर्ष लगभग 1.6 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। इस नई मांग का अधिकांश हिस्सा कृषि द्वारा संचालित होगा, जो पहले से ही वैश्विक मीठे पानी के उपयोग का 70 प्रतिशत हिस्सा है। ऊर्जा उत्पादन वर्तमान में वैश्विक जल खपत का 10 प्रतिशत से भी कम है। लेकिन दुनिया की ऊर्जा मांग 2035 तक 35 प्रतिशत बढ़ने की राह पर है, जिससे ऊर्जा क्षेत्र में पानी की खपत 60 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है। यह बढ़ती मांग मानवता की सभी जल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक बढ़ती चुनौती प्रस्तुत करती है। जनसंख्या वृद्धि, अस्थिर जल निकासी, खराब बुनियादी ढांचे के कारण दुनिया के कई हिस्सों में पहले से ही अपर्याप्त सुरक्षित जल आपूर्ति है। आज 1.7 अरब लोग नदी घाटियों में रहते हैं जहां पानी की मांग आपूर्ति से अधिक है, जिसे जल-तनावग्रस्त क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। 2050 तक इसके बढ़ कर 2.3 बिलियन होने की उम्मीद है। अक्सर, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और कमजोर प्रशासन के कारण मनुष्य भौतिक रूप से उपलब्ध जल आपूर्ति तक विश्वसनीय रूप से पहुंचने में असमर्थ होते हैं। आज भी 2.1 अरब लोगों की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच नहीं है और 4.5 अरब लोगों के पास सुरक्षित रूप से प्रबंधित स्वच्छता सेवाओं का अभाव है।

मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र जैव विविधता के हॉटस्पॉट हैं, लेकिन वे मानव विकास से सबसे अधिक प्रभावित भी हुए हैं। दुनिया की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का कुल मूल्य लगभग 147 ट्रिलियन डॉलर आंका गया है, लेकिन इनमें से 60 प्रतिशत से अधिक का ह्रास हो रहा है या उनका उपयोग अनिश्चित रूप से किया जा रहा है। यदि हम इन प्रणालियों की सार-संभाल नहीं करते तो ये सेवाएं स्वाभाविक रूप से उपलब्ध नहीं रहेंगी। एक तरफ, 2050 में बाढ़ से खतरे में पड़े लोगों की संख्या 1.6 अरब तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति खतरे में है। सरकारें भूजल के सामान्य-अच्छे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए संसाधन संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका निभाएं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भूजल तक पहुंच और उससे होने वाला लाभ समान रूप से वितरित किया जाए और यह संसाधन भविष्य की पीढ़ियों के लिए उपलब्ध रहे। पानी की कमी और सूखे से जूझ रहे क्षेत्रों की बढ़ती खबरों के साथ, पानी बचाना और इसका अधिक कुशलता से उपयोग करना समय की मांग बन गया है।


janwani address 8

spot_imgspot_img
[tds_leads title_text="Subscribe" input_placeholder="Email address" btn_horiz_align="content-horiz-center" pp_checkbox="yes" pp_msg="SSd2ZSUyMHJlYWQlMjBhbmQlMjBhY2NlcHQlMjB0aGUlMjAlM0NhJTIwaHJlZiUzRCUyMiUyMyUyMiUzRVByaXZhY3klMjBQb2xpY3klM0MlMkZhJTNFLg==" f_title_font_family="467" f_title_font_size="eyJhbGwiOiIyNCIsInBvcnRyYWl0IjoiMjAiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIyMiIsInBob25lIjoiMzAifQ==" f_title_font_line_height="1" f_title_font_weight="700" msg_composer="success" display="column" gap="10" input_padd="eyJhbGwiOiIxNXB4IDEwcHgiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMnB4IDhweCIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCA2cHgifQ==" input_border="1" btn_text="I want in" btn_icon_size="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxNyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTUifQ==" btn_icon_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjMifQ==" btn_radius="3" input_radius="3" f_msg_font_family="394" f_msg_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_msg_font_weight="500" f_msg_font_line_height="1.4" f_input_font_family="394" f_input_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsInBvcnRyYWl0IjoiMTEiLCJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiJ9" f_input_font_line_height="1.2" f_btn_font_family="394" f_input_font_weight="500" f_btn_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjExIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMCJ9" f_btn_font_line_height="1.2" f_btn_font_weight="700" f_pp_font_family="394" f_pp_font_size="eyJhbGwiOiIxMyIsImxhbmRzY2FwZSI6IjEyIiwicG9ydHJhaXQiOiIxMSJ9" f_pp_font_line_height="1.2" pp_check_color="#000000" pp_check_color_a="var(--metro-blue)" pp_check_color_a_h="var(--metro-blue-acc)" f_btn_font_transform="uppercase" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjYwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGUiOnsibWFyZ2luLWJvdHRvbSI6IjUwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9LCJsYW5kc2NhcGVfbWF4X3dpZHRoIjoxMTQwLCJsYW5kc2NhcGVfbWluX3dpZHRoIjoxMDE5LCJwb3J0cmFpdCI6eyJtYXJnaW4tYm90dG9tIjoiNDAiLCJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBvcnRyYWl0X21heF93aWR0aCI6MTAxOCwicG9ydHJhaXRfbWluX3dpZHRoIjo3NjgsInBob25lIjp7ImRpc3BsYXkiOiIifSwicGhvbmVfbWF4X3dpZHRoIjo3Njd9" msg_succ_radius="2" btn_bg="var(--metro-blue)" btn_bg_h="var(--metro-blue-acc)" title_space="eyJwb3J0cmFpdCI6IjEyIiwibGFuZHNjYXBlIjoiMTQiLCJhbGwiOiIxOCJ9" msg_space="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIwIDAgMTJweCJ9" btn_padd="eyJsYW5kc2NhcGUiOiIxMiIsInBvcnRyYWl0IjoiMTBweCJ9" msg_padd="eyJwb3J0cmFpdCI6IjZweCAxMHB4In0=" f_pp_font_weight="500"]

Related articles

spot_imgspot_img